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‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ : बच्चन भी जिनकी कविताओं के थे कायल!

22 फरवरी 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में बिंदकी तहसील के सिजौली नामक गाँव में जन्में सोहनलाल द्विवेदी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। आज़ादी के संघर्ष के दौरान उनकी ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के लिए उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि दी गयी। 1 मार्च 1988 को उनका निधन हुआ।

“लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती!”

गर कोई हम से इन पंक्तियों के रचियेता का नाम पूछे, तो हम कहेंगे, हरिवंश राय बच्चन। बहुत जगह यह कविता बच्चन जी के नाम से के साथ ही साझा की जाती है और कई मौकों पर अमिताभ बच्चन ने भी इसे पढ़ा है। ऐसे में, जाहिर है कि शायद ही कोई जानता हो कि यह कविता, हरिवंश राय बच्चन ने नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के एक और महान कवि, सोहन लाल द्विवेदी ने लिखी है।

अमिताभ बच्चन ने भी अपनी एक फेसबुक पोस्ट में इस बार की पुष्टि की है।

22 फरवरी 1906 को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में बिंदकी तहसील के सिजौली नामक गाँव में जन्में सोहनलाल द्विवेदी एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी भी थे। आज़ादी के संघर्ष के दौरान उनकी ऊर्जा और चेतना से भरपूर रचनाओं के लिए उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी गयी।

गाँधी जी के सिद्धांतों से प्रभावित सोहनलाल द्विवेदी की काव्य-शैली बहुत ही सरलता से दिल को छू जाने वाली थी। उनकी कविताएँ आम लोगों के लिए होती थीं। स्वतंत्रता सेनानियों के मन में जोश जगाने में हमेशा ही उनकी कविताएँ कामयाब रहीं। साल 1941 में देश प्रेम से भरपूर ‘भैरवी’, उनका पहला प्रकाशित काव्य-संग्रह था।

इसके आलावा सोहनलाल द्विवेदी की कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं: ‘वासवदत्ता,’ ‘पूजागीत,’ ‘विषपान’ और ‘जय गांधी’ आदि। उन्होंने बच्चों के लिए भी कविताएँ और बाल गीत लिखे और इसी वजह से उन्हें ‘बाल साहित्य’ का सृजनकार भी कहा जाता है।

हरिवंश राय ‘बच्चन’ ने एक बार लिखा था,

“जहाँ तक मेरी स्मृति है, जिस कवि को राष्ट्रकवि के नाम से सर्वप्रथम अभिहित किया गया, वे सोहनलाल द्विवेदी थे। गाँधीजी पर केन्द्रित उनका गीत ‘युगावतार’ या उनकी चर्चित कृति ‘भैरवी’ की पंक्ति ‘वन्दना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो, हो जहाँ बलि शीश अगणित एक सिर मेरा मिला लो’ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सबसे अधिक प्रेरणा गीत था।”

पद्म श्री से सम्मानित इस राष्ट्रकवि ने 1 मार्च 1988 को दुनिया से विदा ली। उनके जाने के इतने सालों बाद भी जब लोग उनकी कविताएँ पढ़ते हैं, तो दिल खुद-ब-खुद देशभक्ति और गर्व की भावना से भर जाता है।

आज द बेटर इंडिया के साथ पढ़िए सोहनलाल द्विवेदी की कुछ कविताएँ,

‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ कविता

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


‘हिमालय’ कविता

युग युग से है अपने पथ पर
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ
रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता
नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आँधी पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर
सब कठिनाई तूफानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो ––
सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो
छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर
लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको
जीने में मर जाने में!


‘बढे़ चलो, बढे़ चलो’ कविता

न हाथ एक शस्त्र हो,
न हाथ एक अस्त्र हो,
न अन्न वीर वस्त्र हो,
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

रहे समक्ष हिम-शिखर,
तुम्हारा प्रण उठे निखर,
भले ही जाए जन बिखर,
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो,
अधर में कालकूट हो,
वही सुधा का घूंट हो,
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो,
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो,
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो,
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो,
स्वतंत्रता का मोल दो,
कड़ी युगों की खोल दो,
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


‘युगावतार गांधी’ कविता

चल पड़े जिधर दो डग मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गये कोटि दृग उसी ओर,
जिसके शिर पर निज धरा हाथ
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गये उसी पर कोटि माथ;
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख;
तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना;
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,
युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार!
तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़
रचते रहते नित नई सृष्टि,
उठती नवजीवन की नींवें
ले नवचेतन की दिव्य-दृष्टि;
धर्माडंबर के खँडहर पर
कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर
निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!
बढ़ते ही जाते दिग्विजयी!
गढ़ते तुम अपना रामराज,
आत्माहुति के मणिमाणिक से
मढ़ते जननी का स्वर्णताज!
तुम कालचक्र के रक्त सने
दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुँह से
ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़;
पिसती कराहती जगती के
प्राणों में भरते अभय दान,
अधमरे देखते हैं तुमको,
किसने आकर यह किया त्राण?
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!
कँपता असत्य, कँपती मिथ्या,
बर्बरता कँपती है थरथर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट
कँपते, खिसके आते भू पर,
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित,
सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है,
उड़ता है तेरा ध्वज निशान!
हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खँडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!


