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Sachin Kothari In Devbhoomi Plant Nursery, Dehradun

शहर में लैपटॉप के इर्द गिर्द घूमती जिंदगी छोड़ पहाड़ में डाला डेरा, शुरू की देवभूमि नर्सरी

दिल्ली में कॉरपोरेट नौकरी कर रहे सचिन कोठारी ने जॉब छोड़ दी और देहरादून वापस चले गए। वहां उन्होंने देवभूमि plant nursery शुरू की और आज वह गेंदा, बोक चोय, बैंगन, जैसे फूलों व सब्जियों की 20 से ज्यादा किस्मों की पौध बेचते हैं।

अपने गांव को छोड़ शहरों में बसेरा करने वाले आपको अनगिनत लोग मिल जाएंगे। लेकिन महानगरों की चमचमाती जिंदगी और अच्छी खासी नौकरी को अलविदा कहकर अपने घर की ओर वापस लौटने वाले कम ही होते हैं। दरअसल, गांव में जो सुकून और माहौल मिलता है, उसके बाद तनाव भरी शहरी जिंदगी उन्हें रास नहीं आती। देहरादून में जन्मे सचिन कोठारी (Sachin Kothari) ने भी कुछ ऐसा ही किया।

वह कई सालों तक कॉरपोरेट नौकरी कर, सपनों की जिंदगी जीते आ रहे थे। जहां पैसा भी था और सम्मान भी। अगर कुछ नहीं था, तो वह थी मानसिक शांति, जिसे पाने के लिए वह सब कुछ छोड़-छाड़कर देहरादून वापस लौट आए और यहां आकर एक नर्सरी की शुरुआत (Plant Nursery) की।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए वह कहते हैं, “मैंने दिल्ली में साल 2008 से लेकर 2011 तक कॉरपोरेट सेक्टर में काम किया और इस दौरान चार कंपनियां बदली। हर बार एक बेहतर कंपनी और पहले से बेहतर सैलरी। फिर मुझे एहसास हुआ कि मेरी व्यस्त, तनावभरी प्रोफेशनल जिंदगी में तो कभी कोई बदलाव आया ही नहीं और शायद आएगा भी नहीं, चाहे मैं कितनी भी कंपनिया क्यों न बदल लूं।”

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कहां से मिली Plant Nursery शुरू करने की प्रेरणा?

33 साल के सचिन एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल थे। उनका कहना है कि कंपनियां तो बदलती रहीं, मगर काम करने का ढंग वही रहा। वह बताते हैं, “व्यस्त दिनचर्या, बेहिसाब घंटों तक थका देने वाला काम, वीकेंड मीटिंग और एक अव्यवस्थित सुस्त जीवनशैली। मेरे दिन के अधिकांश घंटे लैपटॉप पर नजर गड़ाए काम करने में बीत रहे थे। कभी न खत्म होने वाले टारगेट के पीछे भागते-भागते मेरी सेहत पर खासा असर पड़ रहा था।”

सचिन (Sachin Kothari) को जल्द ही एहसास हो गया कि वह कॉर्पोरेट जीवन के लिए नहीं बने हैं। उन्होंने बताया, “मैंने विकल्प तलाशने शुरू कर दिए। मैं अपने एक रिश्तेदार से काफी प्रभावित था। उनकी देहरादून में एक plant nursery है। मैं अपना ज्यादातर खाली समय उनके साथ plant nursery में बिताने लगा और मुझे व्यवसाय के तौर पर यह काम जंच गया।” आज इसी व्यवसाय की बदौलत सचिन लाखों रुपये कमा रहे हैं। ना तो यहां टारगेट पूरा करने की होड़ है और न ही तनाव भरी जिंदगी। 

Dev Bhoomi Plant Nursery of Sachin Kothari in Dehradun
Devbhoomi Nursery in Dehradoon

आज वह अपने पसंद का काम करके काफी खुश हैं। लेकिन क्या सचिन के लिए नौकरी छोड़कर plant nursery शुरु करने का सफर आसान रहा? शायद नहीं। 

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Plant Nursery शुरू करने के अपने पहले प्रयास में वह पूरी तरह से असफल रहे। हांलाकि, काफी रिसर्च के बाद ही उन्होंने Plant Nursery की योजना पर काम करना शुरु किया था। मगर कुछ ऐसा था, जिसकी वजह से उन्हें निराश होना पड़ा। सचिन कहते हैं, “शुरुआत करने से पहले, मैंने इस क्षेत्र के बारे में काफी जानकारी इकट्ठा की थी। फिर मैंने एक दोस्त को अपने साथ काम करने के लिए तैयार किया। उसके पास जमीन थी, हम दोनों ने अपने बिजनेस पर 6 लाख रुपये निवेश करने का फैसला किया।”

दोस्त ने छोड़ा साथ

वह याद करते हुए बताते हैं, “मेरे पास 1.5 लाख रुपये थे। इतने ही पैसे अपने पिता से उधार लिए और तीन लाख रुपये मेरे दोस्त ने मिलाए और इस तरह से हमने ‘देवभूमि नर्सरी’ (Devbhoomi Nursery) की शुरुआत की। साल 2012 में मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और नर्सरी को अपना पूरा समय देने लगा।” उनके पास न तो अनुभव था और न ही किसी का सही मार्गदर्शन व समर्थन। वे दोनों अपने पहले प्रयास में असफल हो गए।

