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काकोरी कांड में नहीं था कोई हाथ, फिर भी फाँसी के फंदे पर झूल गया था यह क्रांतिकारी!

9 अगस्त 1927 को हुए काकोरी कांड के लिए ब्रिटिश सरकार ने राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक उल्ला ख़ान और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी के साथ-साथ ठाकुर रोशन सिंह को भी फाँसी की सज़ा सुनाई। हालांकि, इतिहासकारों की माने तो ठाकुर रोशन सिंह इस ट्रेन डकैती का हिस्सा ही नहीं थे।

ठाकुर रोशन सिंह का जन्म शाहजहाँपुर, उत्तर-प्रदेश के खेड़ा नवादा गाँव में 22 जनवरी, 1892 को एक किसान परिवार में हुआ था। इनकी माँ का नाम कौशल्या देवी एवं पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। बचपन से ही साहसी रहे रोशन सिंह में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी।

ठाकुर रोशन सिंह

साल 1921 के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के चलते रोशन सिंह को भी ब्रिटिश पुलिस ने जेल में डाल दिया था। कारावास के दौरान ही उनका परिचय मेरठ के एक क्रांतिकारी विष्णुशरण दुबलिश से हुआ। धीरे-धीरे उनमें मित्रता बढ़ गयी और रोशन सिंह भी विष्णु के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होने लगे।

उन्हीं के माध्यम से रोशन बाकी क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आये और बिस्मिल के साथ उनकी दोस्ती हर दिन गहरी होती गयी। अपने साथियों के साथ मिलकर रोशन सिंह ने कई क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। ब्रिटिश पुलिस उनसे तंग आ चुकी थी। उन्हें पकड़ने के नए बहाने ढूंढे जाने लगे ताकि उन्हें लम्बे समय के लिए कारावास में डाला जा सके।

और फिर काकोरी कांड के लिए ठाकुर रोशन सिंह की भी गिरफ्तारी हुई।

काकोरी कांड के लिए गिरफ्तार हुए क्रांतिकारी (9वें नंबर पर ठाकुर रोशन सिंह)

इतिहास के कुछ जानकारों का कहना है कि 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के पास जो सरकारी खज़ाना लूटा गया था, उसमें ठाकुर रोशन सिंह शामिल नहीं थे। बल्कि, उस समय उनकी उम्र के ही केशव चक्रवर्ती काकोरी डकैती में शामिल थे और उनकी शक्ल कुछ-कुछ रोशन सिंह से मिलती थी। इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया। पर उनके खिलाफ़ सबूत नहीं जुटा पा रहे थे।

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ऐसे में धूर्त अंग्रेजों ने रोशन सिंह पर चल रहे पुराने मुकदमों के सबूतों को तोड़-मरोड़कर अदालत में पेश किया ताकि सबको लगे कि रोशन सिंह भी काकोरी के अपराधी हैं। केशव चक्रवर्ती को उसके बाद ढूंढा तक नहीं गया और रोशन सिंह को ही काकोरी कांड का आरोपी बना दिया गया।

अदालत ने जब उन्हें भी फाँसी की सज़ा सुनाई तो रोशन सिंह का चेहरा खिल उठा। वे अपने साथियों की ओर देखकर हँसते हुए बोले, ‘‘क्यों, अकेले ही चले जाना चाहते थे?’’ यह सुनकर उनके साथियों व परिजनों की आँखें नम हो गयीं। उन्हें तनिक भी अफ़सोस नहीं था कि उन्हें फाँसी की सज़ा क्यों हुई।

ठाकुर रोशन सिंह का शव

ठाकुर रोशनसिंह ने 6 दिसंबर 1927 को इलाहाबाद में नैनी की मलाका की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र लिखा था,

“इस सप्ताह के भीतर ही फाँसी होगी। आप मेरे लिये रंज हरगिज़ न करें। मेरी मौत खुशी का सबब होगी। यह मौत किसी प्रकार के अफ़सोस के लायक नहीं है। दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की जिन्दगी जीने के लिये जा रहा हूँ…”

इस पत्र की समाप्ति पर उन्होंने दो पंक्तियाँ ये भी लिखीं,

“ज़िंदगी ज़िदा-दिली को जान ऐ रोशन
वरना कितने ही यहां रोज फ़ना होते हैं”

19 दिसंबर 1927 का वो दिन भी आया, जब बिस्मिल और रोशन सिंह साथ में फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने जा रहे थे। रोशन सिंह ने अपनी रौबीली मूंछ पर ताव देते हुए ‘बिस्मिल’ से कहा, “देख, ये ठाकुर भी जान की बाज़ी लगाने में पीछे नहीं रहा।”

बाएं से अशफ़ाक उल्ला खान, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ और ठाकुर रोशन सिंह

मृत्यु के आखिरी क्षणों तक भी उनके चेहरे पर सिर्फ गर्व था। जिस जगह रोशन सिंह को फाँसी दी गयी, आज वहां एक अस्पताल है और इस अस्पताल के बाहर उनकी प्रतिमा लगी है।

भारत माँ के इस वीर को कोटि-कोटि नमन!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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