वीटी कृष्णमाचारी : भारत के मास्टर प्लानर, जिन्होंने रखी थी ‘पंचायती राज’ की नींव!

4 फरवरी, 1881 को करूर जिले के वंगल गाँव के एक जमींदार के यहाँ जन्में वी. टी कृष्णमाचारी एक भारतीय प्रशासनिक अधिकारी थे। अपने करियर के दौरान उन्होंने कुछ प्रमुख पद संभाले, जैसे कि दीवान ऑफ बड़ौदा और जयपुर राज्य के प्रधान मंत्री। इसके अलावा उन्होंने 'पंचायती राज व्यवस्था' की नींव रखी।

हात्मा गाँधी हमेशा कहते थे, “भारत, कोलकाता और बॉम्बे में नहीं है, बल्कि भारत तो अपने सात लाख गांवों में बसता है।”

आज़ादी के इतने सालों बाद, बेशक शहरीकरण में भारी इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन आज भी लगभग 70% भारत गांवों में रहता है।

भारत की सच्चाई को देश के महान प्रशासनिक अधिकारियों में से एक, संविधान सभा के उपाध्यक्ष और पूर्ववर्ती योजना आयोग के दूसरे उपाध्यक्ष, वी. टी. कृष्णमाचारी ने वर्षों पहले ही पहचान लिया था। ब्रिटिश साम्राज्य के जमाने के इस अधिकारी का मानना था कि अगर भारत को गरीबी से बचना है, तो भारत के गांवों को आगे बढ़ाना होगा।

लोकतान्त्रिक रूप से निर्वाचित भारत की पहली सरकार के सामुदायिक विकास कार्यक्रम का नेतृत्व कृष्माचारी ने ही किया था। उन्होंने ही उस व्यवस्था की नींव रखी, जिसके अंतर्गत ‘पंचायती राज’ अस्तित्व में आया।

4 फरवरी, 1881 को करूर जिले के वंगल गाँव के एक जमींदार के यहाँ जन्मे कृष्णमाचारी का पूरा नाम राव बहादुर सर वंगल तिरुवेंकटचारी कृष्णमाचारी था। उन्होंने मद्रास के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक किया। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा पास की।

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आप किसी भी मानक पर रखकर मापें, पर आईसीएस में उनका करियर बहुत सफल रहा। अपने करियर के दौरान उन्होंने कुछ प्रमुख पद संभाले, जैसे कि दीवान ऑफ बड़ौदा (1927 से 1944) और जयपुर राज्य के प्रधान मंत्री (1946 से 1949)।

दीवान के तौर पर अपने लंबे कार्यकाल के दौरान, वे रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने के लिए राज़ी करने वाले मंत्रियों की समिति के सदस्य (1941 से 1944 तक) भी थे। उन्होंने रिजर्व बैंक समिति (1930 से 1934) के सदस्य के रूप में भी चार साल तक अपनी सेवाएँ दीं।

वीटी कृष्माचारी (विकीमीडिया कॉमन्स)

30 के दशक के मध्य में,  महात्मा गाँधी वर्तमान महाराष्ट्र के सेवाग्राम गाँव से राष्ट्र निर्माण (’सामाजिक प्रयोगों) के लिए अपने विचारों पर काम कर रहे थे। उनका ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर विशेष ध्यान था। इसी दौरान, कृष्णमाचारी भी बड़ौदा प्रांत के दीवान के तौर पर अपनी खुद की ग्रामीण पुनर्निर्माण परियोजना पर काम कर रहे थे।

स्कॉलर इ. डी. सेट्टी के मुताबिक, “यह योजना ग्रामीण जीवन के सभी पहलुओं से संबंधित कार्यक्रम और अभियानों के व्यापक सुधार पर जोर देती थी। इसमें पंचायतों की भूमिका को भी लिखा गया है कि स्थानीय नेता और सामाजिक सुधारकर्ता, स्कूलों और सहकारी समितियों को गतिविधियों का केंद्र रखकर काम करते हैं। वीटी कृष्णमाचारी का मानना ​​था कि ग्रामीण पुनर्निर्माण का एक कार्यक्रम आवश्यक था, ताकि कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के अन्य कई योजनाओं पर काम हो सके और यह सब किसी एक बड़ी योजना और कायर्क्रम का हिस्सा होना चाहिए। यह सच है कि पहले इन प्रयासों को ‘सामुदायिक विकास’ या ‘ग्रामीण विकास’ नहीं कहा जाता था, लेकिन संक्षेप में, उनका उद्देश्य एक ही था कि ‘लोगों की आत्म-निर्भर बनने में मदद करना’ और यही ‘ग्रामीण विकास’ के मूल सिद्धांत हैं।”