उनके पौधे मर रहे थे। वे पौधों के लिए आवश्यक मिट्टी, कोकोपीट और उर्वरक मिश्रण की पहचान करने में असमर्थ रहे। उनके हाथ से बिज़नेस जा रहा था। इसे देख उनके दोस्त ने अपने हाथ खड़े कर दिए और उनका साथ छोड़ दिया। अब सचिन को सबकुछ अकेले ही संभालना था। हालात देखकर उनके माता-पिता भी फिर से नौकरी ढूंढने और कॉरपोरेट जीवन में लौटने के लिए कहने लगे।

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सचिन (Sachin Kothari) ने बताया, “मैं अपने सपने को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। मैंने अपने उस रिश्तेदार और विशेषज्ञों से सलाह ली। इसके अलावा, इंटरनेट के जरिए पौधों के बारे में जानने, उन्हें उगाने के लिए सही वातावरण और उपजाऊ मिट्टी का मिश्रण बनाना सीखा। मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।”

सौ प्रतिशत फायदे वाला बिजनेस मॉडल

सचिन (Sachin Kothari) ने अगले तीन साल अपनी plant nursery को फिर से शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में लगा दिए। उन्होंने बताया, “मैंने काम करते-करते काफी कुछ सीखा। मैं बीज से पौध बनाने लगा और फिर उन्हें गमलों में रोपना शुरू कर दिया। पौधों में कीड़े न लगे इसके लिए मैंने पेस्टिसाइड पर भरोसा किया। मैंने साल 2015 में शहर से 15 किलोमीटर दूर सरखेत में जमीन किराए पर ली थी। कुछ समय बाद उसी के पास 1500 वर्ग फुट की जगह भी खरीद ली। अब मैं अपनी एक नई टीम बना सकता था और सहायकों को काम पर रख सकता था।”

आज, वह गेंदा, पेटुनिया, ओस्टियोस्पर्मम और पैंसी जैसे फूलों की 20 से अधिक किस्मों के साथ-साथ ब्रॉकली, टमाटर, बोक चोय, बैंगन और फूलगोभी जैसी सब्जियों की पौध बेचते हैं, जिससे उन्हें हर साल 30 लाख रुपये की आमदनी होती है। उनका कहना है कि सहारनपुर, गाजियाबाद, चंडीगढ़, दिल्ली, जालंधर, लुधियाना और अमृतसर जैसे पड़ोसी शहरों में पौधों की काफी मांग है।

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मौसम की विपरीत परिस्थितियां, कीट और पौधों में होने वाले संक्रमण की चुनौतियों के बावजूद, वह अपने बिज़नेस को सौ प्रतिशत फायदे का मॉडल बनाने में कामयाब हो पाए हैं।

Seedlings prepared at Devbhoomi Plant Nursery in Dehradun
Seedlings prepared at Devbhoomi Nursery

“रोजाना खुद का शुक्रिया अदा करता हूं”

सचिन (Sachin Kothari) ने बताया, “शुरुआत में, फंगस, संक्रमण और अन्य बीमारियों की वजह से पौधों के खराब होने की दर काफी ज्यादा थी। ऐसा अभी भी हो रहा है। लेकिन आज मैं इन सब से अपने पौधों का बचाव कर लेता हूं। ग्राहक स्वस्थ पौधे खरीदना चाहते हैं और कड़ी निगरानी व हर पौधे की बारीकी से देखभाल से अपेक्षित परिणाम तो मिलते ही हैं, साथ ही उनकी ग्रोथ में भी मदद मिलती है।” 

उनके अनुसार, शुरू में उन्हें नर्सरी के लिए फिर से पैसा जुटाने और लोन लेने में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। लेकिन आज उनकी सफलता को देखकर कहा जा सकता है कि उनका नौकरी छोड़ने और नई शुरुआत करने का फैसला सही था। आज वह अपनी उस तनाव भरी जिंदगी को पीछे छोड़, प्रकृति के बीच अपने पसंद का काम कर रहे हैं और सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं।

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वह कहते हैं, “आज मैंने अपने सारे कर्ज उतार दिए हैं। जमीन और कार दोनों मेरे पास हैं और इसके लिए मुझे हर दिन ऑफिस जाने और कई घंटे तक तनाव में काम करने की जरूरत नहीं है। हर महीने लाखों की कमाई कर, मैं स्वच्छ वातावरण में शानदार जीवन जी रहा हूं।”

सचिन आगे कहते हैं, “मुझे खुशी है कि मेरा जीवन लैपटॉप के इर्द गिर्द नहीं घूम रहा है। मुझे कोई पछतावा नहीं है और मैंने जो फैसला लिया उसके लिए रोजाना खुद का शुक्रिया अदा करता हूं।”

मूल लेखः हिमांशु नित्नावरे

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संपादनः अर्चना दुबे

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