एग्रो-वेस्ट से इको-टेक्सटाइल: किसानों की मदद और फैशन दोनों साथ-साथ

मुंबई के कौशिक वरदान अपने स्टार्टअप, Raydan के जरिए कमल, गुलाब, केला, एलोवेरा, संतरे, नीलगिरि, मक्का, बांस और गन्ना जैसी फसलों के कचरे का इस्तेमाल इको फ्रेंडली कपड़ा बनाने में कर रहे हैं।

Fabric from Agro waste

भारत सरकार के नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कृषि और कृषि से संबंधित उद्योगों से हर साल लगभग 500 टन कचरा पैदा होता है। कचरे के प्रबंधन के लिए ज्यादातर लोग इसे जला देते हैं। जिसके कारण न सिर्फ वायु प्रदूषण बल्कि भूमि प्रदूषण भी बढ़ता है। लेकिन अगर इस कचरे को सही तरीकों से सही जगह इस्तेमाल में लिया जाए तो हम न सिर्फ प्रदूषण को रोक सकते हैं बल्कि एक सस्टेनेबल लाइफस्टाइल की तरफ कदम बढ़ा सकते हैं। 

बहुत से लोग पूछते हैं कि कृषि अपशिष्ट का भला क्या इस्तेमाल हो सकता है? लोगों को ज्यादातर यही पता है कि इससे आप खाद बना सकते हैं लेकिन इसमें काफी समय लगता है। इसलिए वे इसे जला देते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि कृषि के कचरे को टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कपड़ा बनाने के लिए इस्तेमाल में लिया जा सकता है? जी हां, यह बात सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन बिल्कुल सच है। आज देश में कई ऐसे स्टार्टअप और संगठन हैं जो कृषि के अपशिष्ट का इस्तेमाल इको फ्रेंडली कपड़ा बनाने में कर रहे हैं। 

इन्हीं में से एक हैं मुंबई के रहने वाले कौशिक वरदान। कौशिक ने साल 2019 में अपने स्टार्टअप, Raydan की शुरुआत की। जिसके जरिए वह कमल, गुलाब, केला, एलोवेरा, संतरे, नीलगिरि, मक्का, बांस और गन्ना जैसी फसलों के कचरे का इस्तेमाल इको फ्रेंडली कपड़ा बनाने में कर रहे हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए अपने स्टार्टअप और काम के बारे में बताया। 

कौशिक वरदान और उनकी माँ, भुवना

माँ बनी प्रेरणा 

कौशिक कहते हैं कि उन्होंने इंजीनियरिंग के बाद अपनी डिजाइनिंग में मास्टर्स की डिग्री की। लेकिन नौकरी करने की बजाय उन्होंने अपना खुद का स्टार्टअप शुरू किया। जिसके जरिए वह लोगों तक सस्टेनेबल कपड़ा पहुंचाना चाहते हैं। “इको फ्रेंडली और सस्टेनेबल फैब्रिक के बारे में जानकारी मुझे अपनी माँ, भुवना श्रीनिवास से मिली। क्योंकि माँ काफी समय से इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। वह पहले एरेका पाम की पत्तियों से बनने वाली क्रॉकरी के बिज़नेस से जुडी हुई थीं। इसके बाद, उन्होंने केले के फाइबर पर काम किया। कुछ साल पहले उन्होंने सस्टेनेबल फैब्रिक की ट्रेडिंग शुरू की। उनसे ही मैंने जाना की कैसे हमारे सामान्य कपड़े पर्यावरण के अनुकूल नहीं हैं और कैसे हम अपने ही खेतों के अपशिष्ट से प्रकृति के अनुकूल कपड़े बना सकते हैं,” उन्होंने कहा। 

वहीं, भुवना कहती हैं, “चाहे टेक्सटाइल हो या हमारे दैनिक जीवन की कोई दूसरी चीज, हमारी कोशिश हमेशा यही रही कि यह सस्टेनेबल हो। साथ ही, पिछले 15 सालों से इस क्षेत्र में काम करने का एक उद्देश्य यह भी रहा कि किसानों के लिए रोजगार के मौके उपलब्ध कराए जाएं। इसलिए जितना ज्यादा कृषि आधारित फाइबर का इस्तेमाल टेक्सटाइल इंडस्ट्री में होगा, उतना ज्यादा अच्छा है।”

कमल और बांस से बना कपड़ा

कौशिक ने अपनी माँ के साथ कई प्रोजेक्ट्स पर काम भी किया। वह कहते हैं कि उनकी माँ फैब्रिक के प्रमोशन से संबंधित काम से जुड़ीं थीं। लेकिन कौशिक खुद मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ना चाहते थे। इसलिए पढ़ाई के बाद नौकरी करने की बजाय उन्होंने अपना खुद का बिज़नेस शुरू करने का फैसला किया। भुवना ने भी उनका साथ दिया क्योंकि वह जानती हैं कि इस क्षेत्र में लोगों की जागरूकता बढ़ रही है। जब उन्होंने काम शुरू किया था तब सिर्फ बाहर के देशों जैसे अमेरिका, लंदन में इस तरह के कपड़े बन रहे थे। लेकिन अब भारत में न सिर्फ डिज़ाइनर बल्कि आम लोग भी इको फ्रेंडली फैब्रिक चाहते हैं।

