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पिता किसान, पैरों से दिव्यांग पर भारत के लिए ले आए क्रिकेट वर्ल्ड कप!

महाराष्ट्र के जेजुरी शहर के पास बसे एक छोटे से गाँव नाज़रे सुपे से आने वाले कुणाल ने 2011 में पहली बार क्रिकेट की गेंद देखी थी।

“मैं अपने आप को खुशनसीब समझता हूँ कि मुझे मैन ऑफ़ द मैच का ख़िताब दिया गया। इससे ज्यादा ख़ुशी मुझे इस बात की है कि मेरे देश को जिताने के लिए मैं भी कुछ कर पाया,” 25 वर्षीय कुणाल फणसे ने इंग्लैंड के खिलाफ भारत की ऐतिहासिक जीत के बाद लिखा!

यह कोई साधारण मैच नहीं था। कुणाल फिजिकल डिसेबिलिटी क्रिकेट वर्ल्ड सीरीज टी20 में भारत की टीम के लिए खेल रहे थे। 13 अगस्त 2019 को लन्दन से 200 किमी दूर वोर्सस्टर के न्यू रोड स्टेडियम में हो रहे इस फाइनल मैच में भारत ने मेज़बान इंग्लैंड को 36 रनों से हराया था। एक बेहतरीन ऑल राउंडर की भूमिका निभाते हुए भारत को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले कुणाल को मैन ऑफ़ द मैच चुना गया।

 

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पर कुणाल के लिए यहाँ तक का सफर इतना आसान नहीं था। महाराष्ट्र के जेजुरी शहर के पास बसे एक छोटे से गाँव नाज़रे सुपे से आने वाले कुणाल ने 2011 में पहली बार क्रिकेट की गेंद देखी थी। इससे पहले अपने गाँव में वह बच्चों की गेंद से ही क्रिकेट खेलते आ रहे थे।

इंग्लैंड में ‘मैन ऑफ़ द मैच’ की ट्राफी लेते हुए कुणाल

कुणाल के पिता, दत्तात्रेय फणसे एक किसान हैं और माँ, उषा फणसे भी घर के साथ-साथ खेतों में उनकी मदद करतीं हैं। तीन बड़ी बहनों के सबसे छोटे भाई कुणाल को बचपन से ही क्रिकेट का शौक था। पर बचपन में एक ऐसा हादसा हुआ कि उनके दायें पैर का ऑपरेशन करना पड़ा और वह बाएं पैर के मुकाबले छोटा रह गया। फिर भी कुणाल ने खेलना नहीं छोड़ा। अक्सर स्कूल के बाद वे अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलते नज़र आते।

 

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पर किसान पिता के लिए उनकी शिक्षा सबसे ज्यादा ज़रूरी थी, इसलिए अपने खेल की वजह से उन्हें अक्सर डांट पड़ती।

जीत के बाद अपने गाँव लौटकर कुणाल अपने माता-पिता के साथ

“मेरे पिताजी को पढ़ने का बहुत मन था, पर घर के हालातों की वजह से वे पढ़ नहीं पायें। इसलिए उनका सपना था कि मैं और मेरी बहने पढ़ लिखकर खूब आगे बढ़े। गाँव में रहते हुए भी उनकी सोच बहुत ऊँची थी।” द बेटर इंडिया से बात करते हुए कुणाल ने कहा।

कुणाल के पिता की 5 एकड़ ज़मीन है और महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में अक्सर सूखा पड़ता है। ऐसे में, सीमित आय होते हुए भी उन्होंने लोन ले लेकर अपने बच्चों को पढ़ाया। सभी बेटियों को होस्टल में रखकर उच्च शिक्षा दी और कुणाल को भी दसवीं के बाद पढ़ने के लिए पुणे भेज दिया।

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“मेरी सबसे बड़ी बहन टीचर हैं, दूसरी इंजीनियर और तीसरी ने एम.कॉम किया है। मेरे लिए भी मेरे माता-पिता ने यही सोचा था कि मुझे खूब पढ़ाएंगे, इसलिए मेरे खेल-कूद से अक्सर उन्हें नाराज़गी रहती थी। पर वे अपनी जगह सही थे। हमारे देश में खेल-कूद में भविष्य बनाना इतना आसान तो नहीं है न,” कुणाल कहते हैं।

कुणाल अपनी तीन बड़ी बहनों के साथ

कुणाल ने भी कभी नहीं सोचा था कि वे खेल को कभी अपना करियर बना पाएंगे। पर यह सोच तब बदली जब उन्होंने 2011 में पुणे के ‘आबासाहेब गरवारे कॉलेज’ में 11वीं में दाख़िला लिया। यहाँ कुणाल कॉलेज में हो रहे छोटे-मोटे मैचस में हिस्सा लेने लगे और एक साल के भीतर ही उन्हें एक अच्छे खिलाड़ी के तौर पर जाना जाने लगा।

यहीं पर उन्हें फिजिकली चैलेंज्ड क्रिकेट के बारे में भी पता चला और 2012 से उन्होंने उसमें भाग लेना शुरू कर दिया।
अपने माता-पिता के सपने को सबसे ऊपर रखने वाले कुणाल के लिए पढ़ाई अब भी सबसे ज्यादा ज़रूरी थी। इसलिए बारहवीं के बाद उन्होंने पुणे के ही ‘वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी’ से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इस दौरान भी उनका खेल जारी रहा और उन्हें पहले इंटर कॉलेज और फिर राज्य स्तर पर खेलने का मौका मिला।

