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Ladies Only Sujani Production Unit Of Bihar is example of women empowerment

बिहार का ‘लेडिज ओनली’ प्रोडक्शन यूनिट! देश के कोने-कोने तक जाती है यहाँ की सुजनी

बिहार के कोसी अंचल में एक अनूठा प्रोडक्शन यूनिट संचालित हो रहा है, इस यूनिट में सिर्फ महिलाएं ही काम करती हैं और उन्हें नियमित सम्मानजनक आजीविका का अवसर मिलता है।

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भीखा देवी अपने घर की अकेली कमाऊ महिला हैं। अपनी कमाई से वह घर चलाती हैं, बच्चों को पढ़ाती हैं और बुजुर्ग सास-ससुर की देखभाल करती हैं। उनके पति दो साल पहले गुजर चुके हैं। अब वह अपने बच्चों, माता-पिता और सास-ससुर के लिए बेटे व बहू दोनों की भूमिका बखूबी निभा रही हैं। वह बिहार के मधेपुरा जिले के आलमनगर प्रखंड मुख्यालय से सटे गांव सोनवर्षा की रहनेवाली हैं और अपने गांव में संचालित होने वाले ‘सुजनी सेंटर’ में काम करती हैं। भीखा, इस सेंटर में हफ्ते में छह दिन सुबह दस से चार बजे तक काम करती हैं और महीने में आठ से नौ हजार रुपये तक कमा लेती हैं।

कोसी नदी के किनारे बसे इस ठेठ गंवई इलाके में संचालित होने वाला यह ‘सुजनी सेंटर’ भीखा देवी जैसी 70 से अधिक महिलाओं को पिछले तीन सालों से नियमित रोजगार उपलब्ध करा रहा है। औद्योगीकरण के मामले में पिछड़े बिहार राज्य के इस इलाके का यह अनोखा कारखाना है, जिसमें सिर्फ महिलाएं काम करती हैं, इस सुजनी प्रोडक्शन यूनिट की देखरेख भी महिलाएं ही करती हैं।

क्या है सुजनी?

सुजनी एक तरह का बिस्तर होता है, जो फटे-पुराने कपड़ों से तैयार किया जाता है और इसी तरीके से बैठने के लिए आसन भी बनाए जाते हैं। दोनों में सिर्फ आकार का फर्क होता है, बनाने का तरीका एक जैसा ही होता है। पुराने कपड़ों को एक खोल में डालकर महिलाएं हाथ से सिल देती हैं।

यह सिलाई ठीक उसी तरह की जाती है, जैसे गद्दे या रजाई की सिलाई होती है। बिना मशीन के, सिर्फ सूई-धागे के इस्तेमाल से ये महिलाएं सुजनी और आसन तैयार करती हैं और इसके बदले में सेंटर की तरफ से, एक सुजनी तैयार करने के 75 रुपये और एक आसन के 25 रुपये मिलते हैं।

इस यूनिट में काम करने वाली ऐसी ही एक और महिला हैं बिंदू देवी। सोनवर्षा गांव बिंदू देवी का मायका है। यहां वह अपने माता-पिता, तीन छोटे भाई और अपने तीन बच्चों के साथ रहती हैं। साल 2008 में उनकी शादी हुई। शादी के बाद वह, दो-तीन महीने ही उदाकिशुनगंज में स्थित अपने ससुराल में रह पाईं। उनका रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका और वह मायके लौट आईं।

आत्मनिर्भरता के साथ, लौटा सम्मान

Women making padding of old clothes in Sujani Center, Bihar
Women Making Padding

बिंदू का अपने बच्चों के साथ मायके में रहना, उनके भाई और भाभी को पसंद नहीं था। पिता, गल्ला मंडी में बोरा ढोने का काम करते थे। थोड़ी बहुत आमदनी होती थी, जिससे किसी तरह घर चलता था। बड़ा भाई शराब की लत का शिकार हो गया था। दो छोटे भाई परदेस जाकर कमाई करते थे। वह खुद खेतिहर मजदूरी करती थीं और जैसे-तैसे घर चल रहा था।

इसी बीच सोनवर्षा में ‘सुजनी सेंटर’ शुरू हुआ और बिंदू देवी ने वहां काम करना शुरू किया। ‘सुजनी सेंटर’ की संचालिक रीना देवी ने द बेटर इंडिया को बताया, “काम करने में बिंदू देवी सबसे तेज हैं और सबसे अधिक कमाने वाली महिलाओं में से हैं। अपनी कमाई से बिंदू देवी ने दो काम किए। पहला अपने बूढ़े पिता की मजदूरी बंद कराई और दूसरा अपने बच्चों के लिए ट्यूशन शुरू करवा दिया।”

उन्होंने बताया कि अब चार लोगों के अपने इस परिवार की वह सबसे अधिक कमानेवाली सदस्या हैं। घर में राशन उन्हीं के पैसों से आता है। बिंदू देवी कहती हैं कि इस कमाई से उनका घर तो संभला ही, मायके में उनका सम्मान भी लौटा है। उनकी भाभी, जो पहले गलत बर्ताव करती थीं, अब निगाह झुकाकर बात करती हैं।

70 गरीब महिलाओं को यहां मिला रोजगार

यह ‘सुजनी सेंटर’ गांव के बाढ़ राहत आश्रय स्थल में संचालित होता है। आप किसी भी कामकाजी दिन में वहां जायेंगे, तो 70 के करीब महिलाएं यहां-वहां बैठकर सुजनी, आसन और झोले सिलती नजर आएंगी। यह ‘सुजनी सेंटर’ 23 दिसंबर, 2018 को शुरू हुआ था। शुरुआत में इसमें सिर्फ 20 महिलाएं काम करती थीं। वहीं, अब यहां काम करनेवाली महिलाओं की संख्या 70 से अधिक हो गई है। इनमें से 40 से अधिक सुजनी बनाती हैं, 9-10 बैग सिलाई का काम करती हैं और बाकी आसन बनाने का काम करती हैं।

