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एक केमिकल इंजिनियर जिसनें ‘अमर चित्र कथा’ की 439 कहानियां देकर भारतीय बच्चों को यहाँ की संस्कृति से जोड़े रखा

“या तो आप इसे स्वीकारेंगे या फिर ठुकरा देंगें। या तो आप इससे सहमत होंगे या फिर असहमत। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जरुरी यह है कि कम से कम आपको आपकी विरासत के बारे में जानकरी हो”

– अनंत पाई

म सब ने अपने बचपन में अमर चित्र कथा की कोई न कोई किताब पढ़ी है। दरअसल, अमर चित्र कथा कॉमिक्स में मनोरंजन के साथ-साथ हमारे इतिहास से जुड़े बहुत से महत्वपूर्ण सवालों के जबाब भी छिपे होते थे। कहीं न कहीं इस कॉमिक्स के चलते बहुत से छात्रों को इतिहास विषय से प्रेम हो गया था।

लेकिन अमर चित्र कथा को हमारे जीवन में लाने और घर-घर पहुंचाने का श्रेय जाता है ‘अंकल पाई’ को। जी हाँ, सब बच्चों के प्यारे अंकल पाई, जिन्होंने पढ़ाई तो केमिकल इंजीनियरिंग की की थी लेकिन नौकरी की पत्रकार के रूप में।

1967 में दूरदर्शन पर एक टीवी क्विज़ शो देखते हुए, अनंत पाई को एहसास हुआ कि शो में भारतीय बच्चे ग्रीक पौराणिक कथाओं के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब तो आसानी से दे रहे हैं, लेकिन अपने ही देश के महाकाव्य ‘रामायण’ के सबसे महत्वपूर्ण चरित्र – राम के बारे में एक साधारण से सवाल का जवाब नहीं दे सके। इस बात ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने एक कॉमिक बुक श्रृंखला शुरू करने की ठानी।

यह कॉमिक बुक श्रृंखला थी ‘अमर चित्र कथा’ और वे युवा पत्रकार थे अनंत पाई, एक अनौपचारिक लेखक और चित्रकार, जिन्हें बाद में पुरे विश्व में “भारतीय कॉमिक्स के पिता” के रूप में पहचाना गया।

अनंत पाई

इस बात ने उन्हें बहुत प्रभावित किया और उन्होंने एक कॉमिक बुक श्रृंखला शुरू कर इस स्थिति को बदलने के बारे में सोचा। इन कॉमिक में उन्होंने भारतीय महाकाव्यों और इतिहास को खूबसूरती से तस्वीरों के साथ बच्चों के अनुकूल कहानियों के माध्यम से पहुंचाने का फैसला किया। यह कॉमिक बुक श्रृंखला थी ‘अमर चित्र कथा’ और वे युवा पत्रकार थे अनंत पाई, एक अनौपचारिक लेखक और चित्रकार, जिन्हें बाद में पुरे विश्व में “भारतीय कॉमिक्स के पिता” के रूप में पहचाना गया।

90 के दशक में पैदा हुए हर एक भारतीय बच्चे के लिए, अमर चित्र कथा और इसकी कहानियों की रोचक दुनिया उनके जीवन का पर्याय बन गयी थीं।

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स्कूल की लाइब्रेरी में संस्कृत के ग्रंथों और एनिड ब्लीटन के बीच की दूरी को पाटती इस कॉमिक बुक सीरीज ने लोक कथाओं और पौराणिक कथाओं की देश की समृद्ध विरासत के बारे में भारतीय बच्चों की कई पीढ़ियों को पढ़ाया। बच्चों के दिलों में अनंत के लिए अलग ही प्यार था और इसलिए बच्चों ने उन्हें नाम दिया ‘अंकल पाई’! आईये जानते हैं 17 सितंबर 1929 को जन्मे अंकल पाई के सफ़र के बारे में और जानिये कैसे बनी भारत की सबसे पसंदीदा कॉमिक ‘अमर चित्र कथा’।

कर्नाटक के कर्काल से ताल्लुक रखने वाले अनंत ने मात्र 2 साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था। जिसके बाद वे शुरू में अपने रिश्तेदारों के यहां मैंग्लोर में और फिर मुंबई में पले- बढे। बहुत छोटी उम्र में ही उन्हें साहित्य से प्यार हो गया था और उन्होंने कई भारतीय भाषाएं सीखने के लिए वक़्त दिया।

