वीडियो: मीराबाई ने भारत के लिए जीता पहला पदक, संघर्षों भरा रहा सफर

49 किलोग्राम कैटेगिरी की वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में मीराबाई चानू ने सिल्वर मेडल जीता। इस जीत के साथ ही वह भारत की तरफ से टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतनेवाली भारत की पहली खिलाड़ी बन गई हैं।

Meerabai chanu won medal in Tokyo olympics

टोक्यो ओलिंपिक का दूसरा दिन, भारत के लिए अच्छी ख़बर लेकर आया। वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ( Meerabai Chanu) ने वेटलिफ्टिंग में भारत को सिल्वर मेडल दिलाया।
मीराबाई, कभी पहाड़ों से लकड़ियां ढोकर लाती थीं, तब किसे पता था कि एक दिन, वह ओलंपिक्स में, सिर्फ भारत का प्रतिनिधित्व ही नहीं करेंगी, बल्कि देश के नाम एक मेडल भी जीतकर लाएंगी।

49 किलोग्राम कैटेगिरी की वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में मीराबाई चानू ने सिल्वर मेडल जीता। इस जीत के साथ ही, वह भारत की तरफ से टोक्यो ओलिंपिक में पदक जीतनेवाली भारत की पहली खिलाड़ी बन गई हैं। 

मीराबाई चानू की इस जीत के साथ ही, भारत का 21 सालों का इंतज़ार भी खत्म हो गया है। उन्होंने, क्लीन एंड जर्क में 115 किलोग्राम और स्नैच में 87 किलोग्राम वजन उठाया। इस तरह कुल 202 किलो वजन उठाकर, चानू ने रजत पदक अपने नाम किया। देखिये उस गौरवशाली क्षण का वीडियो –

आसान नहीं था सफर

मणीपुर के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं मीराबाई का जन्म 8 अगस्त 1994 को हुआ था। उस समय, महिला वेटलिफ्टर कुंजुरानी देवी स्टार थीं। चानू को उनसे ही प्रेरणा मिली और उन्होंने वेटलिफ्टर बनने की ठान ली। लेकिन माता-पिता पर 6 बच्चों की ज़िम्मेदारी और सुविधाओं की कमी के कारण, उन्हें कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा।

मीराबाई किसी भी हाल में हार मानने को तैयार नहीं थीं। शुरूआती दौर में, जब उनके पास प्रैक्टिस के लिए लोहे का बार नहीं था, तो वह बांस से ही अभ्यास करने लगीं। उनके गांव में कोई ट्रेनिंग सेंटर नहीं था, इसलिए उन्हें ट्रेनिंग के लिए करीब 60 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था।

आखिरकार, परिश्रम के आगे परेशानियों को घुटने टेकने ही पड़ते हैं। ज़िद के आगे अभाव भला कब तक टिकता? कड़ी मेहनत के दम पर वह, 11 साल की उम्र में अंडर-15 चैंपियन और 17 में जूनियर चैंपियन बन गईं। जिसे कभी अपना द्रोणाचार्य मानकर, उन्होंने अभ्यास शुरू किया था, साल 2016 में 192 किलो वज़न उठाकर, उसी कुंजुरानी के सालों के नेशनल रेकॉर्ड को तोड़ दिया।

जब खेल छोड़ने तक की, आ गई थी नौबत

आर्थिक हालत और संसाधननों की कमी के कारण, रियो ओलंपिक के दौरान मीराबाई के सामने ऐसे हालात आ गए थे, जब उन्हें यह तक सोचना पड़ा कि अगर इस बार सिलेक्शन नहीं हुआ, तो खेल छोड़ देंगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, उन्हें ओलंपिक्स के लिए चुन लिया गया।

हालांकि, वह साल उनके लिए काफी निराशाजनक रहा और वह रियो ओलिंपिक में कुछ खास कमाल नहीं कर पाईं। इसके बाद, उन्होंने अपने खेल में काफी सुधार किया और साल 2017 के विश्व चैम्पियनशिप और 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में बेहतरीन प्रदर्शन कर, गोल्ड मेडल जीता।

यह भी पढ़ेंः होमस्कूलिंग से एक कदम आगे बढ़कर, पुणे का यह परिवार अपने बच्चों की रोडस्कूलिंग करा रहा है

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें।