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Mariyappan Thangavelu Is High Jump gold medalist in Paralympic 2016

Mariyappan Thangavelu: 5 साल की उम्र में कुचला गया घुटना, देश के लिए जीते कई पदक

मरियप्पन थंगावेलु, वह पैराएथलीट जिन्होंने साल 2016 पैरालंपिक खेलों के दूसरे ही दिन 12 सालों में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीता।

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मरियप्पन थंगावेलु, वह पैराएथलीट जिन्होंने साल 2016 पैरालंपिक खेलों के दूसरे ही दिन, 12 सालों में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 1.89 मीटर कूदकर, पुरुषों की टी42 हाई जंप प्रतियोगिता जीती और इतिहास रच दिया। उस जीत के साथ, मरियप्पन (Mariyappan Thangavelu) पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय हाई जम्पर बन गए।

मरियप्पन की सफलता और उनके सफर की कहानी वाकई बहुत प्रेरक है। यह कहानी है, उनके धैर्य, दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत की। यह 21 वर्षीय पैरा-एथलीट, पेरियावादगमपट्टी नाम के एक छोटे से गांव से है, जो तमिलनाडु के सेलम से लगभग 50 किमी दूर स्थित है।

नशे में बस ड्राइवर ने कुचल दिए घुटने

पाँच साल की छोटी-सी उम्र में मरियप्पन के साथ जो दुर्घटना घटी, उसने उनकी पूरी जिंदगी ही बदलकर रख दी। एक दिन जब वह स्कूल जा रहे थे, तभी एक बस उनके पैर पर चढ़ गई और उनका दाहिना घुटना बुरी तरह से कुचल गया। इस दुर्घटना में मरियप्पन की जान तो बच गई, लेकिन जीने का तरीका हमेशा के लिए बदल गया।

उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, “मुझे बताया गया था कि ड्राइवर शराब के नशे में था। उस दुर्घटना के बाद से मेरा दाहिना पैर आज भी अविकसित है, यह अभी भी उस पाँच साल के बच्चे का ही पैर है, यह कभी नहीं बढ़ा।”
बचपन में ही उनके पिता ने परिवार छोड़ दिया। माँ घर चलाने के लिए ईंट ढोने का काम करने लगीं। लेकिन सीने में दर्द बढ़ने की वजह से उन्हें काम छोड़ना पड़ा।

पिता के छोड़ने के बाद, उनके परिवार को किसी ने किराए पर रहने के लिए मकान नहीं दिया। माँ ने 500 रूपये उधार लेकर सब्जी बेचने का काम शुरू किया और परिवार का पेट पालने लगीं। मरियप्पन के इलाज के लिए 3 लाख का कर्जा लेकर बेटे की सलामती के लिए लड़ती रहीं। उनके इलाज के लिए लिया गया कर्ज, उनकी माँ सालों तक चुकाती रहीं।

टीचर से मिला खेलों में भाग लेने का हौसला

मरियप्पन (Mariyappan Thangavelu) को हमेशा से खेलना पसंद था। स्टूडेंट लाइफ से ही, उन्हें वॉलीबॉल से काफी लगाव था और उन्होंने कभी भी अपनी अक्षमता को इसका आनंद लेने के रास्ते में नहीं आने दिया।

14 साल की उम्र में, उनके एक शिक्षक ने उन्हें स्कूल में एक हाई जंप प्रतियोगिता में भाग लेने की सलाह दी। मरियप्पन ने तय किया कि वह प्रयास तो ज़रूर करेंगे। सक्षम एथलीटों के साथ कॉम्पिटिशन के बावजूद, मरियप्पन दूसरे स्थान पर रहे। यह वह कार्यक्रम था, जिसमें पहली बार उनके क्लासमेट्स और दोस्तों ने उन्हें पूरी तरह से सपोर्ट किया। इसके बाद, जिले में आयोजित होने वाली जिस भी प्रतियोगिता में मरियप्पन भाग लेते थे, उनके ये क्लासमेट और दोस्त हर उस इवेंट में उन्हें सपोर्ट करने के लिए जाने लगे।

मरियप्पन को अपने कोच सत्यनारायण के मार्गदर्शन में अपने इस स्किल को और अधिक सुधारने का मौका मिला। वह, कोच सत्यनारायण से पहली बार साल 2013 की राष्ट्रीय पैरा-एथलेटिक्स चैंपियनशिप में मिले थे। साल 2015 में, सत्यनारायण ने उन्हें प्रशिक्षित करने का फैसला किया और उन्हें बेंगलुरु ले आए। कठोर प्रशिक्षण के बाद, वह 2015 में दुनिया में पहला स्थान हासिल करने में सफल रहे।

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दिव्यांगता कमजोरी नहीं, ताकत है

स्वर्ण पदक विजेता, मरियप्पन (Mariyappan Thangavelu) का मानना है कि उनके पैर का अंगूठा जो विकृत है, उनका लकी चार्म है। मरियप्पन ने मार्च, 2016 में तब सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने आईपीसी ग्रैंड प्रिक्स ट्यूनीशिया में पुरुषों की हाई जंप (High Jump) स्पर्धा में 1.78 मीटर की दूरी तय की। यही वह जंप था, जिसने उन्हें रियो तक पहुंचाया। क्योंकि, क्वालिफाई करने के लिए योग्यता मानक 1.60 मीटर है।

वह कॉम्पिटिशन इतना मुश्किल था कि जो कोई भी उस वक्त इसे देख रहा था, उसकी सांसे थम सी गई थीं। बारह में से छह एथलीटों ने पहले आठ प्रयासों में 1.74 अंक हासिल किए थे। लेकिन मरियप्पन ने अपनी शानदार छलांग के साथ, महज जीत ही नहीं हासिल की, बल्कि पूरे शो को अपने नाम कर लिया। हर तरफ बस उनकी ही चर्चा थी।

साल 1972 में, तैराकी के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाले मुरलीकांत पेटकर और 2004 में जैवलिन थ्रो में पदक जीतने वाले देवेंद्र झाझड़िया के बाद, मरियप्पन तीसरे भारतीय पैराएथलीट हैं, जो पैरालिंपिक (Paralympic) में स्वर्ण जीतने में सफल रहे।

मूल लेखः गायत्री मनु

संपादनः मानबी कटोच

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