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जॉर्ज सिडनी अरुंडेल: आज़ादी की लड़ाई में यह ब्रिटिश था भारतीयों के साथ!

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ऐसे बहुत से विदेशी भी थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन लोगों में मीरा बेन, सिस्टर निवेदिता, एनी बेसेंट और सैम्युल इवान्स जैसे नाम सबसे पहले आते हैं। लेकिन एक और नाम है जो इस फेहरिस्त में शामिल होता है।

इंग्लैंड के जॉर्ज सिडनी अरुंडेल, जिन्होंने अपना सबकुछ भारत और भारतवासियों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।अरुंडेल का जन्म 1 दिसंबर, 1878 को इंग्लैंड में हुआ था। उनके माता-पिता का देहांत कम उम्र में हो जाने के कारण उनका पालन-पोषण उनकी मौसी ने किया।

उनकी मौसी हमेशा से थियोसॉफी में विश्वास करती थीं। थियोसॉफी का मतलब उस संप्रदाय से है जिसमें यह मान्यता है कि सच्चा ज्ञान भौतिक वस्तुओं से नहीं बल्कि आध्यात्मिक चिंतन से प्राप्त होता है। इसका प्रभाव अरुंडेल पर भी पड़ा। जर्मनी से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद कैंब्रिज में एक कॉलेज से उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री हासिल की।

जॉर्ज सिडनी अरुंडेल

इसी दौरान लंदन में भारत को लेकर उन्होंने एनी बेसेंट का एक भाषण सुना, जिसने उन्हें बहुत प्रभावित किया। अरुंडेल के दिल में भारत आने की भावना जाग चुकी थी। उसी समय उनकी मौसी ने थियोसॉफी के काम के लिए वाराणसी चलने का प्रस्ताव रखा क्योंकि थोयोसॉफी सोसाइटी का एक बड़ा सेंटर यहां भी था। बिना दो पल भी गंवाए अरुंडेल ने भारत आने के लिए हाँ कर दी।

साल 1902 में अरुंडेल अपनी मौसी के साथ भारत आये। वाराणसी में सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में अरुंडेल ने इतिहास पढ़ाना शुरू किया। इस कॉलेज की शुरुआत एनी बेसेंट ने की थी ताकि भारतियों को शिक्षित कर जागरूक किया जा सके। साल 1909 में अरुंडेल कॉलेज के प्रिंसिपल भी बने। अरुंडेल यहाँ बहुत मशहूर थे। सभी छात्र उन्हें काफी पसंद करते थे।

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इस कॉलेज के कई छात्र ऐसे भी थे, जिनका क्रांतिकारी आंदोलन से संबंध था। अरुंडेल इस बात से अवगत थे, परंतु उन्होंने उन छात्रों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को कभी भी कॉलेज में नहीं घुसने दिया। वह भारत की स्वतंत्रता की भावना का पूरा सम्मान करते थे।

भारत में रहते हुए अरुंडेल पूरी तरह से भारतीय हो गये थे। उन्होंने खुद को थियोसॉफीकल सोसाइटी के काम के लिए समर्पित कर दिया। एनी बेसेंट के साथ उनका काम मद्रास के अड्यार में बढ़ने लगा। उस समय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम भी जोर-शोर से आगे बढ़ रहा था। इस संग्राम के परिणामस्वरूप भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता पर चर्चा होने लगी। थियोसॉफिकल सोसाइटी इन सभी सिद्धांतो को बढ़ावा देती थी।

एनी बेसेंट के साथ अरुंडेल व अन्य थियोसॉफिकल सोसाइटी के सदस्य

मद्रास में अरुंडेल ने ‘स्काउट’ आंदोलन को आगे बढ़ाया। स्काउटिंग या बालचरी एक आन्दोलन है जिसमें बच्चों से बड़ो तक के उच्च् कोटि की नैतिकता व योग्यता का विकास किया जाता है। स्काउटिंग आन्दोलन के जनक राबर्ट स्टिफैंस स्मिथ बैडन पावेल थे। भारत में स्काउट आन्दोलन 1913 में ऐनी बेसेन्ट द्वारा प्रारम्भ करायी थी।

