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पानी की हर एक बूंद बचाने के लिए खुद घर घर जाते है ८० साल के आबिद सुरती!

कहते है “बूंद-बूंद से सागर बनता है”।  इसी तरह पानी की हर एक बूंद को बहने से बचाकर, सागर जितना विशाल काम कर रहे, आबिद सुरती से मिले!         

                    “अगर मैं कर सकता हूँ, तो आप भी कर सकते है। ”

ये शब्द हैं अस्सी वर्षीय आबिद सुरती के। आबिद हर रविवार मुंबई के अपार्टमेंट एवं बिल्डिंगों के चक्कर काटते हैं पानी की हर उस बूँद को बचाने, जो कहीं भी टूटी हुई नल से बर्बाद हो रहा हो।

 

क लेखक, एक पेंटर, एक कार्टूनिस्ट, आबिद सूरति की उम्र ने कभी भी उन्हें नयी ज़िम्मेदारीयों को लेने से नहीं रोका। अस्सी वर्ष की उम्र में भी वह ‘द ड्राप डेड फाउंडेशन’ नामक एक स्वयं सेवी संस्था का संचालन कर रहे हैं। एक व्यक्ति की मेहनत पर टिकी यह संस्था बिना किसी से पैसे लिए, न जाने कितने टन पानी बचा रही है, जो आमूमन टपकते हुए नल या पाइप के कारण घरों में बर्बाद होता है।
आबिद ने अब तक ८० किताबें और ७ नाटक लिखें हैं। इनके चित्रकला की १६ प्रदर्शनीयाँ भी हो चुकी है और साथ ही ये ‘डब्बू’ एवं ‘बहादुर’ जैसे कार्टूनों के रचनाकार भी रह चुके हैं। सन १९९३ में इन्हें अपनी लघु कहानियों की श्रंखला ‘तीसरी आंख’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चूका है।

क्यूँ कर रहे है आबिद ये सब?

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आबिद बताते हैं, “हालाँकि मेरा जन्म एक अच्छे परिवार में हुआ था, फिर भी मेरे परिवार में एक बुरा दौर आया जिसके कारण मुझे मेरा बचपन फूटपाथ पर बीताना पड़ा।”
इनके इस अतीत का, इनको आगे बढाने और समाज की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करने में बड़ा हाथ रहा है।

यह पूछे जाने पर कि किस प्रकार डेड ड्राप की शुरुआत हुई, ये बताते हैं,

“ यह मेरे बचपन का दर्द है। मैं फूटपाथ पर रह कर बड़ा हुआ हूँ। पानी की हर एक बूँद के लिए संघर्ष करना पड़ता था। हर एक बाल्टी पानी के लिए लड़ना पड़ता था। यह याद मेरे साथ हमेशा के लिए रह गयी। एक बार मैं अपने एक परिचित के यहाँ गया और वहां के नल से पानी टपक रहा था, यह देख मुझे बड़ा दर्द हुआ।”

जिस दिन से आबिद को इस टपकते नल को देख कर दुःख हुआ, उस दिन से इन्होने अपने कदम नहीं रोके। २००७ में अपने फाउंडेशन की शुरुवात की, और पहले ही साल मीरा रोड के १६६६ घरों के दरवाज़े आबिद ने खटखटाए। इनमे से करीब ४१४ ऐसे नल थे जिनसे पानी टपक रहा था, जिसे इन्होने बिना कोई शुल्क लिए, ठीक किया और करीबन ४.१४ लाख लीटर पानी बचाने में मदद की।

कैसे करते है आबिद इतना सब कुछ?
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आबिद समझाते हैं,
“हम हर सोमवार को एक बिल्डिंग चुन लेते हैं – कोई भी बिल्डिंग या अपार्टमेंट, ख़ास कर बस्तिया या चौल में जहा गरीब लोग रहते है। सोमवार को मेरे वालंटियर इन बिल्डिंगों में जाते हैं, इनके सेक्रेटरी से बात करते हैं, और अगर उन्हें कोई परेशानी न हो तो हम वहां अपने पोस्टर लगा देते है। सोमवार से शनिवार तक लोग हर तरफ सिर्फ हमारे पोस्टर देखते हैं जिनमे लिखा होता है, ‘ड्राप डेड’ , ‘ड्राप डेड’ – इस पूरे सप्ताह इनके दिमाग में ये शब्द बैठ जाता है। फिर शनिवार को हम उनके बीच पम्फलेट बाँट देते है जिनमे विस्तार से हमारे फाउंडेशन के बारे में लिखा होता है तथा ये भी लिखा होता है कि हम उनके पास इस रविवार को क्यों आने वाले हैं। और अंतिम पड़ाव यानि रविवार को हम उनके यहाँ जा के लीकेज की मरम्मत कर देते हैं।”

ऐसे ही हर रविवार, मुंबई की अलग अलग जगहों पर आबिद को एक वालंटियर और एक प्लम्बर के साथ देखा जा सकता है।

इनके इस कार्य से प्रभावित हो कर इन्ही के बेटे ने २०१३ में इसपर “सेविंग द प्लेनेट वन ड्राप एट अ टाइम” नामक एक ब्लॉग लिखा था जिसे २०१४ में पीयरसन एजुकेशन द्वारा चुना गया और बच्चो की पाठ्यपुस्तक में शामिल किया गया।
आबिद अपनी उपलब्धिओं के बारे में बताते हैं :
“ वैसे मैं एक लेखक और चित्रकार हूँ। जब भी कोई बात मेरे दिमाग में आती है मैं बैठ कर उस पर लिखने लगता हूँ। जब ड्राप डेड का भी विचार मेरे मन में आया तब यह सिर्फ एक विचार था, न यह कोई बड़ी सोच थी, न लोगो के बीच प्रशंसा पाने का जरिया। इस विचार पर मैंने अमल करने के लिए एक प्लम्बर को बुलाया और अपने आस पड़ोस में निकल गया।”

दूसरों को भी प्रेरित करते है आबिद !

