कर्नाटक किसान

किसानों की मदद के लिए छोड़ी नौकरी, सांप से बचने के लिए बनाई सौर संचालित छड़ी ‘सांप गार्ड’!

कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित प्रसादम इंडस्ट्रीज ने छड़ी के रूप में एक ‘सांप गार्ड’ विकसित किया है जिसे किसान खेतों में ले जा सकता है। लोहे से बनी यह छड़ी सोलर ऊर्जा से चलती है और इसे सांप-प्रतिरोधक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

कर्नाटक खेती नायक

मिलिये इस किसान से जिसने चावल की 850 से भी ज्यादा किस्मों को सहेज कर म्यूज़ियम बना डाला।

मांड्या जिले के छोटे से गाँव में रहने वाले सैयद गनी खान एक संग्रहालय (म्यूज़ियम) में संरक्षक है। उन्होंने एक अनूठी पहल की और एक ऐसा म्यूज़ियम तैयार कर दिया जहां आज चावल की 850 व 115 के आसपास आम की विभिन्न किस्मों को ना सिर्फ संरक्षित किया गया है, बल्कि उनकी खेती भी की जाती है।

कर्नाटक खेती टेक्नोलॉजी

मोबाइल ऐप से अब सस्ते किराये पर कृषि यन्त्र ले सकेंगे कर्नाटक के किसान !

कृषि में भी अब टेक्नोलोजी के प्रयोग को बढ़ावा मिल रहा है। टेक्नोलोजी के प्रयोग से अन्नदाता के लिए आसानी से सुविधाएँ मुहैया कराने से पैदावार तो बढ़ ही रही है, साथ ही खेती की तरफ युवा पीढ़ी के जुडाव की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। ऐसे ही एक प्रयोग के माध्यम से कर्नाटक सरकार राज्य के किसानों को सस्ती दर पर कृषि यन्त्र मुहैया कराने की योजना पर काम कर रही है।

कर्नाटक नायक

मानव मल को अपने हाथों से उठाने वालों को इस पेशे से निजात दिलवा रहे है बेज़वाड़ा विल्सन!

बेज़वाड़ा विल्सन को इस साल, एशिया का नोबेल कहे जाने वाले प्रतिष्टित ‘रेमन मैगसेसे पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें मानव मल साफ करने वाले श्रमिकों के उद्धाऱ के प्रति अपूर्व योगदान के लिए दिया गया। बेजवाड़ा कहते हैं कि वे तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक मल उठाने वाला आखिरी व्यक्ति भी अपना काम न छोड़ दे।

कर्नाटक क्विक बाइट्स (ख़ास खबरों में से चुनी हुई खबरे)

कर्नाटक की लक्ष्मी, जिसने उम्र भर की जमा पूंजी गाँव के लिए कुआँ खुदवाने में खर्च कर दी!

कर्नाटक के बेहद सुदूर हिस्से में बसे एक गाँव में पेंशन के सहारे बेहद कम साधनों में अपनी जीविका चलनेवाली एक महिला ने अपनी पेंशन से मिलने वाली रकम बचाकर गाँव के लोगो के लिए एक कुआँ खुदवाया है।

कर्नाटक नायक प्रेरणा

सरकारी स्कूल में पढाने के लिए रोज 8 किमी पहाड़ चढ़ते है यह शिक्षक!

विपरीत परिस्थितियों में पढ़ने का जज्बा तो आपने खूब देखा होगा, लेकिन पढाने का ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है। पिछले सात साल और नौ महीनों से एक अध्यापक आठ किलोमीटर, पहाड चढ़कर बच्चों को पढाने जाते हैं। असलियत तो ये है कि उन्हीं के इस कठिन परिश्रम की वजह से यह प्राथमिक विद्यालय आज तक चल रहा है। सरकारी अकूल के इस अध्यापक की जज्बे भरी कहानी से देशभर के सरकारी अध्यापक सीख लें, तो देश के सरकारी स्कूल भी भविष्य की शिक्षित पीढियां पैदा कर सकते हैं।