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दरिद्रता के बीच उपचार की विलक्षण कला – एक महिला चिकित्सक की अद्भुत कहानी

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‘गडचिरोली’, महाराष्ट्रा का एक ऐसा ज़िल्हा है जो की जितना अपनी सांस्कृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है उतना ही अपने पिछड़ेपन की वजह से भी पहचाना जाता रहा है. डॉक्टर रानी बंग इसी जगह रहती है तथा यहा के लोगो के लिए काम करती है. (श्रेय – डब्ल्यू. एफ. एस)

‘गडचिरोली’, महाराष्ट्रा का एक ऐसा ज़िल्हा है जो की जितना अपनी सांस्कृतिक परिवेश के लिए जाना जाता है उतना ही अपने पिछड़ेपन की वजह से भी पहचाना जाता रहा है. डॉक्टर रानी बंग इसी जगह रहती है तथा यहा के लोगो के लिए काम करती है. डॉक्टर रानी, जो की एक स्त्रीरोग विशेश्ग्य है तथा उनके पति डॉक्टर  अभय बंग दोनो ही पिछले बीस वर्षो से यहा के स्थानिय लोगो की सेवा मे तत्पर है. संन १९८६ मे रानी और अभय ने ‘सोसाइटी फॉर एजुकेशन, एक्शन आंड रिसर्च इन कम्यूनिटी हेल्थ’ नामक संस्था की स्थापना की तथा इसके ज़रिए भारत मे स्वास्थ के शेत्र मे नये प्रतिमान की संरचना की. इनके इस संस्था की अवोमानना अब पूरा विश्व करता है. आइए डॉक्टर रानी बंग की ज़ुबानी सुने की किस तरह वे इस नेक काम के लिए प्रेरित हुई.

ग्रामीण भारत से मेरा साक्षात्कार १९७८ मे कान्हपुर नामक गाँव मे हुआ जो महाराष्ट्रा के वर्धा जिलहे मे स्थित है. एक विधवा स्त्री अपनी दूध पीती बच्ची का इलाज कराने मेरे पास आई थी. जाते जाते वो मुझे एक संवेदनशील चिकित्सक होने का अद्भुत पाठ पढ़ा गयी. राय बाई एक भूमिहीन विधवा थी जिसके उपर चार बच्चो के भरण पोषण का बोझ था. चार बच्चो मे से सबसे बड़ा लड़का १३ वर्ष का तथा सबसे छोटी बेटी केवल दो वर्ष की थी. राय बाई अपनी सबसे छोटी बेटी को लेकर आई थी, जो की दस्त तथा निमोनिया से पीड़ित थी. उसे तुरंत ही चिकित्सा की अव्यशकता थी. उसकी दयनीय हालत को देखकर मैने शीघ्र ही राय बाई से उसे अस्पताल मे भर्ती करने को कहा. इस पर राय बाई ने कोई उत्तर नही दिया और वहा से चली गयी. अपने ही संतान के प्रति राय बाई की इस अवहेलना से मुझे चिढ़ सी हो गयी. गुस्से मे मैं अपने आप मे ही बुदबुदाने लगी, “जब पाला नही जाता तो ये लोग इतने सारे बच्चे पैदा ही क्यूँ करते है. कभी नही सुधरेंगे ऐसे लोग”.