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अपने इस विचार के साथ आबिद ने उन से प्रेरणा लेने वालो की एक लम्बी मानव श्रृंखला बना ली हैं। ऐसे कई लोग हैं जो इनका उदहारण ले कर अपने शहरों में पानी बचाने को निकल पड़े हैं।
अपने वेबसाइट पर इन्होने लिखा है,

“आप अकेले ये कर सकते हैं।’ एक’ व्यक्ति भी ये कर सकता है। आप एक वन मैन एन जी ओ बनिए। आपको बस एक प्लम्बर चाहिए जो आपके साथ चलने को तैयार हो जाये। बस!”

क्या अपनी इस सोच को वो और भी शहरों तक ले जाना चाहते हैं?
इसके जवाब में आबिद कहते हैं,

मेरा मकसद लोगों को प्रेरित करना है। और उन्हें ये समझाना है कि यह यदि मैं कर सकता हूँ तो वो भी कर सकते हैं लोग मुझसे पूछते है कि मैं १०० प्लम्बर का एक समूह क्यों नहीं बना लेता हूँ जिस से कोई भी संस्था मुझे मदद करने को तैयार हो जायेगी। तब मैं उन्हें बताता हूँ कि लोग मुझसे इस लिए प्रेरित होते हैं क्यूंकि मैं यह काम खुद कर रहा हूँ। मैं सप्ताह के कुछ घंटे निकाल कर यह काम करता हूँ। मैं लोगों तक यह सन्देश पहुचाना चाहता हूँ कि आपको इस के लिए अपना कोई भी काम छोड़ने की ज़रूरत नहीं है और न ही आपको किसी बड़े ऑफिस या बहुत बड़े स्टाफ की आवश्यकता है।
जिस जज्बे से आबिद आज ये काम कर रहे हैं यह जज्बा इन्होने अपने पुरे कार्यकाल में कायम रखा है। आबिद, जिन्होंने हर तरह की किताबें लिखी हैं, उन्होंने कभी भी कोई सीधा या आसान रास्ता नहीं चुना।
वे बताते हैं,
“ मेरी सोच थोड़ी अलग है। जो भी मुझे अच्छा लगता है, मैं उसे चुन लेता हूँ। जो भी मेरे रास्ते में आता है, अगर वो चुनौती पूर्ण होता है, तो मैं उसे पकड़ लेते हूँ। जैसे की थिएटर! ये मेरे बस की बात नहीं थी, पर जब कोई मेरे पास इसका प्रस्ताव ले कर आया, मैंने स्वीकार कर लिया। मैंने लिखा भी और मूल नाटक को निर्देशित भी किया , और यह नाटक मुंबई में काफी सराहा गया।”

जिन लोगों ने इनकी किताबें पढ़ी हैं उन्हें पता होगा कि किस प्रकार इनका जीवन इनकी ही लिखी पुस्तक ‘बहत्तर साल का बच्चा’ के करीब है। इस पुस्तक द्वारा यह सन्देश दिया गया है कि असल में ७० के बाद ही जीवन की असली शुरुवात होती है और हम इस उम्र में ख़ुशी से जी सकते हैं। आबिद कहते हैं, “ और यही वह जीवन है जिसे मैं जी रहा हूँ ”

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इस कलाकार से पूछने पर कि आज भी कौन सी बातें इन्हें प्रोत्साहित करती हैं , ये बताते हैं,

“नौजवानों का साथ! आज के बच्चे! जब मैं आठ या नौ वर्ष का था तब मेरे दोस्त ३० वर्ष के थे। आज मैंने इस स्थिति को उल्टा कर दिया है। आज किशोर अवस्था के बच्चे मेरे मित्र हैं। उनकी नयी सोच और नए विचारों से ( क्यूंकि उनकी सभ्यता हमारी सभ्यता से अलग है) हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। मैं भी सीख रहा हूँ।”

भविष्य में, आबिद १-२ मिनट की छोटी फिल्में भी बनाना चाहते हैं जिस से वो लोगो को पानी के महत्व के प्रति जागरूक कर सकें।

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‘द ड्राप डेड फाउंडेशन’ के बारे में जानने के लिए आप उनकी वेबसाईट पर जा सकते हैं।

और यदि आप अपने शहर में ऐसा की कुछ आरम्भ करने के इच्छुक है तो आबिद आपके लिए कुछ कहना चाहते हैं :

“यदि कोई ऐसा ही कुछ आरम्भ करना चाहता है, तो वो मुझसे संपर्क कर सकता है। मैं यहाँ बैठ कर जितना संभव होता है उतनी ऑनलाइन मदद करने की कोशिश करता हूँ। इस काम में रूचि लेने वालो को मैं अपनी पोस्टर के डिजाईन, पम्फलेट, स्टीकर आदि भेज देता हूँ। इनमे से मेरा नाम हटा कर उनसे अपना नाम, पता, और अन्य विवरण डालने को कह देता हूँ। यह कोई फ्रेंचाइजी नहीं है। यह उतना ही आपका है जितना की मेरा। मुझे अपना प्रचार नहीं करना है। मुझे इस अभियान का प्रचार करना है।”

आबिद से संपर्क करने के लिए उन्हें  aabidssurti@gmail.com पर ईमेल करे!


 

मूल लेख – तान्या सिंह 

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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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