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सरकारी स्कूल में संगीत और इंटरनेट से शिक्षा की अनोखी पहल

“कभी कभी मैं फ़िल्मी गानों से भी धुन उठा लेती हूँ. तब ज्यादा बच्चे कक्षा में हिस्सा लेते हैं.” - तसलीमा शेख़

कुछ शिक्षक हर संभव प्रयास करके पढ़ाई को अपने विद्यार्थियों के लिए रोचक बना देते है. एक छोटे से राजकीय विद्यालय में शिक्षक तसलीमा शेख़ ने पाया कि उनके विद्यार्थियों को कविता याद करने में मुश्किल हो रही है तो उन्होंने संगीत की मदद से इसे रोचक बनाने की सोची. यही नहीं, उन्होंने अपनी कक्षा के विडियो इन्टरनेट पर डाल दिए ताकि सारे देश के शिक्षक और विद्यार्थी इस का फायदा उठा सकें.

मशहूर लेखक विलियम आर्थर वार्ड ने कहा है, “आम शिक्षक बताता है, अच्छा शिक्षक समझाता है, बेहतरीन शिक्षक प्रयोग आदि से सिखाता है लेकिन महान शिक्षक सीखने के लिए प्रेरित करता है.” ये कहानी एक ऐसी ही महान शिक्षिका की है जो अपने विद्यार्थियों के लिए शिक्षा और खासकर कविताओं की दुनिया को मनोरंजक बना रही है.

 

तसलीमा शेख़ अपने कक्षा में कविताओं को संगीत से सजा रही है ताकि उनके विद्यार्थियों के लिए मनोरंजक और आनंददायी हो.
तसलीमा शेख़ अपने कक्षा में कविताओं को संगीत से सजा रही है ताकि उनके विद्यार्थियों के लिए मनोरंजक और आनंददायी हो.

 

दिउ के एक प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका, तसलीमा शेख़ अपने कक्षा में कविताओं को संगीत से सजा रही है ताकि उनके विद्यार्थियों के लिए मनोरंजक हो.

“जब मैंने यहाँ पढ़ना शुरू किया तो पाया कि विद्यार्थियों को कविता याद करने में मुश्किल हो रही है. इसलिए मैंने ऐसा तरीका इस्तेमाल करने की सोची जिससे कविता सीखना उनके लिए आसान और मनोरंजक बन जाये.”शेख कहती हैं.

स्टेनफोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार,  जिन लोगों को संगीत की समझ होती है, वो संगीत की समझ न रखने वालों के मुकाबले शब्द समूहों में छोटे छोटे अंतर भी आसानी से पहचान लेते हैं. संगीत का ज्ञान मस्तिष्क को तेजी से बदलती आवाजों के फर्क को पहचानने में भी मदद करता है. तसलीमा की योजना के पीछे यही सिद्धांत है.

शेख़ संगीत और मल्टीमीडिया के द्वारा अपने विद्यार्थोयों को कविताओं को समझने और सीखने को मजेदार बना रही है. वो कविताओं की धुन को अलग अलग रागों पर आधारित कर देती है. इस से विद्यार्थियों की संगीत की समझ भी बढ़ जाती है. वो पहले राग चुनती है और फिर उन्हें विभिन्न कविताओं पर सजा देती है. वो इस के साथ भाव भंगिमाओं को भी जोड़कर कविताओं की कक्षा को एकदम मजेदार बना देती हैं.

गौरतलब बात यह है कि शेख़ ने अपनी इस पहल को अपने तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने अपनी कक्षाओं के विडियो ऑनलाइन अपलोड कर दिए ताकि दूसरे भी इन्हें देखकर सीख सकें. दिउ जैसी जगह जहाँ इन्टरनेट और टेक्नोलॉजी आसानी से उपलब्ध नहीं है, तसलीमा शेख़ सकारात्मक पहल का एक अनूठा उदहारण पेश करती हैं.

 

बच्चों में उत्साह 

 

 “कभी कभी मैं फ़िल्मी गानों से भी धुन उठा लेती हूँ. तब ज्यादा बच्चे कक्षा में हिस्सा लेते हैं.”  - तसलीमा शेख़
“कभी कभी मैं फ़िल्मी गानों से भी धुन उठा लेती हूँ. तब ज्यादा बच्चे कक्षा में हिस्सा लेते हैं.” – तसलीमा शेख़

मुस्कुराते हुए शेख़ बताती है,  “कभी कभी मैं फ़िल्मी गानों से भी धुन उठा लेती हूँ. तब ज्यादा बच्चे कक्षा में हिस्सा लेते हैं. बच्चे कविता ही जल्दी नहीं सीखते,  बल्कि कक्षा भी मज़ेदार हो जाती है.”