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ग्रामीण विकास के उद्देश्य के लिए शक्ति और अधिपत्य पर स्थानिक अधिकार प्रदान कर, इसे ग्राम पंचायतों के अधिकार में ही रहने दिए जाने पर आज भी जोर दिया जाता है। वास्तव में, कोई भी कह सकता है कि कृष्णमाचारी के ग्रामीण विकास पर विचार गाँधी जी के विचारों के जैसे ही थे।

फोटो साभार

लेकिन यह महान प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ़ ग्रामीण विकास तक ही सीमित नहीं था। स्वतंत्रता के लिए तत्पर भारत के लिए संवैधानिक सुधारों के विषय पर तीनों गोलमेज़ सम्मेलनों (1930-32) में एक प्रतिनिधि के रूप में सेवा देने के अलावा, वे 1934 से 1936 तक राष्ट्र संघ (सयुंक्त राष्ट्र का प्रारंभिक रूप) के प्रतिनिधि भी रहे।

प्रशासन में उनके व्यापक अनुभव के चलते कृष्णमाचारी को 28 अप्रैल, 1948 को बिना किसी भी विरोध के संविधान सभा के उपाध्यक्ष के रूप निर्वाचित किया गया और इसके साथ ही जयपुर रियासत भारत में शामिल हुआ।

आधुनिक भारत के संवैधानिक ढांचे को परिभाषित करने के हो रही गहरी चर्चाओं को देखते हुए, कृष्णमाचारी ने भी कुछ बड़े संशोधनों को पेश करने की मांग की। संपत्ति के अधिकार का समर्थन करने वाले कृष्णमाचारी ने संसद को मिलने वाले कुछ अधिकारों का विरोध किया, जैसे कि रक्षा-संबंधी आवश्यकताओं के लिए भूमि या किसी भी संपत्ति का अधिग्रहण करने का अधिकार।

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वे शांतिपूर्ण स्थिति में भी राज्य सरकार द्वारा निजी संपत्तियों के अधिग्रहण के सख्त खिलाफ़ थे। उन्होंने अपनी पब्लिक पॉलिसी में सवाल किया कि बिना किसी युद्ध और आपातकालीन स्थिति के समय पर निजी भूमि पर सरकार का अधिपत्य गलत है। लेकिन, उनके इस संशोधन का भारी विरोध हुआ और उन्हें इसे वापिस लेना पड़ा।

उन्होंने अपनी एक और अपील में भारतीय संघ और प्रांतीय सरकारों को मिलने वाली शक्तियों और अधिकारों में संशोधन का विचार दिया। उन्होंने कहा,

“हम सभी प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेते हैं… इन सम्मेलनों में लिए गए निर्णयों को लागू करने की शक्ति… और अन्य निकायों को इस बात पर निर्भर करना चाहिए कि उस निर्णय का विषय क्या है- प्रांतीय या फिर केन्द्रीय विषय है। मेरा प्रस्ताव है कि यदि ये निर्णय प्रांतीय विषयों से संबंधित हैं, तो निर्णय लागू होने से पहले संबंधित प्रांत की सहमति ली जानी चाहिए।”

दूसरे शब्दों में, राज्य सरकारों को विदेश में अपने समकक्षों के साथ केंद्र सरकार द्वारा हस्ताक्षरित अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के समय अपने विचार रखने के ज़्यादा से ज़्यादा मौके मिलने चाहिए, खासकर कि उन विषयों पर, जो राज्य सूची के अंतर्गत आते हैं। पर एक बार फिर, केंद्रीकरण को मिल रहे भारी जन समर्थन के चलते उनकी मांगों को अस्वीकार कर दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद, भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गुलजारीलाल नंदा को हटाकर कृष्णमाचारी को तत्कालीन योजना आयोग (अब नीति आयोग) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया। अनुभवी पत्रकार इंदर मल्होत्रा ​​के अनुसार, नेहरू ने कृष्णमाचारी को साल 1952 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया था, क्योंकि नंदा की तुलना में उनकी “बेहतर आर्थिक साख” थी।

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कृष्णमाचारी ने योजना आयोग की बागडोर उस समय संभाली, जब स्वतंत्रता से पहले अधिक खाद्य अभियान (विनाशकारी बंगाल अकाल के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार द्वारा शुरू किया गया) आवश्यक परिणाम देने में विफल रहा था। वास्तव में, यह कृष्णमाचारी ही थे जिन्होंने इसकी विफलताओं की जांच करने वाली जाँच समिति का मार्ग-दर्शन किया।

