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कभी मॉल में संभालते थे स्टोर, फैशन सेंस से खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

बेंगलुरु के रहने वाले सिड नायडू एक एडवरटाइजिंग और मीडिया कंपनी चलाते हैं, जिसका टर्नओवर लगभग चार करोड़ रुपए है। लेकिन एक समय था जब सिड अपने घर का खर्च चलाने के लिए अखबार बांटा करते थे।

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बचपन से ही हमारी आँखों में अलग-अलग सपने घर बनाने लगते हैं। कोई आसमान में उड़ते जहाजों को देखकर पायलट बनने का ख्वाब सजाता है, तो कोई टीवी शो और फ़िल्में देखकर स्टार बनने का। लेकिन बहुत ही कम बच्चों के सपनों को मुकाम मिल पाता है। क्योंकि अक्सर जिंदगी के साथ लोग दो वक्त की रोटी जुटाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने सपनों को भूल ही जाते हैं। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने जिंदगी में बड़ी से बड़ी मुश्किलें झेली, कई बार भूखे भी सोये, लेकिन अपने सपनों को नहीं मरने दिया। सालों तक, दिन-रात मेहनत करके उन्होंने आज अपना एक नाम कमाया है।

हम बात कर रहे हैं बेंगलुरु के रहनेवाले सिड नायडू की, जो ‘सिड प्रोडक्शंस‘ नाम से अपना एडवरटाइजिंग और मीडिया प्रोडक्शन हाउस चला रहे हैं। आज बड़े-बड़े ब्रांड्स के लिए शूट और मार्केटिंग कैंपेन करने वाले सिड नायडू मात्र दसवीं पास हैं। लेकिन अपने सपनों को पूरा करने की उनकी चाह और जूनून ने उन्हें सफलता की राह दिखाई। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने अपने पूरे सफर के बारे में बताया। 

एक साधारण परिवार से आनेवाले सिड नायडू ने, 2002 में अपने पिता को खो दिया था। उस समय वह मात्र 11 साल के थे। उनकी और उनके छोटे भाई, छह वर्षीय किरण नायडू की पूरी ज़िम्मेदारी उनकी माँ पर आ गयी। सिड बताते हैं, “माँ ने एक स्कूल में क्लर्क की जॉब शुरू कर दी। उन्हें महीने के 1500 रुपए मिलते थे। लेकिन उनकी सैलरी से घर चलाना बहुत ही मुश्किल था। इसलिए मैंने भी काम करना शुरू कर दिया। मैं सुबह स्कूल जाने से पहले अखबार बांटने लगा। यह काम मैंने दसवीं कक्षा तक किया। दसवीं के बाद मैंने एक जगह ऑफिस बॉय की नौकरी शुरू की। इस बीच माँ भी अलग-अलग जगह काम करती रहीं।” 

250 रुपए से शुरू हुआ था सफर

Fashion Producer Sid Naidu
Sid’s Old House and His Mother

सिड बताते हैं कि जब वह अखबार बांटते थे, तो उन्हें हर महीने 250 रुपए मिलते थे। इसके बाद, जब उन्होंने ऑफिस बॉय की नौकरी शुरू की, तो उन्हें 3000 रुपए प्रतिमाह मिलने लगे। सिड कहते हैं, “ऑफिस बॉय का काम आसान नहीं था, लेकिन घर चलाने के लिए मुझे जो काम मिलता, मैं करता था। कुछ समय तक यह काम करने के बाद, मैंने एक कैफ़े में सर्विस बॉय का काम करना शुरू किया। यहां काम करते-करते मैं स्टोर मैनेजर भी बन गया। इसके बाद बेंगलुरु के एक मॉल में रिटेल स्टोर से जुड़ गया।” 

मॉल में काम करते हुए उनकी पहचान, फैशन और इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े लोगों से होने लगी। इन लोगों के साथ काम करते हुए, सिड भी फैशन की दुनिया को समझने लगे और उन्होंने इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने बताया, “मेरी आखिरी नौकरी एक एडवरटाइजिंग और मीडिया कंपनी के साथ थी। उनके साथ मैंने चार साल तक काम किया और सभी चीजों को बारीकी से सीखा। इस कंपनी में काम करते हुए, एक फैशन शूट करने का मौका मिला, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया था।” 

इसके बाद तो उन्हें अलग-अलग ब्रांड्स से ऑफर मिलने लगा। लेकिन समस्या थी कि उनकी अपनी कंपनी नहीं थी। वह कहते हैं, “मैंने अपनी जिंदगी में बुरे से बुरा समय देखा है। मेरे दिल में हमेशा से यही चाहत थी कि मैं अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी दूँ। लोगों के बीच मेरी अपनी एक पहचान हो। इसलिए मुझे जैसे ही मौका मिला, मैंने उसे अपने हाथ से नहीं जाने दिया। इसमें रिस्क था, लेकिन मुझे लगा कि अब नहीं किया, तो शायद कभी नहीं कर पाऊंगा।” 

