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exponent energy provides fastest electric vehicle charging

बेंगलुरु की इस कंपनी का दावा – 15 मिनट में फुल चार्ज कर सकते हैं कोई भी इलेक्ट्रिक वाहन

अरुण विनायक ने अपने साथी संजय बयालाल के साथ मिलकर साल की शुरुआत में बेंगलुरु में एक्सपोनेंट एनर्जी नाम से एक कंपनी को शुरू किया। इसके तहत उन्होंने ई-पैक और ई-पंप नाम की तकनीक विकसित किया है, जिसके तहत सिर्फ 15 मिनट में इलेक्ट्रिक वाहनों को पूरी तरह से चार्ज किया जा सकता है।

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बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप एक्सपोनेंट एनर्जी (Bengaluru Based Startup Exponent Energy) ने ई-पैक और ई-पंप नाम के एक बैटरी पैक और चार्जिंग स्टेशन तैयार किया है। कंपनी का दावा है कि इसके जरिए सभी कमर्शियल वाहनों को 15 मिनट के अंदर 0 से 100 फीसदी चार्ज किया जा सकता है, चाहे वाहनों की भार क्षमता कुछ भी हो। इस काम को सस्ती लिथियम-आयन बैटरियों के जरिए अंजाम दिया जा रहा है। साथ ही, कंपनी इसे 3000 बार चार्ज करने की वारंटी देती है।

कंपनी का उद्देश्य फ्लेक्सिबल एनर्जी स्टैक (Flexible Energy Stack) बनाकर इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग को आसान बनाना है। सामान्य भाषा में कहें तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक व्यवहारिक बनाने में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया जा सकता है। 

इस कंपनी को एथर एनर्जी के पूर्व चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर अरुण विनायक ने अपने पूर्व सहकर्मी संजय बयालाल के साथ मिलकर शुरू किया है। कंपनी का लक्ष्य वाहनों को तीव्र गति (15 मिनट) में पूरी तरह से चार्ज कर, बैटरी पर दवाब को कम करना है। 

बता दें कि आमतौर पर बैटरी को पूरी तरह से चार्ज करने में चार से आठ घंटे लग जाते हैं। अधिकांश बैटरी की आयु तीन साल होती है, जिन्हें 1000-1200 बार चार्ज किया जा सकता है। इस तरह चार्ज होने में अधिक समय लगने से बैटरी की लाइफ पर काफी बुरा असर पड़ता है। वहीं, देश में फास्ट चार्जिंग सॉल्यूशन प्रीमियम ईवी तक ही सीमित हैं, जिसे चार्ज होने में 50 मिनट लगते हैं और इसमें भी कई खामियां हैं।

Exponent energy fastest electric vehicle charging
एक्सपोनेंट एनर्जी का ई-पंप

इस कड़ी में अरुण विनायक ने द बेटर इंडिया को बताया, “यदि आप EV सेक्टर में उर्जा के प्रवाह पर गौर करें, तो देखेंगे कि इसके मुख्य घटक पावर ग्रिड, चार्जर, बैटरी और मोटर हैं। मूल उपकरण निर्माताओं (OEMs) को पता चल गया है कि अच्छे वाहन कैसे बनाए जाते हैं। वे बैटरी और मोटर खरीदने के बाद इसे असेम्बल कर, मार्केट में प्लेस करने में सक्षम हैं। दूसरी ओर, चार्जिंग पार्टनर चार्जर खरीद, उसे चार्जिंग स्टेशनों पर लगा रहे हैं। लेकिन, हर पक्ष अलग-अलग काम कर रहा है, यही कारण है कि कई बैटरी और चार्जर ठीक से काम नहीं करते हैं। आज EV मार्केट में ओईएम, बैटरी निर्माताओं और चार्जिंग स्टेशनों के बीच समन्वय की कमी है।”

यदि हम भारतीय बाजार की बात करें, तो यहां रैपिड चार्जिंग ज्यादा व्यवहारिक नहीं है। दरअसल यहां एलटीओ (लिथियम-टाइटेनेट-ऑक्साइड) या सुपरकैपेसिटर जैसी भारी और महंगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। चार्जर सामान्य बैटरी को क्षमता से अधिक पावर सप्लाई करते हैं, जिस कारण बैटरी को नुकसान पहुंचता है। 

इसके बारे में विनायक कहते हैं, “हमने बैटरी और चार्जर के बीच उर्जा के प्रवाह को सरल बनाया है। इससे लिथियम आयन बैटरियों को 15 मिनट में पूरी तरह से चार्ज किया जा सकता है। साथ ही, यह सस्ती और स्केलेबल भी है।”

यह कैसे काम करता है?