स्कूल की पढ़ाई के बाद अनंत पत्रकारिता पढ़ना चाहते थे, लेकिन अपने बड़े भाई के कहने पर उन्हें केमिकल इंजीनियरिंग करनी पड़ी। हालांकि, अपने करियर के शुरूआती दिनों में ही उन्होंने इंजीनियरिंग छोड़ पत्रकार के रूप में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साथ काम करना शुरू कर दिया।  यहां, उनको इंद्रराज कॉमिक्स (एक ऐसी कॉमिक श्रृंखला जो अमेरिकी कॉमिक्स जैसे द फैंटॉम, फ्लैश गॉर्डन और मँड्रेक को भारतीय पाठकों तक लाती थी) का प्रबंधन संभालना था।

लेकिन जब करोल बाग (दिल्ली) के बाजार में उन्होंने उल्लेखित क्विज शो देखा तो वे भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं के आधार पर कॉमिक्स की एक श्रृंखला शुरू करने के लिए प्रेरित हुए।

साल 1967 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने कई प्रकाशन फर्म के सामने अपनी कॉमिक्स के आईडिया को साँझा किया। लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी।

बहुत संघर्ष के बाद अमर चित्र कथा का यह दृढ़-विश्वासी लेखक आख़िरकार इंडिया बुक हाउस के जीएल मीरचंदानी को उन्हें एक मौका देने के लिए मनाने में कामयाब रहे।

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यह जानते हुए भी कि वे जोखिम उठा रहे हैं, पाई और मीरचंदानी की टीम ने काम शुरू किया। लेकिन यह बात सच तब हुई जब इस श्रृंखला को शुरूआती सालों में घाटा मिलना शुरू हुआ। स्कूल अपनी लाइब्रेरी के लिए कॉमिक्स नहीं खरीदते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि यह बेवकूफी है। किताब की दुकानों ने भी इसे रखने से मना कर दिया क्योंकि किसी बड़े ब्रांड का नाम इससे नहीं जुड़ा था।

लेकिन चीजें बदलने वाली थीं। अपनी कॉमिक किताबों के प्रभाव को साबित करने के लिए, पाई ने एक बहुत ही लग एक्सपेरिमेंट के लिए दिल्ली के एक स्कूल को राजी किया, जिसके तहत एक क्लास को इतिहास के बारे में ‘अमर चित्र कथा’ कॉमिक से पढ़ाया गया तो दूसरी क्लास को पारम्परिक किताबों से। जब उन दोनों क्लास के बीच एक क़्विज रखी गयी तो पता चला कि अमर चित्र कथा पढ़ने वाले बच्चों को इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी थी।

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और जैसे ही इस एक्सपेरिमेंट के बारे में ख़बरें फैली, तो बच्चों के माता-पिता, स्कूलों और दुकानदारों ने पाई की कॉमिक किताबों को खरीदना शुरू कर दिया। अमर चित्र कथा की बहादुर योद्धाओं, शानदार कपड़े पहने हुए रानियों, सुंदर देवताओं, योजनाबद्ध खलनायकों और डरावने राक्षसों के बारे में खूबसूरती से सचित्र कहानियों को पढ़ना आसान था और इसलिए इसने पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था।

इसके बाद अमर चित्र कथा ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अमर चित्र कथा द्वारा सैकड़ों शीर्षक और 10 लाख से भी ज्यादा किताबें प्रकाशित की गयीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक अभी भी ये सालाना 30 लाख प्रतियां बेचती है और इसके 440 शीर्षकों के साथ आज तक 10 करोड़ से अधिक प्रतियां बेची गयी हैं!

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इसके दो साल बाद, पाई ने भारत का पहला कॉमिक और कार्टून सिंडिकेट, रंग रेखा फीचर्स लॉन्च किया, जिसने बच्चों के लिए दिलचस्प तथ्य और स्निपेट जारी किए। 1978 में, उन्होंने पार्थ इंस्टीट्यूट ऑफ पर्सनलिटी डेवलपमेंट की स्थापना की, जिसमें युवाओं के लिए व्यक्तित्व विकास पर वर्कशॉप आयोजित की गईं।

