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विज्ञान में 90%+ अंक लाते हैं इस सरकारी स्कूल के बच्चे, शिक्षक के तरीकों ने किया कमाल!

अपनी ज़िम्मेदारी और छात्रों के भविष्य के प्रति सजग शशिकुमार हर दिन अपने घर से स्कूल तक 60 किमी तक की दूरी तय करते हैं!

5 सितंबर 2019 को ‘शिक्षक दिवस’ के मौके पर, कर्नाटक के नेलमंगला जिले में यलेकैतनहल्ली गाँव के गवर्नमेंट हाई स्कूल के विज्ञान के अध्यापक, शशिकुमार बी. एस. को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पूरे गाँव में ‘शशि सर’ के नाम से प्रसिद्ध, शशिकुमार बहुत ही अनोखे और दिलचस्प तरीके से अपने छात्रों को पढ़ाते हैं।

अपनी ज़िम्मेदारी और छात्रों के भविष्य के प्रति सजग शशिकुमार हर दिन अपने घर से स्कूल तक 60 किमी तक की दूरी तय करते हैं। फिर स्कूल की छुट्टी होने के बाद, वे स्कूल में बच्चों को एक्स्ट्रा क्लास पढ़ाने के लिए भी रुकते हैं। मूल रूप से, तुमकूर के रहने वाले शशिकुमार न सिर्फ़ बच्चों को विज्ञान के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि उनके प्रयासों के चलते आज इस स्कूल में एक साइंस लैब भी है।

शशिकुमार बताते हैं कि वे कभी भी अपने छात्रों को सिर्फ़ किताबों में से डिक्टेट नहीं करते हैं बल्कि वे हर एक कॉन्सेप्ट पर थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल करवाकर बच्चों को समझाते हैं। इन एक्सपेरिमेंट्स के आधार पर वे छात्रों को अपने नोट्स खुद बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। इससे बच्चों को परीक्षा के समय काफ़ी आसानी होती है।

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राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित शशिकुमार

पिछले 16 साल से बतौर शिक्षक काम कर रहे 42 वर्षीय शशिकुमार एक किसान परिवार से हैं। बचपन से ही वे पढ़ाई में काफ़ी अच्छे रहे। उन्होंने बॉटनी विषय में मास्टर्स की और फिर बीएड, एमफिल भी किया। पढ़ाई के बाद उन्होंने मोरारजी देसाई रेजिडेंट स्कूल से अपना शिक्षण कार्य शुरू किया।

“मैंने जो कुछ भी अपनी पढ़ाई के दौरान सीखा, वो सब मैं अपने छात्रों को सिखाना चाहता हूँ। इसके लिए मुझे अगर थोड़ी ज़्यादा मेहनत भी करनी पड़े, तब भी मैं खुश हूँ। इसलिए मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि बच्चे अपनी दैनिक ज़िंदगी में विज्ञान के विषय को समझें,” उन्होंने आगे कहा।

यह शशिकुमार की कोशिशों का ही नतीजा है कि आज उनके स्कूल में बच्चों के विज्ञान विषय में हमेशा अच्छे नंबर आते हैं। ज़्यादातर बच्चे 90% से ऊपर ही स्कोर करते हैं।

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बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ शशिकुमार अपने ही जैसे और भी बहुत से शिक्षकों के मार्गदर्शक भी हैं। वे राज्य सरकार द्वारा आयोजित किये जाने वाले सेशन में अन्य शिक्षकों को ट्रेनिंग भी देते हैं। उन्होंने ख़ास तौर पर शिक्षकों के लिए 8 मोड्यूल तैयार किये हैं। इसके अलावा, उन्होंने ‘कर्नाटक साइंस टीम’ के नाम से शिक्षकों के लिए एक व्हाट्सअप ग्रुप भी बनाया हुआ है।

वे बताते हैं कि वे जो भी एक्टिविटी अपने स्कूल में बच्चों को करवाते हैं, उसकी विडियो और फोटो लेकर ग्रुप में शेयर करते हैं। इससे अन्य शिक्षकों को भी प्रेरणा मिलती है। उन्होंने अपना एक ब्लॉग और यूट्यूब चैनल भी शुरू किया है।

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उनके प्रयासों से बनी स्कूल में साइंस लैब