‘मातृभूमि’ कविता

ऊँचा खड़ा हिमालय
आकाश चूमता है,
नीचे चरण तले झुक,
नित सिंधु झूमता है।

गंगा यमुन त्रिवेणी
नदियाँ लहर रही हैं,
जगमग छटा निराली
पग पग छहर रही है।

वह पुण्य भूमि मेरी,
वह स्वर्ण भूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते
जिसकी पहाड़ियों में,
चिड़ियाँ चहक रही हैं,
हो मस्त झाड़ियों में।

अमराइयाँ घनी हैं
कोयल पुकारती है,
बहती मलय पवन है,
तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी,
वह कर्मभूमि मेरी।
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

जन्मे जहाँ थे रघुपति,
जन्मी जहाँ थी सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई,
वंशी पुनीत गीता।

गौतम ने जन्म लेकर,
जिसका सुयश बढ़ाया,
जग को दया सिखाई,
जग को दिया दिखाया।

वह युद्ध–भूमि मेरी,
वह बुद्ध–भूमि मेरी।
वह मातृभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी।

उनके द्वारा लिखी गयीं कुछ बाल-कविताएँ,

‘हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं’ कविता

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं,
नादान उमर के कच्चे हैं,
पर अपनी धुन के सच्चे हैं!
जननी की जय-जय गाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

अपना पथ कभी न छोड़ेंगे,
अपना प्रण कभी न तोड़ेंगे,
हिम्मत से नाता जोड़ेंगे!
हम हिम गिर पर चढ़ जाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

हम भय से कभी न डोलेंगे,
अपनी ताकत को तोलेंगे,
माता के बंधन खोलेंगे!
हम इसकी शान बढ़ाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!


‘गुरू और चेला’ कविता

गुरू एक थे, और था एक चेला,
चले घूमने पास में था न धेला।

चले चलते-चलते मिली एक नगरी,
चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी।
मिली एक ग्वालिन धरे शीश गगरी,
गुरू ने कहा तेज ग्वालिन न भग री।

बता कौन नगरी, बता कौन राजा,
कि जिसके सुयश का यहाँ बजता बाजा।
कहा बढ़के ग्वालिन ने महाराज पंडित,
पधारे भले हो यहाँ आज पंडित।

यह अंधेर नगरी है अनबूझ राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।
मज़े में रहो, रोज लड्डू उड़ाओ,
बड़े आप दुबले यहाँ रह मुटाओ।

खबर सुनके यह खुश हुआ खूब चेला,
कहा उसने मन में रहूँगा अकेला।
मिले माल पैसे का दूँगा अधेला,
मरेंगे गुरू जी मुटायेगा चेला।

गुरू ने कहा-यह है अंधेर नगरी,
यहाँ पर सभी ठौर अंधेर बगरी।
किसी बात का ही यहाँ कब ठिकाना?
यहाँ रहके अपना गला ही फँसाना।

गुरू ने कहा-जान देना नहीं है,
मुसीबत मुझे मोल लेना नहीं है।
न जाने की अंधेर हो कौन छन में?
यहाँ ठीक रहना समझता न मन में।

गुरू ने कहा किन्तु चेला न माना,
गुरू को विवश हो पड़ा लौट जाना।
गुरूजी गए, रह गया किन्तु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।
टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी, टके सेर खीरा।

टके सेर मिलता था हर एक सौदा,
टके सेर कूँड़ी, टके सेर हौदा।
टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।

सरंगी था पहले हुआ अब मुटल्ला,
कि सौदा पड़ा खूब सस्ता पल्ला।
सुनो और आगे का फिर हाल ताजा।
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।
गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

लगी ढाने दीवार, मकान क्षण क्षण,
लगी चूने छत, भर गया जल से आँगन।
गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुतर ले सवारी।

झपट संतरी को डपट कर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?
कहा सन्तरी ने-महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

यह दीवार कमजोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।
खता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।
कहा राजा ने-कारीगर को सज़ा दो,
ख़ता इसकी है आज इसको कज़ा दो।

कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें ख़ता कुछ न मेरी।
यह भिश्ती की ग़लती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह गफलत।

कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़ कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।
चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें खता कुछ न मेरी।

यह गलती है जिसने मशक को बनाया,
कि ज्यादा ही जिसमें था पानी समाया।
मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें खता कुछ न मेरी।

यह मन्त्री की गलती है मन्त्री की गफलत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।
बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।

बड़ी है मशक खूब भरता है पानी,
ये गलती न मेरी, यह गलती बिरानी।
है मन्त्री की गलती तो मन्त्री को लाओ,
हुआ हुक्म मन्त्री को फाँसी चढ़ाओ।

हुआ मन्त्री हाजिर बहुत गिड़गिड़ाया,
मगर कौन सुनता था क्या बिड़ड़िाया।
चले मन्त्री को लेके जल्लाद फौरन,
चढ़ाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मन्त्री था इतना दुबला दिखाता,
न गरदन में फाँसी का फंदा था आता।
कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गरदन,
पकड़ कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गरदन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।
कहा सन्तरी ने चलें आप फौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में खुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!
मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गरदन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!
कहा चेले ने-कुछ खता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्धु-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!
कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरूजी बुलाये गये झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।
गुरू जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरू और चेला,
मचा उनमें धक्का बड़ा रेल-पेला।
गुरू ने कहा-फाँसी पर मैं चढँूगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाये न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाये न छुटते लड़े ऐसे दोनों।
बढ़े राजा फौरन कहा बात क्या है?
गुरू ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।
वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरू का कथन, झूठ होता नहीं है
कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा खूब बाजा
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा
प्रजा खुश हुई जब मरा मूर्ख राजा
बजा खूब घर घर बधाई का बाजा।

कविता स्त्रोत

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