गाँधी जी के साथ 180 किलोमीटर मार्च कर, इस महिला स्वतंत्रता सेनानी ने छेड़ी थी अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग!

3 नवंबर 1917 को जन्मीं अन्नपूर्णा महाराणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थी। इसके अलावा वह एक प्रमुख सामाजिक और महिला अधिकार कार्यकर्ता भी थीं। अन्नपूर्णा, महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थी। 96 वर्ष की उम्र में 31 दिसम्बर 2016 को उन्होने दुनिया से विदा ली। 

गाँ धी जी द्वारा शुरु किये गये आज़ादी के आन्दोलन में सबसे अहम भूमिका आम महिलाओं ने निभाई थी। कभी अपने घर की चौखट तक न लांघने वाली ये महिलाएं गाँधी जी का साथ देने के लिए अपने घरों से निकलकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गयी। गाँधी जी के साथ कदम से कदम मिलाकर दांडी यात्रा करने से लेकर अग्रेज़ों के ख़िलाफ़ असहयोग आन्दोलन करने तक, आज़ादी के सपने को पूरा करने के लिए हर जतन में इन महिलाओं का पूरा सहयोग रहा।

इन्हीं महिलाओं में एक नाम था, अन्नपूर्णा महाराणा का।

अन्नपूर्णा महाराणा

3 नवंबर 1917 को जन्मी अन्नपूर्णा महाराणा, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थी। वे एक प्रमुख सामाजिक और महिला कार्यकर्ता भी रहीं। ‘चुनी आपा’ के नाम से जानी जाने वाली अन्नपूर्णा, आज़ादी की लड़ाई के दौरान, महात्मा गांधी के क़रीबी सहयोगियों में से एक थी।

अन्नपूर्णा के माता-पिता, रमा देवी और गोपबंधु चौधरी भी स्वतंत्रता संग्राम में सक्रीय थे, और इसलिए 14 साल की उम्र से ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। इंदिरा गाँधी द्वारा बनाए गये बच्चों की ब्रिगेड ‘बानर सेना’ का हिस्सा बनकर उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम में अपना पहला कदम रखा।

1934 में वह महात्मा गांधी के पुरी से भद्रक तक के “हरिजन पद यात्रा” रैली में ओडिशा से जुड़ गईं। अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, सविनय अवज्ञा अभियान के दौरान अन्नपूर्णा को कई बार गिरफ्तार किया गया और 1942 से 1944 तक ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ओडिशा के कटक जेल में बंद कर दिया था।

कारावास के दौरान ही उन्होंने आजीवन गरीबों की सेवा करने का प्रण लिया। स्वतंत्रता के बाद, अन्नपूर्णा भारत में महिलाओं और बच्चों की आवाज़ बनी। उन्होंने क्षेत्र के आदिवासी बच्चों के लिए ओडिशा के रायगड़ा जिले में एक स्कूल खोला। अन्नपूर्णा विनोबा भावे द्वारा शुरू किये गये भूदान आन्दोलन का भी हिस्सा बनी।

साथ ही उन्होंने चंबल घाटी के डकैतों के पुर्नवसन के लिए भी काम किया, ताकि ये सभी लोग डकैती छोड़कर अपने परिवारों के पास लौट सकें।

इमरजेंसी के दौरान उन्होंने अपनी माँ रामदेवी चौधरी के ग्राम सेवा प्रेस द्वारा प्रकाशित अख़बार की मदद से विरोध जताया। सरकार ने इस समाचार पत्र पर प्रतिबंध लगा कर रामदेवी और अन्नपूर्णा के साथ उड़ीसा के अन्य नेताओं जैसे नाबक्रुश्ना चौधरी, हरिकेष्णा महाबत, मनमोहन चौधरी, जयकृष्ण मोहंती आदि को भी गिरफ्तार कर लिया था।

इसके अलावा उन्होंने महात्मा गाँधी और आचार्य विनोबा भावे के हिंदी लेखों को उड़िया भाषा में भी अनुवादित किया है। देश के लिए उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें ‘उत्कल रत्न’ से सम्मानित किया गया था। इस महान देश्हक्त ने 96 वर्ष की उम्र में 31 दिसम्बर 2016 को दुनिया से विदा ली।

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(संपादन – मानबी कटोच)


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