अपनी 26 माह की बेटी को खोने के बाद इस दंपत्ति ने दान की उसकी आँखें, दो को मिली ज़िंदगी

jharkhand couple

वंशिका के माता-पिता की इच्छा किडनी व हार्ट डोनेशन की भी थी, लेकिन उनकी एक ही इच्छा आँखों के डोनेशन के रुप में पूरी हो पाई।

झारखंड के गुमला जिले के आदिवासी दंपति ने जीवन के सबसे मुश्किल हालात में भी अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए अनूठी मिसाल पेश की है। जनजातीय दंपत्ति सुलेखा पन्ना एवं चंद्रप्रकाश के ऊपर दुखों का एक बड़ा पहाड़ टूट पड़ा। दुःख ऐसा कि किसी भी परिवार की नींव हिल जाए। आमतौर पर लोग अपनों की मृत्यु से टूट जाते हैं, खासतौर पर जब मरने वाला उनके कलेजे का टुकड़ा हो, तो माता पिता के कलेजे पर पत्थर रखना भी मुश्किल हो जाता है।

13 जुलाई 2020 को अपने माता-पिता की चहेती, 26 माह की चुलबुली बच्ची वंशिका सरना की खेलने के दौरान बालकनी से गिर कर मृत्यु हो गई थी। वंशिका को सर में काफी चोट आई थी, माता-पिता ने बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। इकलौती बेटी वंशिका की असमय मृत्यु के बाद माता-पिता के जीवन में मानो अंधेरा सा छा गया।

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वांशिका

लेकिन जीवन की इस सबसे कठिन परिस्थिति में भी वंशिका की माँ सुलेखा ने अपनी बेटी की आँखों को दान करने का फैसला यह सोचकर लिया कि वंशिका तो अब वापस नहीं आ सकती लेकिन उसकी खूबसूरत आँखों की चुलबुलाहट तो बरक़रार रहे।

वंशिका की माँ सुलेखा अपने बेटी की असमय मृत्यु के दर्द को दिल में समेटे नम आँखों से बताती हैं, “वंशिका तो चली गई शायद भगवान ने इतने ही दिनों का साथ लिखा था, लेकिन उसकी आँखें आज भी इस दुनिया को देख रही हैं और दो परिवारों को अंगदान के जरिए जीवन की हर खुशियाँ दे रही हैं। मुझे संतोष है कि मैं अपने बेटी को तो नहीं बचा पाई लेकिन वह किसी न किसी रुप में इस दुनिया में है।”

वंशिका की तस्वीर को देखते हुए सुलेखा अपने आँसू रोक नहीं पातीं। अपने गमों को पीकर खुद को मजबूत बनाते हुए सुलेखा बताती हैं, “राँची पहुँचकर भी जब हम अपनी बेटी को नहीं बचा पाए तो मैं खुद को संभाल ही नहीं पा रही थी। लेकिन मुझे नहीं पता कि अचानक मुझे क्या हुआ और मैंने अपनी बेटी की आँखों को दान करने का फैसला किया। मेरे पति ने भी अपनी हामी भर दी। मुत्यु के 6 घंटे के अंदर ही आई डोनेशन का कार्य पूरा करना होता है। राँची के सदर अस्पताल को मैं धन्यवाद देना चाहती हूँ, जिसकी वजह से मुझे चंद मिनटों में डेथ सर्टिफिकेट उपलब्ध हो सका और फिर मैंने कश्यप मेमोरियल हॉस्पिटल में जाकर अपनी बेटी की आँखों का दान किया। अपनी बेटी के शव को गोद में लेकर जब आई डोनेशन के लिए अस्पताल पहुँची तो मुझे हौसला सिर्फ एक बात का था कि कम से कम अपनी बेटी की आँखों को तो मैं बचा पाऊंगी और मैं उसमें सफल रही।”

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सुलेखा अपनी बच्ची वंशिका के साथ

पल भर में छिन गई दो साल की खुशियां

वंशिका के पिता चंद्रप्रकाश ने बताया कि उनकी पत्नी सुलेखा पन्ना बैंक में काम करती हैं। शादी का लंबा वक्त गुजर चुका था। 40 साल की उम्र में वह माँ बनी। वंशिका के आने से मानों पूरा घर रोशन हो गया था। चंद्रप्रकाश बताते हैं, “वंशिका की यादें हमारे साथ हैं और उसने दो लोगों के जीवन को खुशियाँ दी हैं इसका गर्व हमारे साथ है।”

अंग दान है महादान

सुलेखा बताती हैं, समाज में रक्त दान तो होता है, लेकिन नेत्र दान समेत अंग दान के लिए काफी जागरुकता की जरुरत है। मैंने अपनी बेटी के आँखों को दान करते समय ही अपनी और अपने पति की भी आँखें दान करने के लिए रजिस्ट्रेशन करा लिया है। जीवन में दूसरों के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा बिल्कुल अलग होता है। मुझे लगता है कि अंगदान के लिए समाज में अभी काफी कुछ करना बाकी है, लेकिन छोटे-छोटे प्रयासों से लोगों में जागरुकता आएगी और लाखों जरुरतमंदों को फायदा होगा।

रांची के कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल मे वंशिका का कॉर्निया डोनेशन हुआ। अस्पताल की डायरेक्टर डॉ. भारती कश्यप ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताती हैं कि वंशिका के माता पिता अपनी बेटी के शव के साथ आए थे। एक ओर उनकी आंखों में आंसू थे तो दूसरी ओर किसी की अंधी दुनिया में रोशनी लाने का नायाब सपना भी था। ऐसे में उनके अस्पताल की टीम ने डॉ. निधि के नेतृत्व में वंशिका का सफलतापूर्वक कॉर्निया डोनेशन किया। डॉक्टर कश्यप बताती हैं, “वंशिका के माता पिता की इच्छा किडनी एवं हर्ट डोनेशन की भी थी, लेकिन उनकी एक ही इच्छा आँखों के डोनेशन के रुप में हमारे अस्पताल में पूरी हो पाई। राँची में इन सुविधाओं का अभाव है।” डॉ कश्यप कहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आई डोनेशन समेत अंगदान के लिए आगे आना चाहिए ताकि दूसरों के जीवन में रोशनी भरी जा सके।

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सुलेखा को इस बात की तसल्ली है कि वह अपनी बेटी की आँखों को तो बचा सकीं।

अंग दान सचमुच महादान है, पूरे देश में सिर्फ एक फीसदी लोग सालाना आँख दान करते हैं, वहीं पूरे झारखंड में पिछले दो सालों में सिर्फ 80 लोगों ने अपनी आँखें दान की हैं। जरुरतमंदों को आज भी कॉर्निया के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है।

सामाजिक दायित्व की इतनी गहरी समझ और इतना समर्पण विरले ही देखने को मिलता है, जो झारखंड के इस आदिवासी दंपति ने कर दिखाया। आज भी उनकी आँखों में वंशिका के दुनिया छोड़ कर चले जाने का दर्द साफ झलकता है लेकिन अंगदान के जरिए समाज में मिसाल कायम करने का साहस और जज्बा उनको जीवन के इस कठिन डगर में आगे बढ़ने का हौसला भी देता है। आने वाले दिनों में इस पहल से सीख लेकर लोग अंगदान से जरुर जुड़ेंगे।

संपादन- पार्थ निगम

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