अब तक, यही माना जाता है कि यदि आप EV बैटरी को तेजी से चार्ज करते हैं, तो इससे बैटरी की आयु तेजी से कम होगी। यदि आप बैटरी को जबरदस्ती तेजी से चार्ज करने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह सच भी है। 

यही कारण है कि ईवी मार्केट के लोगों ने बैटरी को धीमी गति से चार्ज करने और बैटरी लाइफ को सुरक्षित करने का आसान रास्ता निकाला। 

जैसा कि एक्सपोनेंट एनर्जी कंपनी ने लिथियम-आयन बैटरी की 3000 लाइफ साइकिल के साथ 15 मिनट की रैपिड चार्जिंग की योजना बनाई है। उनकी यह योजना पूरी तरह से बैटरी के अंदर अवरोधों को कम कर, ऊर्जा प्रवाह को बढ़ाने पर आधारित है। 

बता दें कि बैटरी में कैथोड और एनोड, दो छोर होते हैं। चार्जिंग के दौरान आयन का प्रवाह कैथोड से एनोड की ओर होता है। आप बैटरी को जितनी तेजी से चार्ज करते हैं, एनोड की ओर आयन का प्रवाह उतनी तेजी से होता है। जिसके फलस्वरूप बैटरी की आयु में गिरावट आती जाती है। 

“हमने 800 चार्जिंग साइकिल की टेस्टिंग कर ली है। जिसमें बैटरी की क्षमता में सिर्फ 3.5% की कमी आई। हम विभिन्न चार्जिंग साइकिल में अवरोधों के एक्टिव मैनेजमेंट के आधार पर 3000 लाइफ साइकिल की वारंटी दे रहे हैं। फिलहाल भारत के इलेक्ट्रिक व्हीकल मार्केट में 1000 लाइफ साइकिल की औसत वारंटी दी जाती है और क्षमता में 20 फीसदी की कमी आती है। हमने चार्जर और बैटरी को एक साथ आसानी से काम करने की तरकीब तैयार की जिससे दो बड़ी समस्याओं को हल निकला है – चार्जिंग टाइम और बैटली लाइफ। अधिकांश लोगों को लगता है कि ये दो विपरीत समस्याएं हैं, लेकिन आप सही तरीके से समझें, तो आपको सिर्फ एक समस्या को हल करने की जरूरत है और वह है अवरोध (Impedance),” अरुण बताते हैं।

उनका दावा है कि उनका चार्जिंग स्टेशन पूरी तरह से फ्यूचर-प्रूफ है। जहां कई प्रकार के वाहनों को 40 से 800 वोल्ट चार्जिंग की सुविधा दी जाती है। 

यह बैटरी स्वैप टेक्नोलॉजी के ठीक विपरीत है, जहां ओईएम को बताया जाता है कि उन्हें सिर्फ एक निश्चित विशिष्टता और फॉर्म फैक्टर की बैटरी का इस्तेमाल करना है। वाहनों की ओर से, वे एक फ्लेक्सिबल एनर्जी स्टैक प्रदान करते हैं।

अरुण कहते हैं, “इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माता आज हमारे बीएमएस (Battery Management System) को अपने वाहनों में इच्छानुसार कॉन्फिगर कर, हमारे साथ काम शुरू कर सकते हैं या वे हमसे बैटरी पैक सीधे खरीद सकते हैं। बैटरी पैक खरीदना सबसे आसान तरीका है, जो मॉड्यूलर है।”

आज उनके पास एलएफपी (Lithium Ion Phosphate) पैक तैयार है, जबकि एनएमसी (Nickel Manganese Cobalt) पैक को अगले तीन महीने के अंदर बाजार में उतारा जाएगा। दोनों भारत के सबसे लोकप्रिय सेल केमिस्ट्री हैं। 

