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गणेश वासुदेव मावलंकर : स्वतंत्र भारत के प्रथम लोकसभा अध्यक्ष!

णेश वासुदेव मावलंकर भारत के प्रसिद्द स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत की स्वतंत्रता के बाद ये लोकसभा के प्रथम अध्यक्ष बने थे।

‘दादासाहेब’ के नाम से जाने जाने वाले, मावलंकर का जन्म 27 नवम्बर,1888 को गुजरात के वडोदरा में हुआ था।  मावलंकर अपनी उच्च शिक्षा के लिए साल 1902 में अहमदाबाद आ गये थे। उन्होंने अपनी बी.ए. की परीक्षा ‘गुजरात कॉलेज’ से पास की और वकालत की डिग्री ‘मुंबई यूनिवर्सिटी’ से प्राप्त की।

शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने अहमदाबाद से वकालत शुरू की, साथ ही सामजिक कार्यों में भी भाग लेने लगे। वकालत के इन दिनों से जुड़ी घटनाओं को उन्होंने अपनी किताब ‘माई लाइफ’ में संकलित किया।

वकील के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले मावलंकर ने 1921 के असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। खेड़ा सत्याग्रह में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। धीरे-धीरे वे सरदार वल्लभ भाई पटेल और गांधीजी के प्रभाव में आए। उनकी किताब ‘संस्मरण’ गांधी जी के साथ उनके इन्हीं वृतांतों पर आधारित है। देश सेवा की ललक लगते ही, उन्होंने वकालत छोड़ दी और ‘गुजरात विद्यापीठ’ में प्राध्यापक के रूप में काम करने लगे

क्रान्ति की मुख्य धारा में आते ही उन्होंने गाँधी जी के ‘नमक सत्याग्रह’ में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसके कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

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सविनय अवज्ञा आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी मावलंकर अनेक बार जेल गए तथा जेल में कैदियों के बीच सुधार कार्य किया। अपनी जेल यात्रा के दौरान मिले कैदियों की वास्तविक परिस्थितियों पर गुजराती भाषा में लिखी गई उनकी पुस्तक ‘मानवतन झरन’ बेहद लोकप्रिय रही। बाद में इस किताब को अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवादित किया गया।

स्वतंत्रता के बाद साल 1947 में उन्हें सर्वसम्मति से लोकसभा का अध्यक्ष (स्पीकर) चुना गया। साल 1952 में पहले सार्वजनिक चुनाव के बाद उन्हें फिर से अध्यक्ष का पद मिला। अपनी अध्यक्षता के इस पूरे कार्यकाल में मावलंकर ने सदन के संचालन में नए मानदंडों की स्थापना की।

मावलंकर के सम्मान में जारी पोस्टल स्टैम्प

उन्हें भारतीय लोकसभा का जनक भी कहा जाता हैं, क्योंकि उन्होंने लोकसभा की बेहतरी के लिए बहुत-से मुद्दों पर काम किया। उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ मिलकर गुजरात में शिक्षा के क्षेत्र में भी कई काम किये। अहमदाबाद एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत की इस महान विभूति का 27 फ़रवरी, 1956 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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