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एक सर्जन की सोच और एक आम कारीगर के अनुभव का मेल है दुनिया का मशहूर ‘जयपुर फुट’!

डॉ. प्रमोद करण सेठी दुनिया भर में मशहूर कृत्रिम पैर ‘जयपुर फुट’ के इन्वेन्टर थे। अगर उन्हें ‘जयपुर पैर’ का जनक कहा जाये तो बिल्कुल भी गलत नहीं होगा। मेडिकल क्षेत्र में वे जानी-मानी हस्ती थे।

डॉक्टर प्रमोद करण सेठी का जन्म 28 नवम्बर 1927 को बनारस, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता का नाम डॉक्टर एन. के. सेठी था जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज से उन्होंने अपनी एमबीबीएस की डीग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने उसी कॉलेज से डॉ. डी.जी.एन. व्यास की देखरेख ने एम.एस. किया। अस्थि रोग (आर्थोपीडिक्स) उनका स्पेशलाइजेशन विषय था।

अपनी पढ़ाई के बाद डॉक्टर सेठी ने एक सर्जन के रूप में साल 1954 में सवाई मानसिंह अस्पताल में अपनी सेवा शुरू की।

डॉ प्रमोद करण सेठी

डॉ सेठी ऐसे मरीजों के लिए काम कर रहे थे, जिनके अंग किसी कारणवश काट देने पड़ते थे। पर धीरे-धीरे उन्हें पता चला कि आखिर क्यों लोग कृत्रिम अंग लगवाने से पीछे हटते हैं। उन्होंने इस विषय पर शोध किया तो उन्हें समझ आया कि आखिर आम ग्रामीण लोगों की जरूरते क्या हैं?

उन्होंने कृत्रिम पैर पर अपनी रिसर्च शुरू की। वे ऐसा कृत्रिम पैर बनाना चाहते थे जिसे हर एक तबके के लोग बिना किसी परेशानी के लगवा सकें और जो सालों-साल चले। उन्होंने ग्रामीण लोगों से बात की तो उन्हें समझ में आया कि अक्सर कामकाज के दौरान ग्रामीण पैरों में पूरे कपड़े नहीं पहन पाते इसलिए ऐसा कुछ बनाना होगा जिससे यदि कोई विकलांग कृत्रिम पैर लगवाए तो उसके दिखने पर वह संकोच महसूस न करे।

साथ ही, ऐसा कुछ जिससे ग्रामीणों को खेत आदि का काम करने में कोई परेशानी न हो और इसकी लागत भी कम होनी चाहिए ताकि कोई भी गरीब व्यक्ति इसे लगवा सके। इस कृत्रिम पैर का सांचा तैयार करने के लिए डॉ सेठी ने कई संगठनों से बात की लेकिन उन्हें कहीं से भी मदद नहीं मिली।

ऐसे में एक स्थानीय अनुभवी कारीगर रामचंद्र मदद के लिए आगे आये, यह कारीगर कोई खास पढ़े-लिखे नहीं थे पर अपने काम में माहिर थे। उन्होंने बेहद पुरानी तकनीक के सहारे सैण्ड मोल्डिंग का इस्तेमाल करते हुए एक खांचा बनाया जिससे किसी भी आकार का, प्राकृतिक सा दिखने वाला पैर बनाया जा सकता था। यह एक सफलता थी। अब उस खाँचे के प्रयोग से पैरों की ढलाई का सवाल सामने था। कोई भी बड़ा कारखाने वाला इस काम को करने को तैयार नहीं था, तो एक टायरों के पंचर लगाने वाले छोटे स्थानीय कारीगर ने इस काम में मदद करना स्वीकार किया।

जयपुर फुट

बहुत से प्रयोगों के बाद आख़िरकार यह कृत्रिम ‘जयपुर फुट’ तैयार हुआ और डॉ. सेठी ने साबित कर दिया कि वे सिर्फ एक उम्दा सर्जन ही नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक भी हैं। इस जयपुरिया पैर में लचीलापन तो था ही साथ ही इसे किसी के भी पैर पर लगाया जा सकता था।

जयपुर फुट को तीन रंगों में तैयार किया गया था हल्का बादामी, बादमी तथा पक्के रंग का। इसी तरह एल्युमीनियम का पैर भी गाँव के कारीगरों से तैयार कराया गया था। इसका डिजाइन इस तरह का रखा गया कि चौड़े पंजे की सैंडिल भी उस पर पहनी जा सके।

गरीब से गरीब विकलांगों को भी इस कृत्रिम पैर की सुविधा प्राप्त हो इसके लिए डॉ सेठी का साथ दिया ‘महावीर सोसाइटी ऑफ फिजिकली हैंडीकैप्स’ संगठन ने। उन्होंने बहुत से लोगों के लिए कृत्रिम पैर स्पोंसर किया। इस सफलता के बाद डॉ. प्रमोद करण सेठी को ‘द मास्टर क्राफ्ट्समैन ऑफ़ सर्जरी’ कहा जाने लगा।

बताया जाता है कि उनका यह आविष्कार दुनिया भर में मशहूर है।

यह जयपुर फुट ही था जिसकी मदद से प्रसिद्ध नृत्यांगना व अदाकारा सुधा चंद्रन एक पैर खोने के बावजूद दुबारा नाच पायी थी।

जयपुर फुट के साथ सुधा चंद्रन डांस परफोर्म करते हुए

जयपुर फुट के साथ कोई भी व्यक्ति साइकिल चला सकता है, पेड़ पर चढ़ सकता है और खेती के काम भी आसानी से कर सकता है। कारगिल युद्ध के सैनिक, जिन्होंने लड़ाई के दौरान अपना पैर खो दिया उनके लिए भी यह जयपुर फुट कारगर साबित हुआ। इस जयपुर फुट की कीमत सिर्फ 1500 रूपये है।

एक भारतीय सैनिक जयपुर फुट लगवाने के बाद

जब डॉ. सेठी यह जयपुर फुट बना रहे थे तो किसी ने उनसे सवाल किया कि जब सारी दुनिया में टेक्नोलॉजी इतनी आगे पहुंच गयी है, तो जयपुर फुट में पैर अभी भी एल्युमिनियम का क्यूँ लग रहा है, जब कि प्लास्टिक को इसकी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है। इस पर डॉ. सेठी का जबाव था,

“मुझे पता है कि यह पैर किन लोगों के लिए बन रहा है। अगर कभी इन कृत्रिम पैरों में कोई टूट-फुट हो जाये तो भोले-भले गांववाले किसी स्थानीय कारीगर से ठोक-पीट करा या फिर वेल्डिंग करवाकर इसे सुधरवा लेंगे। लेकिन प्लास्टिक या पॉलिथीन के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता।”

जयपुर फुट के अद्भुत काम के लिए डॉ. सेठी का नाम 1982 में गिनीज अवार्ड फॉर साइंटिफिक अचीवमेंट पाने वालों में जुड़ गया। भारत सरकार की ओर से उन्हें पद्म श्री से भी नवाज़ा गया।

डॉ. सेठी बहुत ही सरल व्यक्ति थे। वे बस अपने मरीजों को अच्छे से अच्छा इलाज देना चाहते थे। साथ ही उनका मानना था कि देश में हर एक व्यक्ति को मेडिकल सुविधाएँ बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध हों।

लाखों विकलांगों के जीवन में नया उजाला भरने वाले डा. प्रमोद करण सेठी का निधन 6 जनवरी, 2008 को हुआ। लेकिन मेडिकल क्षेत्र में जो काम डॉ. सेठी ने शुरू किया था, उन्हें आज उनके छात्र और साथी आगे बढ़ा रहे हैं।

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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