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Harishankar Parsai & his famous quotes

सामाज के हर रंग से वाकिफ, व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई के तीखे शब्दों का मुकाबला है मुश्किल

हिन्दी साहित्य के व्यंग्य विधा में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार, हरिशंकर परसाई किसी भी तरह के परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। उनकी कलम से निकले हर एक शब्द सच्चाई का आईना हैं। पढ़ें, उनके जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातें।

जब ‘हिन्दी साहित्य’ और ‘व्यंग्य’, यह दो शब्द पास-पास आ जाते हैं, तो एक व्यक्ति का नाम अपने आप याद आने लगता है और वह नाम है हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) का। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा के लिए, हर वर्ग के पाठक की चेतना में अगर किसी का नाम पहले-पहल आता है, तो वह परसाई जी ही हैं। 

जिस तरह से परसाई जी ने सीधी-सादी भाषा में मानवीय बुराइयां, पुरातनपंथी सोच और धार्मिक पाखंड पर अपने शब्दों से प्रहार किया, उसकी कोई दूसरी मिसाल हिन्दी साहित्य में नहीं मिलती। परसाई ने धर्म, जाति, राजनीति, विवाह, मानवीय गुण-अवगुण सभी को कागज़ पर समेटा और उस पर अपनी कलम की नोंक ऐसी चुभोई कि पढ़ने वाला रस लेने के साथ-साथ बेचैन सा हो जाता है।

खुद को भी मानते थे व्यंग्य का विषय

लेखन में सबसे खास बात परसाई जी की यह थी कि वह खुद को भी व्यंग्य का एक विषय मानते थे। एक जगह वह अपनी बिना टिकट यात्राओं के बारे में लिखते हैं, “एक विद्या मुझे और आ गई थी- बिना टिकट सफर करना। जबलपुर से इटारसी, टिमरनी, खंडवा, इंदौर, देवास बार-बार चक्कर लगाने पड़ते थे और पैसे थे नहीं। मैं बिना टिकट गाड़ी में बैठ जाता था। तरकीबें बचने की बहुत आ गई थीं। पकड़ा जाता तो अच्छी अंग्रेजी में अपनी मुसीबत का बखान करता। अंग्रेजी के माध्यम से मुसीबत बाबुओं को प्रभावित कर देती और वे कहते-‘लेट्स हेल्प द पुअर बॉय’।”

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इसी विष्य पर एक जगह परसाई जी (Harishankar Parsai) लिखते हैं, “गैर जिम्मेदारी इतनी कि बहन की शादी करने जा रहा हूं। रेल में जेब कट गई, मगर अगले स्टेशन पर पूरी-साग खाकर मजे में बैठा हूं कि चिंता नहीं। कुछ हो ही जाएगा और हो गया।”

उनके व्यंग्य के अलावा, उनकी कहानियां भी सामाज के स्याह पक्ष पर चोट करती हैं। उनकी कहानियों में भी आपको व्यंग्य मिल जाएंगे। उनकी कहानी ‘भोलाराम का जीव’ हिन्दी की बेहतरीन व्यंग्य कहानियों में गिनी जाती है। हिन्दी के मशहूर आलोचक नामवर सिंह ने एक बार कहा था कि परसाई ने क्रमश: कहानियों की दुनिया को छोड़ते हुए निबंधों की दुनिया में प्रवेश किया, जहां घटनाएं सिर्फ उदाहरण के लिए प्रयोग की जाती हैं।

इस विषय पर खुद परसाई जी ने कहा, “कहानी लिखते हुए मुझे यह कठिनाई बराबर आती है कि जो मैं कहना चाहता हूं, वह मेरे इन पात्रों में से कोई नहीं कह सकता, तो क्या करूं? क्या कहानी के बीच में निबंध का एक टुकड़ा डाल दूं? पर इससे कथा प्रवाह रुकेगा…” 

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“मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता”

हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिला के जमानी गांव में हुआ था। कम उम्र में ही परसाई जी ने अपनी माँ को खो दिया। इसके बाद, पिता की भी एक लाइलाज बीमारी से मौत हो गई। ऐसे में चार छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी परसाई के कंधों पर आ गई। आर्थिक अभावों का सामना करते हुए, उन्होंने अविवाहित रहकर किसी तरह अपने परिवार को संभाला।