दो दिन बाद सुबह साढ़े आठ बजे के करीब जब मैं अपने दवाखाने पहुची तो वही छोटी सी बच्ची अपनी पाँच साल की बड़ी बहन के साथ वहाँ मौजूद थी. उसकी हालत बेहद पीड़ादायक थी. अपनी आखरी सांसो से जूझती हुई उस बच्ची ने वही मेरी आँखो के सामने दम तोड़ दिया. जब मैने राय बाई के बारे मे पूछा तो मुझे बताया गया की वो खेतो मे काम करने के लिए गयी है. मेरे लिए ये सब कुछ किसी भयानक सपने से कम नही था. एक डॉक्टर होते हुए भी मैं उस बच्ची को बचाने के लिए कुछ भी नही कर पाई थी. मुझे अपने आप पर क्रोध आ रहा था और अपने आप से कई ज़्यादा मुझे उस बच्ची की माँ पर क्रोध आ रहा था, जिसे अपनी ही बेटी की ज़रा सी भी परवाह नही थी. क्या कोई भी माँ इतनी क्रूर हो सकती है की अपनी संतान को मरता हुआ छोड़ दे? इसके तुरंत बाद जब राय बाई मुझे मिली तो मुझसे रहा नही गया और निंदनीय लहज़े मे मैने उनसे कहा, “तुम्हे कुछ नही समझ आता ना? कभी नही सुधरोगे तुम लोग”. वह पथराई हुई आँखो से मुझे देखती रही. सबकुछ चुपचाप सुनती रही. जब मैने दिल खोलकर उनसे वह सब कुछ कह दिया जो मैं उनके बारे मे सोचती थी तो धीमे स्वर मे वह बोली, “क्या आपने कह लिया जो कुछ कहना था, क्या अब मैं बोलू?” इसके बाद राय बाई ने मुझसे जो कुछ कहा उससे मेरा अस्तित्व ही बदल गया. “मैं एक ग़रीब विधवा हूँ. दिन भर मज़दूरी करके मैं जो कुछ कमाती हूँ, उससे मुश्किल से शाम को मेरे घर का चूल्हा जलता है. यदि मैं इस बच्ची को अस्पताल ले जाती तो उस दिन का खाना कहा से कमा के लाती? और फिर मेरे बाकी के बच्चे भूखे रह जाते. मेरा बड़ा बेटा तेरह साल का है और दूसरी बेटी आठ साल की. मैं इस बच्ची को बचाने के लिए उन्हे भूखा नही मार सकती थी. मैं अपने बड़े बच्चो का पेट भरूँगी तभी तो वे बड़े होकर मेरी परेशानियाँ कम करेंगे”. राय बाई के ये शब्द कटु ज़रूर थे परंतु ये उसके जीवन का अनचाहा सच था.

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यह घटना मुझे मेरा पहला सबक सीखा गया की केवल दवाइयो और देखरेख से एक मरीज़ ठीक नही होता, डॉक्टर का मरीज़ के प्रति संवेदनशील होना भी उतना ही ज़रूरी है जितना उसका इलाज करना. इलाज के दौरान एक चिकित्सक को उन मानवीय, सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियो का भी आंकलन करना चाहिए जिससे उस रोगी का जीवन घिरा हुआ है. राय बाई से इस दुखदायी मुलाकात से पहले मैं उन्हे और उनके जैसे अपने दवाखाने मे आनेवाले हर शक्स को सिर्फ़ एक रोगी  के  तौर पर देखती रही. पर राय बाई ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया की हम रोगी को या उसकी मनोदशा को बिना जाने पहचाने उसे हिदायते देने लगते है. एक मरीज़ क्यूँ ऐसा है, वह किन परिस्थितियो का शिकार है, यह जाने बगैर उसे कोई भी सलाह देना उचित नही. अतः चिकित्सको को इन बातो के लिए भी शिक्षित करना बेहद ज़रूरी है. यही वह समय था जब मैने अपने आप से एक कठिन प्रश्न पूछना चाहा कि, “मैं कौन होती हूँ इन औरतो को इनके स्वास्थ के विषय मे सलाह देने वाली? ”

शुरूवाती दौर मे इस तरह के अनुभवो ने मुझे आत्मांकलन के पथ पर ला खड़ा किया. इसी तरह के कई और अनुभव हुए मेरे जीवन मे. हर अनुभव इतना कटु तो नही था अपितु मेरे माता पिता, शिक्षको, मरीज़ो, दाइयो तथा गाँववालो के ज़रिए मिले अनुभव मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे नियमित आते रहे. यही अनुभव मेरे प्रेरणास्रोत रहे है और हमेशा रहेंगे.  मैं मानती हूँ की ग्रामीण भारत के इन दरिद्र लोगो के स्वास्थ संबंधी कई महत्वपूर्ण जानकारीयाँ मैं लोगो तक पहुचा सकती हूँ, जिनसे लोगो मे इनके प्रति जागरूकता फैलेगी.

