लॉकडाउन और कोविड-19 के इस मुश्किल समय में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से डिजिटल माध्यमों पर आश्रित हो गई है। झारखंड में सरकार ने रोजाना सुबह 10 से 12 बजे तक विभिन्न कक्षाओं की पढ़ाई के लिए दूरदर्शन पर टेलिकास्ट का समय निर्धारित किया है जो काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन झारखंड में आज भी लाखों की आबादी डिजिटल माध्यमों से काफी दूर है। लॉकडाउन के इस समय में ऐसे परिवार के बच्चों की पढ़ाई लगातार बाधित है जिनके घर न तो टीवी है और न ही स्मार्टफोन। इस विकट परिस्थिति में राज्य की उपराजधानी दुमका एवं सुदूर जिले पलामू के कुछ शिक्षकों ने अनोखा प्रयोग किया है।
राजधानी रांची से करीब 220 किमी दूर दुमका के बनकाठी गाँव के उत्क्रमित मध्य विद्यालय के शिक्षक श्याम किशोर ने अपने सहयोगियों के साथ आपदा की इस घड़ी में गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। बनकाठी के इस विद्यालय में पहली से आठवीं कक्षा तक के छात्र हैं और लॉकडाउन के बाद से ही श्याम समेत अन्य शिक्षक व्हाट्सएप के जरिए बच्चों को पढ़ाई करा रहे थे।
90 फीसदी आदिवासी परिवार वाले बनकाठी गाँव में 246 बच्चों में से सिर्फ 46 परिवार के पास ही स्मार्ट फोन था। करीब 15 दिन तक इसी माध्यम से पढ़ाई कराते हुए श्याम को अहसास हुआ कि वह सभी बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं।
श्याम ने द बेटर इंडिया को बताया, “46 बच्चों का भी व्हाट्सएप के जरिए रिस्पॉन्स अच्छा नहीं था तो मैं एक दिन गाँव पहुँचा और देखा कि बच्चे पढ़ाई के नाम पर फोन लेकर सिर्फ गेम में उलझे हैं। फिर मैंने उन बच्चों से भी मुलाकात की जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं है। उन बच्चों की पढ़ाई के प्रति लालसा देखकर मैं खुद को रोक नहीं पाया। मुझे लगा कि समाज के सबसे निचले तबके के इन छात्रों के लिए जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं हैं, हमें कुछ करना चाहिए।”
गाँव में बच्चों से मिलने के बाद श्याम ने अपने साथी शिक्षकों के साथ चर्चा की। करीब 15 दिन मंथन के बाद श्याम समेत अन्य शिक्षकों ने बच्चों को लाउडस्पीकर के जरिए पढ़ाने का निर्णय लिया। श्याम और उनके अन्य साथी शिक्षकों ने अपने खर्च से गाँव में कई स्थानों पर लाउडस्पीकर लगवाये। उसके बाद माइक के जरिए सभी शिक्षक रोजाना 2 घंटे लाउडस्पीकर पर क्लास लेने लगे औऱ इस पूरे काम में ग्रामीणों ने भी उनका साथ दिया।
उत्क्रमित मध्य विद्यालय बनकाठी की कक्षा 8 की छात्रा सबिता कुमारी बताती हैं, “लाउडस्पीकर के जरिए पढ़ाई करने से मुझे लाभ मिला है। हमारे पास स्मार्टफोन नहीं था लेकिन अब हम भी अपनी पढ़ाई कर पा रहे हैं और सर हमें रोजाना 2 घंटे में सभी विषयों की पढ़ाई कराते हैं। ”
श्याम के सहकर्मी शिक्षक दीपक दुबे बताते हैं, “श्याम सर ने आईडिया दिया कि बच्चे कितना सीख पा रहे हैं, हमें यह भी देखना चाहिए। फिर हमलोगों ने सोशल डिस्टेंसिंग एवं सभी नियमों का पालन करते हुए कुछ बच्चों के साथ प्रोजेक्टर के जरिए भी क्लास ली। हमने देखा कि लाउडस्पीकर से पढ़ाई गई चीजें उन्हें याद है।”
दुमका के श्याम किशोर झारखंड के इकलौते शिक्षक नहीं हैं जो सरकारी स्कूल के बच्चों को उच्च गुणवत्ता शिक्षा देने के लिए प्रयासरत हैं। पलामू जिले के हुसैनाबाद स्थित एकडहरी उत्क्रमित मध्य विद्यालय के शिक्षक निर्मल कुमार ने भी अनोखा प्रयोग किया है। उनके विद्यालय में करीब 6 गाँव के बच्चे आते हैं। निर्मल ने अपने साथी शिक्षकों के साथ बैठक की और यह फैसला लिया कि रोजाना सुबह डेढ़ से दो घंटे खुले आसमान के नीचे गाँव में सोशल डिस्टेंसिग का पालन करते हुए बच्चों को पढ़ाया जाएगा।
निर्मल बताते हैं, “पहले दिन बच्चों को घर के कपड़े एवं सूई धागे से मास्क बनाना सिखाया गया और कोविड-19 से बचाव पर चर्चा की गई और उसके बाद से लगातार बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।”

इस कठिन वक्त में निर्मल और श्याम जैसे शिक्षक मिसाल पेश कर रहे हैं। द बेटर इंडिया शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के अनूठे प्रयोग करने वाले शिक्षकों को सलाम करता है।
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