इस सबके अलावा, शशिकुमार ने बहुत ही सरल और स्पष्ट भाषा में लगभग 10 विज्ञान के स्टडी मोड्यूल लिखे हैं और इन मोड्यूल को उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही सामाजिक संस्थाओं को दिया है, वह भी बिल्कुल मुफ़्त। आज उनके लिखे हुए इन नोट्स से तीन हज़ार से भी ज़्यादा गरीब छात्रों को फायदा मिल रहा है।

“साल 2011 में मेरी इस स्कूल में नियुक्ति हुई थी। तब स्कूल में बच्चे बहुत ही कम थे, अभी हमारे पास आठवीं, नौवीं और दसवीं कक्षा में कुल 60 बच्चे पढ़ रहे हैं।”

बच्चों की संख्या कम होने के चलते सरकार की तरफ से स्कूल के लिए कोई ख़ास फंडिंग नहीं आती है। पर शशिकुमार का मानना है कि बच्चे चाहे 10 हो या 100, हर एक का भविष्य हमारे लिए ज़रूरी होना चाहिए। इसलिए जितने भी बच्चे हों, उनके लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध करवाना हमारी ज़िम्मेदारी है।

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इसलिए शशिकुमार ने अपने स्तर पर ही गाँव वालों, सामाजिक संगठनों और कुछ निजी दानदाताओं की मदद से स्कूल में कई सुधार कार्य करवाएं हैं। बच्चों के लिए प्रोजेक्टर, कंप्यूटर, लैब और अन्य तरह की गतिविधियों के लिए बहुत-सी ज़रूरी चीज़ें उन्होंने सबकी मदद से जुटाई हैं। शशिकुमार का उद्देश्य अपने छात्रों को ‘कम लागत और जीरो लागत’ के मॉडल तैयार करवाना है, जिससे वे विषय को समझे भी और साथ ही, ‘बेस्ट आउट ऑफ़ वेस्ट’ की एक्टिविटी भी हो जाए।

छात्रों को सभी कॉन्सेप्ट प्रैक्टिकल करके समझाते हैं

आज उनके पढ़ाए हुए कई छात्र मेडिकल और इंजीनियरिंग क्षेत्र में अच्छे कॉलेज में पढ़ रहे हैं। मैसूर से एमडी की पढ़ाई करने वाले डॉ. नरेशचारी, मोरारजी देसाई स्कूल में उनके छात्र थे। वे आज भी विज्ञान विषय में अपनी रूचि का श्रेय अपने शिक्षक शशिकुमार को देते हैं।

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शशिकुमार का अपने छात्रों से रिश्ता सिर्फ़ स्कूल तक सीमित नहीं है। वे पढ़ाई से परे जाकर भी बच्चों की मदद करते हैं।

शाम को 6:30 बजे तक चलने वाली एक्स्ट्रा क्लास के बाद, जिन भी बच्चों के घर दूर हैं, उन्हें वे खुद घर छोड़कर आते हैं और बहुत बार उनके रिक्शे से आने-जाने का किराया खुद भरते हैं। क्योंकि ये सभी बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं। वे बताते हैं कि किसी-किसी बच्चे का घर तो दस किमी से ज़्यादा दूर है।

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शशिकुमार सिर्फ़ पढ़ाई के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों में अपने छात्रों का मार्गदर्शन करते हैं। समय-समय पर स्कूल में जल-संरक्षण, पौधारोपण, प्लास्टिक-फ्री सोसाइटी जैसे प्रोग्राम होते रहते हैं, ताकि बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरुक किया जा सके।

शिक्षक दिवस पर शशिकुमार को सम्मान मिलने से अब इलाके के बहुत से लोग उन्हें जानने लगे हैं। कई निजी संगठन स्कूल के विकास कार्यों में योगदान देने के लिए भी आगे आ रहे हैं। इस पर शशिकुमार सिर्फ़ एक ही बात कहते हैं,

“आपका व्यवहार बदलाव लाता है। कभी किसी सम्मान के लिए काम मत करो बल्कि उन छात्रों के लिए करो जिनका भविष्य तुम्हारे हाथ में है। अगर तुम अपने काम के प्रति ज़िम्मेदार और सजग रहोगे तो सम्मान खुद ब खुद तुम्हारे पास आ जाएगा।”

संपादन – भगवती लाल तेली


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