हालाँकि समाज मे बदलाव लाने की मेरी हर कोशिश हमेशा सफल नही रही. कई बार मेरी ये कोशिश कुछ और ही मोड़ ले लेती. उदाहरण के तौर पर एक किस्सा सुनाना चाहूँगी. गडचिरोली मे एक अच्छा ख़ासा देह व्यापार का काम भी चलता रहा है. मैं कुछ वक़्त के लिए इस इलाक़े मे भी काम करती रही. काफ़ी मेहनत तथा कई दीनो के उपबोधनो के बाद इनमे से तीन महिलाए मेरे कहने पे शादी करने के लिए राज़ी हुई. मैने इस बात की तरफ कभी ध्यान नही दिया की ये महिलाए अब तक आज़ाद थी, कम से कम इन्हे घूमने फिरने की आज़ादी तो थी ही. और उन्हे इस आज़ादी की आदत सी हो गयी थी. क्या वे शादी जैसे बंधन को निभा पाएँगी? ना ही मैने इस बात की ओर तवज्जो दी कि उनके पिछले जीवन मे वैश्या होने की वजह से उनके पति कभी उनपर विश्वास नही कर पाएँगे, कभी उन्हे वो सम्मान नही दे पाएँगे जो एक पत्नी को हमारे समाज मे मिलता है. मैं इन महिलाओ के पुनर्वāसन को लेके ख़ासी उत्साहित थी परंतु मेरा ये प्रयोग बिल्कुल असफल रहा. कुछ समय बाद उनमे से दो लड़कियो को प्यार तो हुआ किंतु ऐसे पुरुषो से जो मेरी दृष्टि मे उनके पति बनने के योग्य नही थे. एक ने शादी भी कर ली पर विवाह के दो महीने बाद ही मेरे कई बार समझाने के बावजूद अपने पति से अलग हो गयी.

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संन १९८६ मे रानी और अभय ने ‘सोसाइटी फॉर एजुकेशन, एक्शन आंड रिसर्च इन कम्यूनिटी हेल्थ’ नामक संस्था की स्थापना की तथा इसके ज़रिए भारत मे स्वास्थ के शेत्र मे नये प्रतिमान की संरचना की.

मेरे इस समाज सेवा के कार्यो के दौरान मेरे बच्चे हमेशा मेरे साथ रहे और इन घटनाओ का बारीकी से आंकलन भी करते रहे. कई बार वे बिना जाने बुझे इन घटनाओ तथा हमारे बीच हुई बातचीत का अलग ही मतलब निकाल लेते. अमृत, मेरा छोटा बेटा उस वक़्त पाँच साल का था. वह कई बार इन महिलाओ के साथ खेलता था. एक बार अपने भोलेपन मे बड़ी सहजता से उसने मुझसे आकर कहा की उसे भी ‘कॉंडम’ इस्तेमाल करना है ताकि वह अपने साथ खेल रही उन महिलाओ से संक्रमित ना हो जाए.