इस प्रकार, सामुदायिक विकास कार्यक्रम अस्तित्व में आया। यह “55 सामुदायिक विकास परियोजनाओं के साथ अक्टूबर, 1952 में शुरू हुआ। इन योजनाओं में से हर एक “तीन विकास खंडों या 300 गांवों और लगभग 3 लाख की आबादी को देखने के लिए था,” मीता कृष्णा ने अपनी किताब, ‘गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण गरीब‘ में लिखा।

प्रतीकात्मक तस्वीर (विकीमीडिया कॉमन्स)

अन्य कई महत्वपूर्ण बातों के अलावा, इसके मुख्य उद्देश्य हैं- कृषि उत्पादन में वृद्धि, ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणालियों को बढ़ाना और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की एक ऐसी संस्था का गठन, जो ग्रामीण भारत में रहने वाले लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन को सकारात्मक रूप से बदलाव ला सके।

उस समय के एक वरिष्ठ अधिकारी और नेहरू के पूर्व सचिव त्रिलोक सिंह ने लिखा, “पहली योजना में ही, एक मौलिक हित है, विशेष रूप से सामुदायिक विकास की नीति उन्होंने (कृष्णमाचारी) ही दी।”

वीटी कृष्णमाचारी कहते हैं, “भारत में किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे की नींव, गाँव में होनी चाहिए, जो देश की सबसे पुरानी इकाई है और कई शताब्दियों से अस्तित्व में है।”

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हालांकि, साथ ही, उन्होंने यह भी पता था कि भारत के गांवों को काफ़ी सामाजिक परिवर्तनों से गुजरना पड़ा है। उन्होंने लिखा, “सभी ग्रामीण परिवार वैज्ञानिक तरीकों को अपनाएँ, इसके लिए सामाजिक परिवर्तन अत्यंत आवश्यक है- समाज के पारंपरिक सांचे में परिवर्तन और दृष्टिकोण में परिवर्तन।”

उनके सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य, गांवों को आत्म-निर्भर बनाना था ताकि वे किसी बाहर की समिति या संगठन पर निर्भर ना करें। बल्कि, अपने सभी विकास कार्य गाँव वाले मिल-जुलकर करेंगें और सभी समस्याओं का समाधान जनसमूह में विचार-विमर्श करके किया जायेगा।

भारत ने 26 जून, 1945 को सैन फ्रांसिस्को में संस्थापक सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किए। तब भारत का प्रतिनिधित्व ए रामास्वामी मुदलियार और वीटी कृष्णमाचारी ने किया था

दुर्भाग्य से, कृष्णमाचारी केंद्रीकरण पर आधारित सरकार के साथ काम कर रहे थे। स्वाभाविक रूप से, इस प्रयास से केवल 2.5% ग्रामीण परिवारों को ही लाभ मिल पाया। हालाँकि, इन विचारों ने स्थानीय ग्रामीण प्रशासन की एक प्रणाली, पंचायती राज की नींव रखी, जिसे साल 1992 में औपचारिक रूप दिया गया था।

योजना आयोग में उनके कार्यकाल के बाद, उन्होंने भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के पहले अध्यक्ष के रूप में पद संभाला और यहाँ साल 1954 से 1963 तक काम किया।

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भारत में सार्वजनिक प्रशासन के बारे में अधिक जानने के इच्छुक लोगों को उनकी किताबें, ‘भारत में योजना के बुनियादी ढांचे’ और ‘योजनाबद्ध विकास और कुशल प्रशासन’ को अवश्य पढ़ना चाहिए। उनका अंतिम प्रमुख कार्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य के रूप में था और फिर 83 वर्ष की उम्र में 14 फरवरी 1964 को उनका निधन हो गया।

उनकी विरासत देश के महान लोक प्रशासनों में से एक है, जिसने ब्रिटिश भारत से लेकर आज़ाद भारत में होने वाले बदलावों को देखा और इस बात की आधारशिला रखी कि भारत के गाँव कैसे गरीबी से बाहर निकल सकते हैं! आज स्थानीय नेता, भारत के इस महान व्यक्तित्व के बारे में पढ़कर जान सकते हैं कि कैसे गांवों का सञ्चालन करें।

मूल लेख: रिनचेन नोरबू वांगचुक


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