पहली और आखिरी बार माँगा उधार

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साल 2017 में उन्होंने अपनी कंपनी शुरू की। हालांकि, यह करना आसान नहीं था। “मुझे जो पहला प्रोजेक्ट मिला, वह लगभग 18 लाख रुपए का था। शुरुआत में मुझे कम से कम पांच लाख रुपए की इंवेस्टमेंट करनी थी। लेकिन मेरे पास बचत के सिर्फ दो लाख रुपए थे, जो मैंने सालों की मेहनत से इकट्ठा किए थे। इसलिए मैंने अपने जानकारों से पैसे मांगे, क्योंकि मुझे खुद पर भरोसा था। और यह आखिरी बार था, जब मैंने किसी से पैसे उधार मांगे थे,” उन्होंने कहा। 

दिन-रात मेहनत करके सिड ने अपने पहले प्रोजेक्ट को सफल बनाया। इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2017 में ‘सिड प्रोडक्शंस’ को उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर रजिस्टर किया, जो बारहवीं तक पढ़े हैं और एक फैशन फोटोग्राफर हैं। सिड कहते हैं, “किरण मुझसे लगभग छह साल छोटा है। उसने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की और मेरे साथ काम करने लगा, क्योंकि उसे फैशन फोटोग्राफी में दिलचस्पी थी। मेरी माँ और भाई हमेशा हर कदम पर मेरे साथ रहे। उन्होंने मेरे हर फैसले में अपना भरोसा दिखाया।”

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सिड का पहला प्रोजेक्ट Myntra के लिए थे। लेकिन आज वह अमेज़न, फ्लिपकार्ट, चुंबक, ग्लोबल देसी, यूएस पोलो, वीवो, डाबर, फ्लाइंग मशीन जैसी कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं। इन ब्रांड्स के लिए उनकी कंपनी फैशन शूट, स्टोर लॉन्च और इन्फ्लुएंसर इवेंट्स करती है। उनकी कंपनी का टर्नओवर लगभग चार करोड़ रुपए तक पहुँच चुका है। 

संघर्ष ने दिया आगे बढ़ने का हौसला 

आखिर ऐसी क्या बात थी, जिसने सिड को हमेशा आगे बढ़ने का हौसला दिया? इस पर वह बताते हैं, “मैंने और मेरी माँ ने जो संघर्ष किया, वह आज भी हमें याद है। जब मैं अखबार बांटता था, तो एक दिन मुझे अख़बारों के चार बैग ले जाने थे। मैं रेलवे लाइन पार कर रहा था कि मेरी साइकिल का पहिया रेलवे ट्रैक में फंस गया। तभी मुझे रेल की आवाज सुनाई दी, जो उसी ट्रैक पर आ रही थी। मैंने जल्दी-जल्दी में साइकिल को जोर से खींचा और आगे की रेलवे ट्रैक के बाहर गिर गया। साइकिल और अख़बारों के बैग, मेरे ऊपर गिर पड़े थे। मेरा एक दांत भी टूट गया था और मुझे काफी चोट आयी।” 

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वह आगे कहते हैं कि आज भी वह घटना याद आती है, तो उनका मन भर आता है, क्योंकि वह वक्त उनके लिए बहुत ही मुश्किल था। उसी मुश्किल वक्त ने उन्हें हिम्मत दी कि वह अपने परिवार को गरीबी और लाचारी से निकालें और एक बेहतर जिंदगी दें। सिड कहते हैं कि अभी उन्हें और भी बहुत कुछ करना है। प्रोडक्शन कंपनी के बाद, उन्होंने अपनी ‘वेडिंग प्लानर’ कंपनी, ‘बनाना लीफ‘ भी शुरू की है, जिसके अंतर्गत वह कम बजट की इको-फ्रेंडली शादियां कराते हैं। अब तक वह 30 से ज्यादा इको फ्रेंडली शादियां करवा चुके हैं। 

आगे उनका सपना फिल्म इंडस्ट्री में डायरेक्टर्स के साथ काम करने का है। साथ ही, वह अपने काम को बेंगलुरु और मुंबई के बाहर दिल्ली जैसे शहरों में भी ले जाना चाहते हैं। फिलहाल, वह कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन में परेशानियों से जूझ रहे लोगों की मदद कर रहे हैं। लगभग 150 लोगों की टीम के साथ मिलकर वह कोविड-19 मरीजों के लिए आईसीयू बेड, ऑक्सीजन सिलिंडर, दवाईयां और खाने आदि की व्यवस्था करा रहे हैं। वह कहते हैं कि पिछले एक महीने में उन्होंने लगभग 500 लोगों की मदद की है। 

सिड नायडू की कहानी हम सबके लिए प्रेरणा है। अपने जैसे लोगों के लिए वह सिर्फ एक सलाह देते हैं कि अपने आप पर विश्वास करो, क्योंकि आप कुछ भी कर सकते हैं। इसलिए हार मानने की बजाय नए-नए मौके तलाशिए और मेहनत कीजिए। सच्ची मेहनत से ही सफलता मिलती है। द बेटर इंडिया सिड नायडू के हौसले और जज़्बे को सलाम करता है। उम्मीद है कि उनकी फर्श से अर्श तक पहुँचने की कहानी बहुत से युवाओं को प्रेरित करेगी। 

संपादन- जी एन झा

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