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water conservation by jayshree rao

74 साल की उम्र में बेच दी अपनी कंपनी, उन पैसों से बदली गाँवों की सूरत

72 साल की जयश्री राव ने साल 2007 में 25 हजार रुपये में अपनी कंपनी बेच दी थी और एनजीओ ‘ग्रामपानी’ की शुरुआत की। उन्होंने महाराष्ट्र के 200 गांव में शासन प्रणाली में सुधार कर 1.22 लाख लोगों को फायदा पहुंचाया है।

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पहाड़ों पर रहनेवाले लगभग 15 प्रतिशत लोग पीने के पानी और घरेलू जरूरतों के लिए झरनों पर निर्भर हैं। लेकिन इनमें से एक तिहाई पानी के स्रोत जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण और ज़मीन के बदलते इस्तेमाल के कारण सूखते जा रहे हैं।

महाराष्ट्र के पंचगनी के अखेगनी गांव की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। गांव में पानी के स्रोत सूखते जा रहे थे। गर्मी के महीने में गांववालों को पानी की भारी किल्लत से जूझना पड़ता था। अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए, वे पानी के टैंकरों पर निर्भर थे। लेकिन आज हालात काफी बदल चुके हैं। पानी के मामले में यह गांव पूरी तरह से आत्मनिर्भर है। यहां के सूखते जा रहे झरनों को न केवल संरक्षित किया गया, बल्कि सूखे हुए झरनों को फिर से पानी से लबालब भर भी दिया गया और यह सब 72 साल की जयश्री राव के प्रयासों से ही संभव हो पाया, जो एक एनजीओ चलाती हैं।

पीने के पानी के लिए अब नहीं चलना पड़ता मीलों पैदल

जयश्री, ग्रामपारी नाम से एक एनजीओ चलाती हैं, जो पश्चिमी घाट की गोद में बसा हुआ एक ग्रामीण और इकोलॉजिकल सेंटर है। यह एनजीओ सरकारी नीतियों को लागू करके, ग्रामीणों को कुशल शासन सिखा रहा है।

अखेगनी गांव के विकास को देख, क्षेत्र के 60 से अधिक अन्य गांवों ने भी इस ओर अपने कदम बढ़ाए हैं। उन्हें पीने के पानी के लिए अब मीलों पैदल नहीं चलना पड़ता। उनके गांव में भी अब पानी की समस्या खत्म हो चुकी है।

ग्रामपारी NGO की नींव 1967 में रखी गई थी। उस समय जयश्री राव 18 साल की थीं। उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “मैं काफी कम उम्र में एशिया प्लैटो के एनजीओ ‘इनिशिएटिव ऑफ चेंज (IOFC)’ से जुड़ गई थी। पंचगनी में स्थित इस MRA सेंटर में मुझे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सदस्यों से मिलने का मौका मिला। वे सभी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए काम करना चाहते थे।”

जब पढ़ाई छोड़ने का किया फैसला

Grampari NGO community development Western Ghats
A water conservation Springbox built at Beloshi village.

जयश्री बताती हैं कि उस दौरान, उन्होंने सामाजिक कार्य करने के लिए अपनी पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया था। वह कहती हैं, “मैने ग्रेजुएशन न करने का मन बना लिया। मैं गांव में रहकर, वहां के लोगों के विकास के लिए काम करना चाहती थी। एनजीओ के साथ मैंने दस साल से ज्यादा समय तक काम किया और इस दौरान निर्माण कार्यों से जुड़े मज़दूरों के बच्चों के लिए स्कूल भी शुरू किया था।”

फिर जयश्री ने 1976 में अपने इस काम को छोड़ दिया और अपने पति के साथ कुछ सालों के लिए इंग्लैंड चली गईं। जब वह 1982 में बैंगलुरु लौटीं, तो उन्होंने एक ट्रेडिंग कंपनी ‘जेआर राव एंड कंपनी’ की शुरुआत की। वह बताती हैं, “मेरे पिता उद्योगपति थे, वह इंजीनियरिंग टूल्स बनाते थे। इसलिए मैंने भी एक इंजीनियरिंग टूल ट्रेडिंग कंपनी शुरु कर, आगे बढ़ने का फैसला किया।”

लेकिन साल 2006 में, एक छोटी सी घटना ने जयश्री की जिंदगी को फिर से बदल दिया। वह बताती हैं, “मेरी कंपनी को एक मशीनरी बेचकर एक लाख रुपये का प्रॉफिट हुआ था। यह एक बड़ी कामयाबी थी, क्योंकि हमारी सालों की मेहनत रंग लाई थी।”