‘सुजनी सेंटर’ की संचालिका रीना देवी कहती हैं, “यहां जिस माहौल में इन महिलाओं को काम करने का अवसर मिला है, वे इससे बहुत उत्साहित रहती हैं। वे बिल्कुल समय से यहां आती हैं और हंसते-खेलते सारा काम करती हैं। हर औरत के जीवन में कई तरह के दुख हैं, मगर वे यहां आकर अपना दुख भूल जाती हैं।”

इस प्रोडक्शन यूनिट का संचालन ‘गूंज’ नाम की एक संस्था करती है। यह संस्था देश के 23 राज्यों में आपदा राहत, मानवीय मदद और सामुदायिक विकास का अभियान चलाती है। इसका मुख्य फोकस कपड़ों के जरिए लोगों की मदद करना रहा है। इसके लिए संस्था देश के विभिन्न महानगरों में राहत सामग्री के रूप में लोगों से कपड़ों का दान स्वीकार करती है।

देशभर में आपदा के समय काम आती है यहां की सुजनी

इस संस्था को हर साल 3500 टन कपड़े और दूसरी चीजें दान के रूप में लोगों से मिलती हैं और फिर उसे सम्मानजनक इस्तेमाल के लायक बनाकर जरूरतमंद लोगों को उपलब्ध कराया जाता है। दान में मिले कपड़ों की सफाई और उसे इस्तेमाल के लायक बनाना, संस्था के कामकाज का एक बड़ा हिस्सा है।

आलमनगर में संचालित ‘सुजनी सेंटर’ भी गूंज संस्था की इसी पहल का एक हिस्सा है। यहां महिलाएं दान में मिले कपड़ों को सिलकर सुजनी और आसन का रूप देती हैं। यहां तैयार होने वाली सुजनी को संस्था, पूरे देश में आपदा राहत अभियान के दौरान वितरण के लिए इस्तेमाल करती है।

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‘गूंज’ को सुजनी बनाने का आइडिया भी कोसी से ही मिला था। संस्था ने साल 2008 की भीषण बाढ़ के वक्त से कोसी के इस इलाके में काम करना शुरू किया था। इस इलाके में लोग बेकार कपड़े से अक्सर सुजनी या केथरी बनाते थे। मगर कई दफा गरीब लोगों के पास इतना कपड़ा भी नहीं होता था कि वे सुजनी बना सकें।

अपने शुरुआती दिनों से ही ‘गूंज’ ने गरीब महिलाओं से सुजनी बनवाना शुरू कर दिया। मगर पहले यह छोटे पैमाने पर होता था। 2018 में इसे बड़े प्रोडक्शन यूनिट का रूप दिया गया।

महिलाओं को मिला सम्मान व आजीविका का अवसर

Women making mattress or Sujani of old clothes in Sujani Center, Bihar
Women Making Mattress or Sujani in Sujani Center

आलमनगर जैसे दूर-दराज के इलाके की बात छोड़िए, कोसी और सीमांचल के पूरे इलाके में इस तरह की प्रोडक्शन यूनिट शायद ही कोई दूसरी हो, जहां एक साथ इतनी महिलाएं काम करती हों और उनकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाता हो। इस प्रोडक्शन यूनिट में महिलाओं को ध्यान में रखते हुए इससे जुड़ा हुआ ही शौचालय बनाया गया है, जहां पैड बैंक भी है।

इस इलाके की अत्यंत गरीब महिलाओं को यहां आकर पहली दफा कामगार होने का अहसास मिला। जैसे नौकरीपेशा लोग समय से दफ्तर जाते हैं, ये महिलाएं समय से सुजनी सेंटर आती हैं। इन्हें यूनिट की तरफ से टिफिन बॉक्स मिला हुआ है, जिसमें वे दिन का खाना अपने साथ लाती हैं। ताकि उन्हें सम्मानित तरीके से भोजन का भी अहसास मिले।

महिलाओं को इस सुजनी सेंटर में काम करने का सबसे अधिक फायदा, कोरोना काल में समझ आया। मार्च, 2020 में जब पूरे देश में कोरोना की वजह से लॉकडाउन लग गया, तो मजबूरन इस ‘सुजनी सेंटर’ को भी बंद करना पड़ा। मगर गूंज की तरफ से इस पूरी अवधि में इन महिलाओं को न्यूनतम मेहनताना मिलता रहा।

स्थानीय महिलाओं के सहयोग से उद्देश्य हो रहा पूरा

अप्रैल में 4000, मई में 3500 और जून में 4000 रुपये हर कामगार महिला को गूंज की तरफ से मेहनताना दिया गया। इस तरह लॉक डाउन की अवधि में हर महिला के खाते में 11,500 रुपये की राशि गयी। यह राशि संकट की उस घड़ी में बहुत बड़ी मदद साबित हुई।

इस सेंटर के बारे में बात करते हुए ‘गूंज’ संस्था के बिहार प्रमुख शिव चतुर्वेदी कहते हैं, “इस सुजनी सेंटर की शुरुआत ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से की गई थी, स्थानीय महिलाओं का हमें इतना सहयोग मिला कि हम अपने मकसद में हम काफी हद तक सफल रहे।

बिहार के ग्रामीण इलाके में इस सुजनी को लोग गर्मियों में बिछाते हैं और सर्दियों में ओढ़ने के काम में भी लेते हैं। इसके अलावा, बिहार में बनी इस सुजनी का वितरण देशभर के आपदा प्रभावित लोगों के बीच किया जाता है।”

संपादन- जी एन झा

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