अरुंडेल और एनी बेसेंट के संयुक्त प्रयास से युवकों को अंतरराष्ट्रीय स्काउट आंदोलन में समान अधिकार प्राप्त हुआ। अब भारत स्काउट व गाइड संस्था भी है। प्रभावशाली वक्ता जॉर्ज सिडनी अरुंडेल ‘मद्रास मजदूर संघ’ के मंत्री भी रहे।

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एनी बेसेंट ने जब ‘होमरूल लीग’ की स्थापना की तो अरुंडेल उसमें सम्मिलित हो गए। मद्रास में ब्रिटिश सरकार का उल्लंघन करने के कारण उन्हें 1917 में नज़रबंद कर दिया गया था।

अरुंडेल ने अपने कुछ अन्य साथी और एनी बेसेंट के साथ मिलकर मद्रास में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना भी की थी। रवींद्रनाथ ठाकुर और अरुंडेल उसके प्रमुख संचालक थे। इतना ही नहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतियों का साथ देने के लिए अरुंडेल को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार भी किया।

अरुंडेल का रिश्ता भारत से और भी गहरा हो गया जब उनके जीवन में रुक्मिणी शास्त्री ने कदम रखा।

रुक्मिणी देवी

दरअसल, एनी बेसेंट की वजह से अरुंडेल, नीलकांत शास्त्री के परिवार के सम्पर्क में आये। रुक्मिणी इन्हीं की बेटी थीं। अरुंडेल को रुक्मिणी से प्रेम हो गया और वे उनसे विवाह करना चाहते थे। लेकिन दोनों की सभ्यता और धर्म बिल्कुल अलग-अलग थे और उससे भी बड़ी बात जो शास्त्री परिवार को खल रही थी, वह था रुक्मिणी और अरुंडेल के बीच उम्र का अंतर।

पर हर एक बाधा को पार कर, साल 1920 में अरुंडेल ने खुद से 26 साल छोटी रुक्मिणी से विवाह किया। इस विवाह ने जहाँ दो संस्कृतियों का मेल कराया वहीं रुक्मिणी के जीवन की दिशा बिल्कुल ही बदल गयी। उस वक़्त शायद ही किसी को पता हो कि अपने पति के समर्थन से एक दिन यही रुक्मिणी कला के क्षेत्र की नामचीन हस्ती बन जाएँगी।

अरुंडेल अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ

अपनी शादी के बाद अरुंडेल ने कुछ समय के लिए मद्रास से दूर रहने का फैसला किया। वे अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ इंदौर चले गये और वहां शिक्षा आयुक्त के रूप में अपनी सेवा दी। इंदौर के सेंट्रल म्यूजियम की स्थापना का श्रेय अरुंडेल की सोच को ही जाता है।

साल 1926 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया की थियोसॉफिकल सोसाइटी का जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया गया और वे रुक्मिणी के साथ ऑस्ट्रेलिया चले गये। लेकिन साल 1934 में उन्हें फिर एक बार भारत लौटना पड़ा। क्योंकि एनी बेसेंट के निधन के बाद उन्हें ‘अंतर्राष्ट्रीय थियोसोफिकल सोसाइटी’ का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने इस सोसाइटी के कैंपस में बेसेंट मेमोरियल स्कूल की शुरुआत की।

अपनी पत्नी के क्लासिकल डांस को बढ़ावा देने के लिए और भारत में इसे और आगे बढाने के लिए उन्होंने साल 1936 में ‘कलाक्षेत्र’ की स्थापना भी की। 1948 तक कलाक्षेत्र अड्यार में में थियोसॉफिकल सोसाइटी के कैंपस में ही रहा।

अरुंडेल के अंतिम संस्कार के दौरान

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने थियोसॉफी पर कई किताबें लिखीं। अपना पूरा जीवन भारत को अर्पित कर देने वाले अरुंडेल का 12 अगस्त, 1945 को निधन हो गया। विदेशी होकर भी भारत की इतनी सेवा करने वाले इस महापुरुष की समाधि अड्यार (चेन्नई) में एनी बेसेंट की समाधि के पास बनायी गयी।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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