एक बार फिर बदल गई राह

वह याद करते हुए कहती हैं, “उस दिन काम के बाद, घर आकर मैं सब्जी खरीद रही थी और सब्जीवाले से पांच रुपये कम करने के लिए मोल-भाव करने लगी, वह मान भी गया। मैंने उससे सब्जी खरीद ली। उस समय मुझे भले ही अच्छा लगा, लेकिन घर आकर मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होने लगी। मैंने आज एक लाख रुपए कमाए थे और एक गरीब आदमी को मैं पांच रुपये ज्यादा देने के लिए भी तैयार नहीं थी। इस घटना ने मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया था।”

अब उन्होंने फिर से लोगों की भलाई के लिए काम करने का मन बना लिया। यह वही काम था, जिसके लिए कई साल पहले उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी।

और अपनी कंपनी बेच दी

साल 2007 में, उन्होंने अपने नौ कर्मचारियों को 25 हजार रुपये में अपनी कंपनी बेच दी। वह बताती हैं, “मैंने सब कुछ छोड़ दिया और ‘ग्रामपानी’ को फिर से शुरू करने के लिए पंचगनी चली आई। पैसा अब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता था। मेरे पास जो भी था, उससे मुझे नए सिरे से शुरुआत करने में काफी मदद मिली।”

उन्होंने बताया, “जब मैं वहां गई, तो मैंने गांववालों को शासन में प्रशिक्षित करने का फैसला किया। मेरे हिसाब से गांव के विकास की दिशा में काम करने का यह सबसे प्रभावी तरीका था। सरकार ने गांव में कई स्तर पर 19 अधिकारियों को नियुक्त किया था और गांव के फायदे के लिए कई योजनाएं भी थीं। बस जरूरी था कि इन सभी को सही ढंग से लागू किया जाए। मैंने एक लेख पढ़ा था, बिहार का एक सरपंच अपने गांव को एक आदर्श गांव बनाने के लिए सरकारी नीतियों को लागू कर रहा था। मैं भी ठीक इसी तरीके से गांव को सशक्त बनाना चाहती थी।”

शुरू में गांववालों से नहीं मिला सहयोग

Jayashree rao addressing villagers on governance and water conservation
Jayashree Rao

जयश्री ने गवर्नेंस के बारे में बात करने के लिए गांववालों तक अपनी पहुंच बनानी शुरू कर दी। वह कहती हैं, “मैं इस काम को करने में बुरी तरह असफल रही। गांववालों को इसमें कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। वे मीटिंग में न आने का बहाना ढूंढ़ते थे। उनकी दिलचस्पी ऐसे कामों में थी, जिससे वे पैसा कमा सकें। फिर मैंने उनके साथ जुड़ने और आर्थिक रूप से थोड़ा मजबूत बनाने की दिशा में काम करना शुरू किया। दिवाली के लिए उनसे दिए बनवाए और उन्हें IOFC केंद्र में बेचने के लिए बुलाना शुरू किया।”

धीरे-धीरे गांववाले जयश्री के साथ खुलते गए और सहज महसूस करने लगे। उन्होंने पानी को लेकर अपनी समस्या बताई। वह बताती हैं, “इस इलाके के झरने या तो सूख चुके थे या फिर उनका पानी साफ नहीं था। संयोगवश उस समय IOFC में यूएस से एक हाइड्रोलॉजिस्ट जेरेड बुआने आए हुए थे। उन्होंने हमारी काफी मदद की। उनके अनुसार कॉन्क्रीट से ढके टैंक से झरने के पानी को दूषित होने से बचाया जा सकता था। हमने इस पर काम किया। टैंकों में झरनों के पानी को संग्रहित कर उसे साफ किया। इस तरीके से ग्रामीणों को साफ पानी मिलने लगा।” 

उनका यह पहला प्रोजेक्ट अखेगनी गांव में शुरू किया गया था। इससे गांववालों की सेहत में भी काफी सुधार आया। अब उन्हें पानी के लिए दर-दर भटकने या फिर टैंकरों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं थी।

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40 हजार लोगों को पहुंचा फायदा

अखेगनी गांव में पानी की समस्या खत्म होने लगी थी, जिसे देखकर आसपास के गांवों का भी हौसला बढ़ा। उन्होंने भी अपने गांव में इस तरह की योजना शुरू करने का अनुरोध किया। जयश्री राव के अनुसार, इस योजना से 60 से ज्यादा गांवों का कायाकल्प किया गया, जिससे तकरीबन 40,000 लोगों को सीधे तौर पर फायदा पहुंचा था।