वह अपनी आत्मकथा ‘गर्दिश के दिन’ में लिखते हैं, “साल 1936 या 37 होगा। मैं शायद आठवीं का छात्र था। कस्बे में प्लेग फैला था…रात को मरणासन्न माँ के सामने हम लोग आरती गाते थे। कभी-कभी, गाते-गाते पिताजी सिसकने लगते, माँ बिलखकर हम बच्चों को हृदय से चिपटा लेती और हम भी रोने लगते। फिर ऐसे ही भयकारी त्रासदायक वातावरण में एक रात तीसरे पहर माँ की मृत्यु हो गई। पांच भाई-बहनों में मृत्यु का अर्थ मैं ही समझता था।”

परसाई कहते थे, “गर्दिश का सिलसिला बदस्तूर है, मैं निहायत बेचैन मन का संवेदनशील आदमी हूं। मुझे चैन कभी मिल ही नहीं सकता। इसलिए गर्दिश नियति है…”

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Books Of Harishankar Parsai

“जिम्मेदारी को गैर जिम्मेदारी के साथ निभाओ”

परसाई जी अपनी बुआ के सबसे अधिक करीब थे। उनका असर परसाई जी पर काफी रहा। निस्संकोच किसी से भी उधार मांगना, बेफिक्र रहना और बड़े से बड़े संकट में भी न घबराने जैसे गुण उन्होंने अपनी बुआ से ही सीखे थे।

एक जगह परसाई जी लिखते हैं, “मैंने तय किया- परसाई, डरो किसी से मत। डरे कि मरे। सीने को ऊपर कड़ा कर लो, भीतर तुम जो भी हो। जिम्मेदारी को गैर जिम्मेदारी के साथ निभाओ।”

मैट्रिक पास करने के बाद, परसाई की वन विभाग में नौकरी लग गई। वह जंगल में ही सरकारी टपरे पर रहते थे। ईंटों की चौकी बनाकर, पटिये और चादर बिछाकर सोया करते थे, जहां चूहों का आंतक रातभर चलता था। उन्होंने अपने उन दिनों को याद करते हुए लिखा है, “चूहों ने बड़ा उपकार किया। ऐसी आदत डाली कि आगे की जिंदगी में भी तरह-तरह के चूहे मेरे नीचे उधम करते रहे हैं, सांप तक सर्राते रहे हैं, मगर मैं पटिये बिछाकर, पटिये पर सोता हूं।” 

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शुरू किया ‘वसुधा’ का प्रकाशन

जीवन के तमाम संघर्षों के बीच, परसाई (Harishankar Parsai) ने नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए पूरा किया और पढ़ाने का काम शुरू किया। कुछ साल तक पढ़ाने के बाद, उन्होंने सन् 1947 में विद्यालय की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद, उन्हें शाजापुर में एक कॉलेज के प्रिंसिपल बनने का भी प्रस्ताव आया, पर उन्होंने इसे ठुकरा दिया। ये सब छोड़कर परसाई ने जबलपुर में स्वतंत्र लेखन करने का फैसला किया और यहीं से उन्होंने साहित्यिक पत्रिका ‘वसुधा’ का प्रकाशन और संपादन शुरू किया।

परसाई को याद करते हुए जाने-माने व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा, “हालांकि मुझे उनसे मिलने का मौका कभी नहीं मिला, लेकिन उनकी हर एक रचना, छोटी से छोटी लघु कथा को मैंने पढ़ा है। कॉलेज के दौरान मैंने ‘रानी नागफनी की कहानी’ उपन्यास पर बने एक नाटक का निर्देशन भी किया था। वहीं, ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ पर आधारित एक नाटक में मैंने इंस्पेक्टर मातादीन का रोल प्ले भी किया था। उनके जैसा व्यंग्यकार बनने के लिए, उनके जैसे भाव की जरूरत होती है। जो हर एक साहित्यकार के पास होना मुमकिन नहीं।”

हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचनाएं मन में केवल गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं, बल्कि हमारे सामने सामाजिक यथार्थ को बेहद सहज तरीके से रख भी देती हैं। 10 अगस्त, 1995 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने अपनी लेखनी के दम पर व्यंग्य को हिन्दी साहित्य में एक विधा के तौर पर मान्यता दिलाने का काम किया। 

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संपादनः जी एन झा

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