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पर कुणाल अपने खेल की ज़रूरतों का खर्च अपने माता-पिता के कंधे पर नहीं डालना चाहते थे, इसलिए उन्होंने थोड़े समय के लिए कॉल सेंटर में नौकरी कर ली। इन पैसों से उन्होंने अपने क्रिकेट का सामान लिया और उनके रोज़मर्रा के ख़र्चों का भी इंतज़ाम हो गया।


जैसे-जैसे क्रिकेट में उन्हें सफलता मिलती जा रही थी, वैसे-वैसे इस खेल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए खेलने की उनकी इच्छा तीव्र होती जा रही थी।

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आखिर साल 2015 में उनकी यह इच्छा पूरी हुई। कुणाल को बांग्लादेश में हो रहे फाइव नेशन्स क्रिकेट टूर्नामेंट में खेलने के लिए भारत की टीम में चुना गया। इस मैच के बाद कुणाल ने दोबारा मुड़कर नहीं देखा। घरवालों ने भी अब कुणाल का साथ देना शुरू कर दिया था और उनके फैन्स का प्यार तो उनके साथ था ही।

2018 के ओडीआई सीरिज़ में कुणाल अफगानिस्तान के खिलाफ खेलते हुए बेस्ट बैट्समैन का ख़िताब मिला और अब 2019 में वर्ल्ड क्रिकेट सीरिज़ में वे ‘मैन ऑफ़ द मैच’ चुने गए।

“मेरे लिए यह वर्ल्ड कप हमेशा सबसे ख़ास रहेगा। अपने देश के लिए खेलना और उसकी जीत में योगदान देने में जो ख़ुशी है, वो शायद किसी और बात में नहीं,” कुणाल ने भावुक होते हुए कहा।

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पर क्या सिर्फ देश के लिए खेलना काफी है? वह क्या है जिसकी कमी आज भी उन्हें महसूस होती है?

इस सवाल का जवाब देते हुए कुणाल ने कई ऐसे तथ्य उजागर किये, जो इस खेल के दूसरे पहलू को उजागर करती है।

“वर्ल्ड सीरिज़ में जितने भी टीम आयें थे, वो सभी वहां के राष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड से पारित थे, फिर चाहे वो इंग्लैंड हो, बांग्लादेश या पाकिस्तान. बस भारत ही एक ऐसी टीम थी जिसे बीसीसीआई की मान्यता नहीं थी,” कुणाल ने बताया.

भारत में पहले दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए क्रिकेट का कोई टूर्नामेंट नहीं हुआ करता था। यह पूर्व क्रिकेटर अजित वाडेकर ही थे, जिन्हें 1971 की ऐतिहासिक जीत के बाद भारत लौटने पर इस बात का ख्याल आया।

 

1988 में वाडेकर ने ऑल इंडिया क्रिकेट एसोसिएशन फॉर फिजिकली चैलेंज्ड (AICAPC) की नींव रखी।

स्वर्गीय अजित वाडेकर के साथ कुणाल

वाडेकर ने कई कोशिशें की, कि इसे बीसीसीआई की मान्यता मिल जाए पर ऐसा कभी नहीं हो पाया। उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक खुद फंड इकट्ठा कर इस एसोसिएशन को बनाए रखा और दिव्यांग खिलाड़ियों को क्रिकेट खेलने के लिए प्रोत्साहित करते रहें, जिनमें से एक कुणाल भी थे।

“अब तक हमें कोई भी आर्थिक मदद नहीं मिलती थी। फिटनेस के लिए भी हम खिलाड़ियों से जितना हो पाता वही हम करते। कोचिंग, डायट या बाकी सुविधाएँ जैसी भारतीय क्रिकेट टीम को मिलती हैं, वैसी हमें नहीं मिलती थीं। एक मैच खेलने पर हमें ज्यादा से ज्यादा 500-1000 रूपये ही मिलते थे। पर इस वर्ल्ड सिरीज़ में सब कुछ बेहतर था। हमें नए किट मिलें, बेहतरीन कोच से कोचिंग मिली और हमारी हर ज़रूरत का ध्यान रखा गया। और देखिये इसका नतीजा आपके सामने ही है कि हम वर्ल्ड कप जीत गए,” कुणाल कहते हैं।

इस बदलाव का श्रेय कुणाल स्वर्गीय अजीत वाडेकर को तो देते ही है, साथ ही उनका कहना है कि AICAPC के जनरल सेक्रेटरी रवि चौहान का इस जीत में बहुत बड़ा योगदान रहा। उनके मुताबिक अजित वाडेकर के दोस्त अनिल जोगलेकर के सहयोग के बिना भी यह जीत असंभव थी, जिन्होंने इस इस टीम को फंड किया था।

कुणाल ने जब से क्रिकेट खेलना शुरू किया था, तब से अब तक वे एक ही नी पैड (knee pad) इस्तेमाल कर रहे थे। यहाँ तक कि जब उन्हें पहली बार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने बांग्लादेश जाना था, तब भी उन्होंने अपने इस सफ़ेद पैड को नीला पेंट लगाकर पहना था। पर इस बार की सिरीज़ में उन्हें नया किट दिया गया और उन्होंने 7 सालों में पहली बार नया पैड पहनकर खेला।

“चीज़ें अब बदल रहीं हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को अब फिजिकली चैलेंज्ड क्रिकेट के बारे में पता चल रहा है। और अब बीसीसीआई भी इस पर ध्यान देने लगा है। मुझे पूरी उम्मीद है कि अब दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए भी क्रिकेट एक करियर बन पायेगा,” एक बेहतर कल की उम्मीद लिए कुणाल हमसे विदा लेते हैं।

कुणाल को बधाई देने के लिए और उनका हौसला बढ़ाने के लिए आप उनसे फेसबुक पर संपर्क कर सकते हैं!


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