पानी की कमी अक्सर गांववालों के बीच संघर्ष का कारण बन जाती है और अगर इस पर ध्यान न दिया जाए, तो स्थिति काफी ज्यादा बिगड़ सकती है। वह बताती हैं, “जब गांववालों ने संपर्क किया, तो हमने उनके सामने एक शर्त रखी। योजना में सभी को समान रूप से सहयोग करना होगा। हमने उन सभी से समान रूप से शारीरिक श्रम में योगदान करने की बात कही थी। हमने अपनी इस योजना से गांववालों को एक कर दिया।”

महिलाओं को दिलाया रोजगार

जयश्री ने धीरे-धीरे महिलाओं को रोजगार दिलाने के लिए अन्य कई योजनाएं शुरू की और शासन से जुड़े मुद्दों पर गांववालों से बातचीत भी की। तब से उनका यह एनजीओ गांव में लगातार विकास कार्य करता आ रहा है। इस संस्था ने स्वशासन, स्थानीय संस्थानों को मजबूत करने और महिलाओं को सशक्त बनाने जैसे कई मुद्दों पर काम किया है।

वह बताती हैं, “हम पंचायतराज संस्थानों को ट्रेनिंग देकर स्वच्छता, जैविक खेती, संघर्ष समाधान और अन्य को शिक्षा से जोड़कर नेतृत्व विकास की सुविधा प्रदान करते हैं।” जयश्री ने एक उदाहरण देते हुए बताया, “टिप्पी टैप जैसे हैंड सैनिटाइजेशन प्रोजेक्ट से बच्चों में होने वाली बीमारियां काफी कम हुई हैं। हमने 162 स्कूलों में इसे शुरू किया था। इससे बच्चों में हाथ धोने की आदतों में 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।”

NGO की संस्थापक का दावा है कि इस तरह की कई पहल चलाई गई, जिससे 200 गांवों के तकरीबन 1.22 लाख लोगों को फायदा पहुंचा है।

बच्चों की पढ़ाई और करियर बनाने में मिली मदद

गोदावली गांव की रहनेवाली कमल मोरे ‘ग्रामीण और आजीविका परियोजना’ का हिस्सा हैं। वह 2016 में ग्रामपारी से जुड़ी थीं, जिसके बाद उनके जीवन में काफी बदलाव आया। अब उनके हालात पहले की तुलना में काफी बेहतर हैं। वह कहती हैं, “मेरे पति एक दिहाड़ी मजदूर हैं। हमारे सामने हमेशा पैसों की दिक्कत बनी रहती थी। हालात इस कदर तक बिगड़ गए कि हम अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी नहीं उठा पा रहे थे। तब मैंने एनजीओ से जुड़ने का फैसला किया। उसके बाद से मैं उनके रोजगार से जुड़े कई प्रोजेक्ट में काम करती रहती हूं।”

आज वह ठीक-ठाक कमा रही हैं। इससे उनके बच्चों की पढ़ाई और करियर बनाने में मदद मिली है। वह आगे बताती हैं, “परिवार की आर्थिक स्थिति काफी बेहतर है। मेरी तरह, सैकड़ों महिलाएं हैं, जिन्होंने पहले कभी घर से बाहर कदम नहीं रखा था, लेकिन अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गई हैं और बेहतर जीवन जी रही हैं। ”

गांववालों की मानसिकता बदलना सबसे बड़ी चुनौती

जयश्री के अनुसार, “गांववालों की मानसिकता को बदलना, उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। वह तुरंत बदलाव की उम्मीद करते हैं। वह हमेशा आपके लिए काम करने के लिए तैयार नहीं होते। उनके काम करने का अपना एक तरीका है। धीरज के साथ कैसे काम किया जाता है, लोगों के बीच रहकर ही मैंने सीखा है।”

वह आगे कहती हैं, “दान देने वाले संस्थानों ने एनजीओ को चलाने और मेरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद की है। समाज के लिए काम करने से पहले, मैं जिस तरीके का जीवन जीती थी, आज वह जीवन नहीं जी सकती। लेकिन मैं किसी और चीज़ के लिए अपने जीवन को व्यर्थ नहीं करुंगी।”

आज उनकी बेटी अर्चना और दो अन्य सदस्य प्रथमेश मुरकुटे और दीपक जाधव इस संगठन को चलाते हैं। इस नई पीढ़ी का कहना है कि वे पश्चिमी घाटों में झरनों को बचाने और गांव में अधिक शासन नीतियों को लागू करने की दिशा में अपने काम का विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।

मूल लेखः हिमांशु नित्नावरे

संपादनः अर्चना दुबे

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