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भगवान सिंह ने रोइंग में जीता ब्रॉन्ज़ मेडल; कभी मजबूरी में पढ़ाई छोड़कर की थी सेना में नौकरी!

क्सर हमें खेलों के इतिहास में खिलाडियों के संघर्ष की ऐसी सच्ची कहानियां सुनने को मिलती हैं, जो सबके दिलों को छु जाती हैं। ऐसी ही संघर्ष भरी कहानी है भारतीय सेना के रोवर (नाव खेने वाला) भगवान सिंह की।

मोगा से लेकर एशियाई खेल 2018 तक की उनकी कहानी प्रेरणास्पद है। आज हुए फाइनल में उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता है। 25 वर्षीय भगवान ने कभी नहीं सोचा था कि वे कभी एशियाई खेलों में हिस्सा लेंगें, क्योंकि भाग्य ने उन्हें कलम छोड़ कर चप्पू उठाने पर मजबूर कर दिया।

भगवान सिंह ने बताया कि साल 2012 में वे चंडीगढ़ में पत्रकारिता कर रहे थे। जब उन्हें अपने पापा की टीबी (क्षय रोग) की बीमारी के बारे में पता चला। इसलिए उन्हें पढ़ाई छोड़ कर नौकरी करनी पड़ी। ताकि वे अपने परिवार को संभाल पाएं।

“मेरे पापा एक ट्रक ड्राइवर हैं और इसी सब में उन्हें पीने की लत लग गयी। मुझे ख़ुशी है कि कम से कम वो हमारे साथ हैं। लेकिन उनकी तबियत अभी भी ठीक नहीं है,” भगवान ने बताया

भारतीय सेना ज्वाइन करने के बाद उनके रोइंग के टैलेंट के बारे में उन्हें पता चला। इसके बाद वे पुणे में आर्मी रोइंग नोड चले गए, जहां उनकी ट्रेनिंग हुई।

पहले रोइंग सेंटर हैदराबाद में था, बाद में इसे पुणे शिफ्ट कर दिया गया।

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“मैंने बहुत बुरा वक़्त देखा है। लेकिन आज मैं यहां भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ, इसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा करता हूँ। भारतीय सेना की वजह से ही आज मैं अपने बूढ़े माता- पिता का ख्याल रख पा रहा हूँ। हालांकि बहुत ज्यादा पैसे तो नहीं है पर फिर भी पिछली ज़िन्दगी से आज की ज़िन्दगी बहुत अच्छी है,”  उन्होंने कहा।

“हालांकि घर पर बहुत परेशानियां हैं, लेकिन रोइंग करके मुझे ख़ुशी मिलती है। यह मेरे लिए घर के बाहर दूसरा घर है।”

एशियाई खेलों में 34 रोवर (खिवैया) में से 33 भारतीय सेना से हैं।

मूल लेख: रेमंड इंजीनियर

संपादन – मानबी कटोच


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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