कंपनी का दावा है कि उन्होंने अभी तक बाजार में आठ अलग-अलग तरह के बैटरियों की टेस्टिंग की है और सभी को तेजी से चार्ज करने में सफलता मिली है। वे फिलहाल एक अलग प्रकार की सेल पर काम कर रहे हैं, जिसे अगले साल जनवरी में लॉन्च किया जाएगा। यह एक एलएफपी (Lithium Ion Phosphate) सॉल्यूशन है और मॉड्यूल 2 kWh का है। लेकिन, इसे जरूरत के हिसाब से किसी भी कॉन्फिगरेशन में इंस्टाल किया जा सकता है।

अरुण बताते हैं, “फिलहाल, हम एक ओईएम के साथ काम कर रहे हैं। हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे बैटरी पैक उनके वाहनों के साथ सुचारु रूप से काम करें और चार्जिंग पार्टनर्स की मदद से अपना चार्जिंग स्टेशन स्थापित करें। हमने फिलहाल अपने बेंगलुरु ऑफिस में चार्जिंग स्टेशन की शुरुआत की है और जल्द ही ऑफिस के बाहर अपना पहला चार्जिंग स्टेशन की शुरुआत करेंगे। यह चार्जिंग नेटवर्क विकसित करना हमारे लिए ज्यादा मुश्किल नहीं है, क्योंकि हमें इसका अनुभव है।”

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कंपनी के अनुसार, उन्होंने बैटरी पैक का परीक्षण काफी व्यापक दायरे में किया है। इसके तहत, लैब कंडीशन में 800 चार्जिंग साइकिल के अलावा, उन्होंने तीन और चार पहिया वाहनों से सड़कों पर हजारों किलोमीटर की दूरी तय की है। 

उनकी लेबोरेटरी में, थर्मल चैंबर होते हैं, जो 50 ℃  तापमान पर उनकी बैटरी को तेजी से पावर सप्लाई करते हैं। एक महीने की टेस्टिंग में बैटरी पर इतना भार दिया जाता है, जो 8 साल पुरानी बैटरी की हो। कंपनी का दावा है कि उन्होंने विश्वसनीयता परीक्षण के लिए काफी समय और पैसा खर्च किया है।

किस आधार पर करते हैं दावा 

अब सवाल उठता है कि कंपनी 3000 चार्जिंग साइकिल वारंटी का दावा कैसे करती है? दरअसल, बैटरी को सबसे ज्यादा नुकसान चार्जिंग के दौरान होता है। क्योंकि, इस दौरान बैटरी में आंतरिक प्रतिरोध, डिस्चार्जिंग की तुलना में करीब चार गुना अधिक होता है। बैटरी सिर्फ चार्जिंग के दौरान आग पकड़ती है, क्योंकि बीएमएस (Battery Management System) गलत होता है।

अरुण दावा करते हैं, “किसी भी बैटरी में सैकड़ों सेल होते हैं और सबकों साथ में काम करना जरूरी है। यदि एक सेल टूट जाए, तो पूरी बैटरी खराब हो जाती है। यदि कोई सेल अंसतुलित हो जाए, तो इससे चार्जिंग टाइम बढ़ जाती है। यहाँ तक कि दूसरे सेल को चार्ज करने से भी रोकना पड़ता है। ऐसे में, बैटरी पूरी तरह से चार्ज नहीं हो पाती है। वहीं, बीएमएस को पता नहीं चलता है कि कोई खास सेल जरूरत भर चार्ज हो चुका है, और आप उसे चार्ज करते रहते हैं। इससे बैटरी में आग लग जाती है। हमारा बीएमएस बैटरी को 10 गुना अधिक सटीक तरीके से पढ़ने में सक्षम है और इसमें सबसे तेज बेलेंसिंग सर्किट लगे हैं।”

वहीं, एक और समस्या यह है कि अधिकांश चार्जर से एक स्थिर दर पर ऊर्जा निकलती है। इससे, मूल रूप से सेल में आतंरिक अवरोध बढ़ती है और काफी नुकसान होता है। 

Electric vehicle charging station
प्रतीकात्मक फोटो

इसे लेकर वह कहते हैं, “हम जरूरत के हिसाब से चार्जर में ऊर्जा के प्रवाह को कम या ज्यादा करने में सक्षम हैं। हमारे पास एक तकनीक है जिससे आसानी से समझा जा सकता है कि सेल के अंदर क्या हो रहा है। यदि सेल और चार्जर के बीच समन्वय बेहतर होगा, तो जाहिर रूप से तनाव कम होगा। जब आप उस अवरोध को हटाते हैं, तो ऊर्जा सुचारू रूप से प्रवाहित होती है और चार्ज करने में समय कम लगता है। साथ ही, नुकसान भी कम हो जाता है। इस तरह हम इन दोनों समस्याओं को सुलझाने में सफल होते हैं।”