मैं कई बार ये सोचती हू की हमारे समाज ने औरत और मर्द के लिए कैसे अलग अलग मानदंड बनाए है. उदाहरण के लिए इन वैश्याओ को ही ले लीजिए. समाज इन्हे नीच और बुरा मानता है. उन्हे हीनता से देखता है. पर ये वैश्याए किसकी वासनाओ को पूरा कर रही है? मर्द इनके पास सर उँचा करके जाते है किंतु इन औरतो को सामाजिक शोषण का सामना करना पड़ता है. ऐसी बाते मेरे अपने ही मानदंडो पे एक प्रश्नचिन्ह लगा देते थे. जब मैने एक बार ये सुना की एक विधवा स्त्री का एक पराए मर्द के साथ शारीरिक संबंध है किंतु अपने बच्चो के कारण वो पुनर्विवाह नही कर सकती, तो ये प्रश्न उठा की क्या उस विधवा के चरित्र पर उंगली उठाना सही होगा? नही. हाँ, मैं इतना ज़रूर कर सकती हूँ की उसे इस रिश्ते से जुड़े भयावय परिणामो से अवगत कराऊ तथा उनसे बचने का उपाय बताऊ.

दाईयो के साथ काम करते हुए तथा अशिक्षित महिलाओ को प्रसव सहयोगी बनने का प्रशिक्षण देते हुए मैने अनौपचारिक शिक्षण के कई तरीके जाने. जैसे की गानो और खेल के ज़रिए शिक्षण देना.

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डॉक्टर रानी बंग ने बखूबी से नवीनतम चिकित्सा पद्धति और सॉफ सफाई के नियमो को ग्रामीण जीवनशैली मे ढाला है

एक बहुमूल्य सीख जो मुझे इन दाईयो से मिली वो ये थी की गाँव मे काम करने के लिए यहाँ के लोगो की प्रसव से जुड़ी मान्यताओ को स्वयं भी मानना बेहद ज़रूरी है. उदाहरणार्थ, पहले जब ये दाईयाँ मृत प्रसवे के बारे मे किसिको नही बताती थी तो मुझे लगता था की ये झूठ बोलती है. पर जब इसके बारे मे जानने के लिए मैं उनके पास बैठी तो मुझे ग्यात हुआ की गाँव के लोग मृत प्रसव के इस तथ्य से बिल्कुल अंजान है. उनका ये मानना है की एक बच्चा यदि जन्म लेता है तो वह जीवित ही जन्म ले सकता है. प्रसव के दौरान गर्भाशय मे होने वाले संकुचन का उन्हे बिल्कुल भी ज्ञान नही है. अपितु एक मृत शरीर का गर्भाशय से इस प्रक्रिया द्वारा निकाला जाना उनके लिए एक मिथ्या के अलावा कुछ नही होगा. इस कारण इनका इलाज करने हेतु शरीर रचना के इस विज्ञान से जुड़े पारंपरिक मान्यताओ का भी ज्ञान होना आव्यशक हो जाता है. मिसाल के तौर पर गाँवो मे लोग ‘डायफ्राम’, जो की पेट और वक्षस्थल को विभाजित करता है, के अस्तित्व को ही नही मानते. वे ये मानते है की शरीर के सारे महत्वपूर्ण अंग पेट मे ही होते है. उनकी धारणा है की जिगर या कलेजा शरीर का सबसे ज़रूरी अंग होता है. और गर्भाशय उपर से खुला होता है इसलिए यदि किसी स्त्री को मासिक धर्म के दौरान कम रक्तस्तराव होता है तो वह रक्त जमकर एक गोले के रूप मे कलेजे मे जम जाता है जिससे मृत्यु भी हो सकती है. उनके हिसाब से यदि ‘कॉपर-टी’ जैसा कोई भी गर्भनिरोधक किसी महिला मे प्रविष्ट किया जाए तो वो सीधा पेट तक पहूचकर सारे महत्वपूर्ण अंगो को छू सकता है. इन्ही कारणवश इन लोगो को अपने ही शरीर रचना के बारे मे अधिक से अधिक अवगत कराना बहोत ज़रूरी है.

रानी बंग तथा अभय बंग के इस अभूतपूर्व कार्य ने लाखो ग्रामीण लोगो की जान बचाई है. इनके इस जस्बे को हमारा सलाम.

 

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