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भारत के एकमात्र बोट-म्यूजियम में देखिये 46 तरह की नौकाएं!

श्चिम बंगाल को अगर ‘नदियों की धरती’ कहा जाए तो गलत नही होगा। यहाँ का मछुआरा समुदाय कभी धन-धान्य से भरपूर हुआ करता था। कोलकाता के कंकुर्गाछी में अंबेडकर भवन में स्थित ‘बोट म्यूजियम’ को शायद इसी विरासत के सम्मान में बनाया गया है।

इस म्यूजियम में बांग्लादेश, उड़ीसा, और बंगाल की 46 तरह की अलग-अलग नावों की प्रतिकृति है। इनमें से कुछ नावें उन नावों की प्रतिकृति हैं, जिनका इस्तेमाल बहुत पहले किया जाता था, लेकिन वक़्त के साथ-साथ इनका अस्तित्व खत्म हो गया।

भारत के इस एकमात्र बोट म्यूजियम का श्रेय जाता है उपेंदरनाथ बिस्वास (केंद्रीय जांच ब्यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक) को।

उपेंदरनाथ बिस्वास/स्क्रॉल.कॉम

बंगाल में नावों की संस्कृति सदियों पुरानी है, जहाँ मछली पकड़ने से लेकर व्यापार तक के लिए अलग-अलग आकार और सरंचना वाली नावों का इस्तेमाल होता आया है। यहाँ तक कि यदि आप किसी नाव बनाने वाले के पास जाकर नाव बनाने के लिए कहे, तो वह सबसे पहले पूछेगा कि किस नदी के लिए नाव बनानी है?

तो आईये चलते हैं इस अनोखे म्यूजियम की सैर पर और जानते हैं इनमें रखे नावों के बारे में –

ढलोई नाव

सुंदरबन क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली नाव, जिसका उपयोग सुंदरबन से गोल पाता (निपा फ्रूटिकैन) और गारन कैथ (सेरियप्स रोक्सबर्गिया) ले जाने के लिए होता था। हालांकि, आज के समय में इसे  ईंट, रेत, टाइल्स और किसी भी अन्य सामान को लाने-ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

डिंगी नाव

इस नाव का इस्तेमाल यात्रियों को नदी के इस पार से उस पार ले जाने के लिए होता है। यह नाव सिर्फ कम बहाव वाली नदी में ही चलाई जा सकती है। पश्चिम बंगाल की हुगली में आपको यह दिख जायेगी, लेकिन उत्तरी बंगाल की नदियों में तेज बहाव के कारण वहां इसका इस्तेमाल नही होता है।

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डोंगा नाव

इस नाव को बंगाल के ग्रामीण इलाकों में ‘पानी की साइकिल’ कहा जाता है। इसमें केवल एक या दो लोग ही यात्रा कर सकते हैं और इसका उपयोग रोजमर्रा के घरेलु कामों के लिए होता है।

पद्मा नाव (कबिगुरु रबिन्द्रनाथ की नाव)

कबीगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के पास पाँच नौकाएं थीं और ‘पद्मा’ उनमें से एक है। उन्होंने बांग्लादेश से शिआल्दाह की अपनी यात्रा के दौरान इस नाव में समय बिताया। पद्मा नदी के किनारे अपनी मेज पर बैठकर, उन्होंने कई निबंध, पत्र और संपादित पत्रिकाओं को लिखा था। बहुत बार कबिगुरु ने इसी नाव पर आचार्य जगदीश चंद्र बोस, लोकेंद्रनाथ पालित और सुरेंद्रनाथ टैगोर जैसे मेहमानों की मेजबानी भी की थी।

पिनास/कश्ती नाव

इस नाव को ‘जहाज की नाव’ कहा जाता है। यह एक हल्की नाव है। जिसका इस्तेमाल अक्सर व्यापारी करते थे।

ट्रेवलर नाव

अंग्रेजी शब्द ‘ट्रेवलर’ के नाम से जानी जाने वाली इस नाव का उपयोग अक्सर मछली पकड़ने के लिए होता है।

इस म्यूजियम में आपको और भी बहुत सी नावों को देखने और उनके बारे में जानने का मौका मिलेगा। आज के दौर में जब नौकाओं का चलन ख़त्म सा होता जा रहा है, यह म्यूजियम हमारी धरोहर को जीवित रखने का एक अद्भुत प्रयास है!

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संपादन – मानबी कटोच


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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