कैसे मिली प्रेरणा

“Go Electric Tomorrow” के सिद्धांत पर एक्सपोनेंट एनर्जी का लक्ष्य भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल को अधिक से अधिक बढ़ावा देना है। अरुण जब 2014 में तरुण मेहता और स्वप्निल जैन के साथ एक फाउंडिंग पार्टनर के रूप में एथर एनर्जी से जुड़े, तो उस वक्त भारत में बहुत कम लोगों को इलेक्ट्रिक वाहनों पर विश्वास था। कंपनी ने 2018 में, अपना पहला उत्पाद (ई-स्कूटर) लॉन्च किया, जो लोगों को काफी पसंद आई। लेकिन आलोचकों का मानना था कि यह कोई लाभदायक सेक्टर नहीं है। हालांकि, अब उनकी राय बदल गई है।

एक्सपोनेंट एनर्जी के को-फाउंडर संजय बयालाल कहते हैं, “फिलहाल, भारत में कमर्शियल व्हीकल की हिस्सेदारी बेचे जाने वाले कुल वाहनों में करीब 10 फीसदी हैं। इसके बावजूद इनकी ऑन रोड ऊर्जा खपत 70 फीसदी है। ऐसे में यहां ईवी सेक्टर के लिए अपार संभावनाएं हैं। आज एक भरोसेमंद रैपिड चार्जिंग नेटवर्क की जरूरत है, ताकि उन्हें चलते रहने में मदद मिले। इस जरूरत को पूरा करने के लिए हम इंडस्ट्री के सभी मुख्य हितधारकों से हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं।”

अरुण बताते हैं, “ई-स्कूटर और चार्जिंग पॉइंट जैसे उत्पादों को बनाने के बाद, हमें लगा कि यह एक बड़ी समस्या थी, जिसे हमने हल किया। निजी तौर पर, मेरी जिज्ञासा चीजों को और करीब से सीखने की हो रही थी। वहीं, 2018-19 के दौरान मैंने देखा कि ग्राहकों से लेकर सरकार और निवेशकों तक में, इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर एक नया विमर्श चल रहा था।”

लेकिन, अधिकांश लोग अभी भी चीन से औसत दर्जे की तकनीक को खरीद रहे थे। कई लोग एथर एनर्जी के पास आए और उनकी तकनीक के बारे में पूछने लगे। इससे अरुण को विचार आया कि क्यों न एक ऐसी तकनीक को विकसित किया जाए, जिसका इस्तेमाल कई मूल उपकरण निर्माता कर सकें।

हालांकि, एथर की तकनीक को एक वर्टिकल इंटीग्रेटेड पॉइंट को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था। किसी और के लिए इसे इस्तेमाल करने का कोई मतलब नहीं था। बेशक, हीरो जैसे ओईएम थे, जिन्होंने इसके चार्जिंग पोर्ट का इस्तेमाल करने का फैसला किया। लेकिन अरुण को महसूस हुआ है कि यदि वे उस तकनीक को विकसित करना चाहते हैं, तो उन्हें इसी समस्या पर केंद्रित एक अलग कंपनी बनानी चाहिए।

वह अंत में कहते हैं, “आईसीई वाहनों की तुलना में, इलेक्ट्रिक वाहनों को 0 से 1 के पैमाने पर शिफ्ट करना आसान है। लेकिन, 1 से 100 के पैमाने को हासिल का करना जटिल है। भारत में, ईवी सेक्टर में व्यापक संभावनाएं (2030 तक 206 अरब डॉलर) हैं। लेकिन, वहां तक पहुंचने के लिए हमें बड़ी तकनीकी समस्याओं को हल करते हुए, ऊर्जा को सरल बनाने की जरूरत है। बैटरी क्षमता, सेल केमिस्ट्री और वाहन में पहियों की संख्या के आधार पर एक रैपिड चार्जिंग समाधान इस कड़ी में पहला कदम है।”

मूल लेख –  Rinchen Norbu Wangchuk

संपादन- जी एन झा

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