पहले वह अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती और संस्कृत की कविताओं को गीतों में बदलकर उन्हें किसी राग पर आधारित करती है. फिर वो बच्चों को कविताओं को राग में गाकर दिखाती है और बच्चे उनका अनुसरण करते हैं. फिर वो क्लास की वीडियोग्राफी करती है और विडियो को यू-ट्यूब पर अपलोड कर देती हैं.

 “मेरी योजना टेक्नोलॉजी के द्वारा अपने काम को दूसरे शिक्षको और छात्रों तक पहुँचाने की है. मेरे यू-ट्यूब चैनल पर 9,500 से ज्यादा बार देखे जा चुके है और देशभर के शिक्षकों ने अपने कमेंट्स में लिखा है कि ये विडियो उनके लिए उन्योगी सिद्ध हुए हैं. मैंने पेन ड्राइव और ब्लूटूथ ट्रान्सफर से अन्य विद्यालयों के शिक्षकों को भी दिए हैं” 

तसलीमा अभी कक्षा 6, 7 और 8 के विद्यार्थियों पर ध्यान दे रही हैं और जल्दी ही दूसरी उम्र के बच्चों पर भी यह पहल आजमाई जाएगी. बच्चे एक बार इस कक्षा का हिस्सा बन जाएँ तो उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है और वो कविताओं को गाने में बिलकुल नहीं हिचकिचाते.

बच्चों को पढ़ाने के उनके इस तरीके को आई आई एम् अहमदाबाद द्वारा ‘परिवर्तन मंच’ का पुरस्कार मिलना तसलीमा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है.

“मुझे नरेन्द्र मोदी जी से मिलने का मौका मिला और उन्होंने मेरे काम की प्रशंसा की. पूरे गुजरात से चयनित 34 शिक्षकों में से मैं एक थी और मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात है.”

 

चुनौतियाँ

शुरूआती दौर में बच्चों को गाने के लिए राजी करना बहुत बड़ी चुनौती थी. बच्चे कक्षा में गाने में शरमाते थे और उन्हें धुन पकड़ने में थोडा समय लगता था. लेकिन लगातार प्रयास से अब बच्चे लय में आ गए हैं.

कक्षा की वीडियोग्राफी करना भी एक समस्या थी. इसलिए शुरुआत में उन्होंने इसे अपने मोबाइल पर रिकॉर्ड किया. “पेशेवर विडियोग्राफर बहुत पैसे लेता, इसलिए मैंने अपने मोबाइल से खुद रिकॉर्डिंग कर ली”, तसलीमा कहती हैं.

 

प्रभाव

विद्यार्थियों पर इस तरीके का सकारात्मक प्रभाव साफ़ दीखता है. जो बच्चे अंग्रेजी में बोल या लिख नहीं सकते, वो अंग्रेजी की कवितायेँ धाराप्रवाह गा लेते हैं.

बच्चे कैसे सीख रहे है, जानने के लिए इस विडियो को देखिये.

तसलीमा बताती हैं, संस्कृत के साथ भी वही बात है. विद्यार्थियों को अंग्रेजी और संस्कृत समझने में दिक्कत होती है, इसलिए आम तरीके से इनको कविता सिखाना मुश्किल है. राग और गीतों से विद्यार्थी बिना किसी गलती के बड़ी आसानी से सीख जाते है.”

तसलीमा का यह तरीका एक बेहतरीन बदलाव है. बच्चे उनकी कक्षा का इन्तजार करते रहते है, उसमे बढ़ चढ़ कर तन्मयता के साथ हिस्सा लेते हैं और फलस्वरूप बड़ी तेजी से सीख रहे हैं.

मल्टीमीडिया और तकनीक के उपयोग से पढाई को मजेदार बनाकर तसलीमा ने एक नयी क्रांति की शुरुआत की है. हाल फिलहाल दिउ और गुजरात में काम कर रही तसलीमा  अब इसे पूरे भारत में फैला देना चाहती है. वो चाहती है कि दूसरे अध्यापक भी इस तरीके को अपनाएं ताकि अधिक से अधिक बच्चों को लाभ मिल सके. वो नए रागों के साथ भी प्रयोग करना चाहती हैं.

तसलीमा जैसे शिक्षक शिक्षण को एक नए स्तर पर ले जाते हैं. आप उनकी कक्षाओं के विडियो को इस लिंक पर देख सकते हैं– https://www.youtube.com/user/taslimasheikh2012

 

 

मूल लेख: श्रेया पारीक

रूपांतरण: अदित्य त्यागी

 

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