कैसे करते हैं काम

कौशिक ने बताया कि उन्होंने दक्षिण भारत में अपनी यूनिट सेटअप की है। अपनी यूनिट के लिए वह आंध्र प्रदेश की मिल्स से रॉ मटीरियल खरीदते हैं। इन मिल्स में अलग-अलग तरह की फसलों से बचे कचरे के फाइबर से पहले धागा तैयार किया जाता है। इस तैयार धागे को कौशिक और उनकी टीम मिल्स से खरीदती है। फिर उनकी अपनी यूनिट में इस धागे की बुनाई करके अलग-अलग तरह का कपडा तैयार किया जाता है। कौशिक कहते हैं कि फ़िलहाल वह हर महीने लगभग एक टन यार्न मिल्स से खरीदते हैं। 

बायो नेचुरल टेक्सटाइल मिल के एक कर्मचारी बताते हैं कि वे पिछले एक साल से Raydan कम्पनी से जुड़े हुए हैं। उन्हें बहुत से फाइबर के बारे में कौशिक से पता चला। “हम इस व्यवसाय में पिछले 35 सालों से हैं। प्राकृतिक फाइबर से बन रहे कपड़ों के प्रति बढ़ती जागरूकता को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह भविष्य है,” उन्होंने आगे कहा।

उनकी यूनिट की तस्वीर

सस्टेनेबल फैब्रिक के प्रति बढ़ रही जागरूकता के कारण इन मिल्स को ज्यादा काम मिल रहा है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे इंडस्ट्री में मांग बढ़ रही है, वैसे ही किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया भी। पहले वे सिर्फ केला और बांस के फाइबर पर काम कर रहे थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से वे बागवानी कर रहे किसानों से भी जुड़ रहे हैं ताकि उन्हें संतरे के छिलके, गुलाब, कमल जैसे फूलों का वेस्ट मिल सके। जिनके फाइबर से वे और नए-नए कपड़ों पर काम कर पाएं।

कौशिक की टीम में फिलहाल 15 लोग काम करते हैं। जो अलग-अलग यार्न से फैब्रिक बनाते हैं जिसमें संतरे के छिलके, सोयाबीन, एलोवेरा, मक्का, कमल-बांस, केला-बांस, बांस-गुलाब, और नीलगिरि आदि के फाइबर से बना कपड़ा शामिल है। ये सभी कपड़े इको-फ्रेंडली होने के साथ-साथ रीसायक्लेबल भी हैं। साथ ही, पर्यावरण में जाने पर ये कपड़े चंद महीनों में ही नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। जबकि आजकल बन रहे लगभग 60% कपड़ों में ज्यादातर प्लास्टिक होता है, जिनमें पॉलीस्टर, नायलॉन और ऐक्रेलिक टेक्सटाइल शामिल है। 

लाखों में है टर्नओवर 

कौशिक बताते हैं कि कई मैन्युफैक्चरिंग कंपनी और डिज़ाइनर उनके ग्राहक हैं। जो उनसे यह सस्टेनेबल कपड़ा खरीद रहे हैं। “बाजार में अपनी जगह बनाना मुश्किल है। क्योंकि आजकल बहुत से लोग इको फ्रेंडली का लेबल लगाकर अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं। इसलिए शुरुआत में थोड़ी परेशानी हुई लेकिन हमारे कपड़े की गुणवत्ता को देखकर बहुत से ग्राहक हमसे खुद जुड़ने लगे। हम अलग-अलग सेक्टर में काम करने वाली मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को कपडा सप्लाई करते हैं जैसे शर्ट बनाने वाली कम्पनी, जुराबें और इनर वियर बनाने वाली कंपनियां,” उन्होंने बताया। 

ओडिशा हैंडलूम वीविंग एसोसिएशन का कहना है कि इससे पहले वे सिर्फ जैविक कपास में काम करते थे। लेकिन अब उन्हें और भी अलग-अलग पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों के बारे में जानकारी हो रही है। जिससे टेक्सटाइल इंडस्ट्री से प्लास्टिक को कम किया जा सकता है।

कौशिक कहते हैं कि पिछले एक साल में उनके स्टार्टअप ने लगभग 20 लाख रुपए का टर्नओवर कमाया है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले सालों में यह टर्नओवर दुगुना हो जायेगा क्योंकि बाजार में इको फ्रेंडली कपड़े की मांग बढ़ने लगी है। बहुत से लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और लगभग सभी ब्रांड्स जैविक और पर्यावरण के अनुकूल कपड़ों के सेक्टर में अपनी जगह बनाने में जुटी हैं। साथ ही, यह देश के किसानों के लिए भी अतिरिक्त आय का जरिया है। 

एलो वेरा फैब्रिक

“हम जिन मिल से रॉ मटीरियल खरीदते हैं, उनसे सैकड़ों किसान जुड़े हुए हैं। अगर हम मिल्स से अलग-अलग फसलों के फाइबर से धागे बनाने की मांग करते रहेंगे तो वे और ज्यादा किसानों से जुड़ेंगे और उनकी फसल का अपशिष्ट खरीदेंगे। इस तरह से अप्रत्यक्ष रूप से ही सही लेकिन अपने स्टार्टअप से माध्यम से हम किसानों के लिए भी कुछ कर पा रहे हैं। हालांकि, मुझे उम्मीद है कि आने वाले सालों में हम खुद सीधा किसान से जुड़ जाएंगे,” उन्होंने अंत में कहा। 

अगर आप कौशिक के बनाए कपड़ों के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो उनकी वेबसाइट देख सकते हैं। 

संपादन- जी एन झा

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