साल 1987 में, पाई ने बच्चों की एक पत्रिका शुरू की, जो अमर चित्र कथा की ही तरह प्रसिद्ध हुई। पाई अपनी हर एक कहानी के लिए इतिहास के पन्ने खंगालते थे। उनकी द्वारा रचित हर एक कॉमिक बुक में आपको पुराण, ऐतिहासिक किताबों, लोक कथाओं के संदर्भ मिलेंगें। बहुत सी भाषाएँ जानने वाले पाई ने केवल जातक कथाएं पढ़ने के लिए पाली भाषा सीखी।

टिंकल के माध्यम से ही उन्हें ‘अंकल पाई’ का नाम मिला। वे पत्रिका में बच्चों के सवालों और उनके पत्रों का जबाब इसी नाम से देते थे।

इस कॉमिक से जुड़े हर रचनात्मक प्रक्रिया के पहलू में पाई शामिल रहते थे। स्क्रिप्ट से लेकर स्केच तक वे सब कुछ देखते और साथ ही जोर देते कि हर एक किताब पर महीनों तक रिसर्च हुआ हो।

एक व्यक्ति, जिसके लिए हर एक किताब उसका प्यार, उसकी मेहनत थी, उसने अकेले अमर चित्र कथा के 439 शीर्षकों को सम्पादित किया।

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अमर चित्र कथा परिवार में पाई को चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया माना जाता था। क्योंकि उनके पास हर एक अवसर के लिए कोई न कोई कहानी होती थी और अक्सर किसी न किसी कहानी के माध्यम से वे अपने सह-कर्मचारियों को  गलती होने पर सही करते थे। उनके बारे में कई दिलचस्प किस्से हैं – फिर वह चाहे खुद पेट्रोल पंप पर खड़े होकर अपनी कॉमिक्स बेचना हो या फिर सोवियत राजनेता मिखाइल गोर्बाचेव द्वारा उन्हें फ़ोन करके एक संस्कृत के श्लोक का सही अर्थ जानना हो।

उनके बारे में एक और बात बहुत प्रसिद्द है और वो ये कि वे बच्चों के बीच बैठकर अपनी कॉमिक की किताब में से उन्हें कहानी सुनाते थे। 

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यह वह काम था, जिससे पाई को सबसे ज्यादा सुख मिलता था। और वे ऐसा अपने जीवन के आखिरी सालों तक भी करते रहे।

साल 2007 में, इंडिया बुक हाउस उद्यमियों की एक नई टीम को बेच दिया गया था, लेकिन फिर भी पाई मुख्य कहानीकार के रूप में रहे। एक फ्रैक्चर के लिए सर्जरी करवाने के कुछ दिन बाद 24 फ़रवरी 2011 को दिल का दौरा पड़ने से पाई ने दुनिया को अलविदा कह दिया। इससे सिर्फ छह दिन पहले, उन्हें भारत के पहले कॉमिक सम्मेलन में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

भारतीय कॉमिक्स के पिता कहें जाने वाले पाई की अपनी कोई संतान नहीं थी, पर दुनिया भर के बच्चों के चेहरे पर वे आजीवन मुस्कान बिखेरते रहें।

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दिलचस्प बात है कि अमर चित्र कथा द्वारा अब अनंत पाई के जीवन की कहानी को भी एक कॉमिक का रूप दिया गया है। यह अपने संस्थापक और निर्माता, एक केमिकल इंजीनियर की कहानी बताती है जो भारतीय बच्चों को अपनी जड़ों के बारे में बताना चाहता था। जितना प्यार अनंत ने देश के बच्चों को दिया, उतना ही प्यार और सम्मान उन्हें देश से मिला और यह बात साल 1994 में हुई एक आकस्मिक घटना से साबित हती है। दरअसल, उस साल अमर चित्र कथा के कार्यालय में आग लग गई थी जिसमें कॉमिक श्रृंखला की सभी कलाकृतियां और मूल प्रतियां जल गयीं। इस दुखद घटना के बारे में छापकर अमर चित्र कथा ने पाठकों से अपील की, कि यदि उनके पास कॉमिक बुक की अतिरिक्त प्रतियां हो तो वे टिंकल के अगले अंक में उन्हें भेज दें। और हैरानी की बात हैं कि पाठकों ने इस अपील को पढ़कर, हर उस कहानी को भेजा, जो कार्यालय में जल चुकी थीं! और फिर एक बार ‘अमर चित्र कथा’ की सारी कहानियां अनंत काल तक अमर हो गयी!

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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