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विज्ञान को अध्यात्म से जोड़ने वाले ‘गणितज्ञ संत’ प्रो. महान एमजे को मिला भारत का सर्वोच्च शैक्षिक सम्मान!

प्रोफेसर महान एमजे/फेसबुक

ध्यात्मिकता और गणित का संयोजन भारत के लिए नया नहीं है। न्यूटन भी मानते थे कि गणित आर्यभट्ट की देन है; जो न केवल महान विद्वान थे, बल्कि आध्यात्म से भी जुड़े हुए थे। इतिहास से ही विज्ञान और आध्यात्म एक दूसरे के साथ चलते आये हैं।

मुंबई में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) के प्रोफेसर महान एमजे एक ऐसे ही व्यक्ति हैं, जो गणितज्ञ के जीवन को एक संत के साथ जोड़ते हैं। प्रोफेसर महान एमजे, जो महान महाराज या स्वामी विद्यानाथानन्द के रूप में जाने जाते हैं, एक उत्कृष्ट भारतीय गणितज्ञ और रामकृष्ण आदेश के प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संत हैं।

महान एमजे का जन्म 5 अप्रैल 1968 को हुआ था। उन्होंने कोलकाता में सेंट जेवियर के कॉलेजिएट स्कूल से हाईस्कूल पूरा किया था। उसके बाद वह आईआईटी कानपुर गए जहां उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढाई शुरू की लेकिन जल्द ही गणित में चले गए क्योंकि उन्हें पता था कि उनकी रुचि गणित में हैं।

उन्होंने 1992 में गणित में स्नातकोत्तर के साथ आईआईटी कानपुर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और फिर 1997 में कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले, यूएसए से उसी विषय में पीएचडी की।

बर्कले में, महान ने स्वामी विवेकानंद के कुछ लेख पढ़ना शुरू किया। जब वह अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भारत आए, तो उन्होंने एक संत बनने का फैसला किया। उन्हें अपने माता-पिता को मनाने के लिए समय लगा, लेकिन आखिरकार, उन्होंने मना ही लिया।

लाइवमिंट के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया, “मेरे माता-पिता को मनाने के लिए छह महीने लग गए, जो अन्य बातों को लेकर चिंतित थे, कि मेरे पास बैंक बैलेंस या परिवार नहीं होगा। इस के दौरान, मैंने धैर्यपूर्वक चेन्नई गणितीय संस्थान में काम किया।”

वह 2015 तक रामकृष्ण मिशन विवेकानंद विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर और अनुसंधान के डीन थे और फिर कोलकाता में रामकृष्ण मठ में शामिल हो गए थे।

Promotion

साल 20018 में उन्होंने योगित्व में स्नातक प्राप्त किया और उस दौरान वे कर्नाटक के बेलूर में रामकृष्ण मिशन विवेकानंद विश्वविद्यालय में गणित विभाग में प्रोफेसर थे। उनके उत्कृष्ट प्रकाशनों के साथ उन्होंने गणितीय विज्ञान की दुनिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कभी भी धर्म को विज्ञान में हस्तक्षेप नहीं करने दिया।

एनडीटीवी के साथ एक साक्षात्कार में, जब धर्म के बारे में पूछा गया, तो महान ने जवाब दिया, “मैं कोई संगठित धर्म का पालन नहीं करता हूं। यदि आपने मुझसे किसी एक को चुनने को पूछा और मेरे सिर पर बंदूक रखी, तो शायद मैं विज्ञान कहूंगा।”

महान ने 2011 में शांति स्वरुप भटनागर पुरस्कार जीता जो कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत के शीर्ष पुरस्कारों में से एक है। गणित में उनके निरंतर प्रयासों ने उन्हें 2015 में गणितीय विज्ञान के लिए प्रतिष्ठित इंफोसिस पुरस्कार जीताया।

प्रोफेसर महान एमजे मुंबई में एक मौलिक विज्ञान शिक्षा ट्रस्ट की स्थापना के माध्यम से भारत में गणित को सिखाए जाने के तरीके को बदलने के लिए दृढ़ संकल्पित है। इसके लिए वह अपने मित्र राजेश गोपाकुमार जो कि बेंगलुरु में इंटरनेशनल सेंटर फॉर सैद्धांतिक विज्ञान में सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी हैं। उनके साथ काम कर रहे हैं और उनके दो छात्र उनका सहयोग कर रहे हैं।

ट्रस्ट का उद्देश्य शिक्षा में विशेष रूप से गणित में नए विचारों को बढ़ावा देना है। प्रोफेसर महान ने ट्रस्ट की स्थापना के लिए 65 लाख रुपये के इंफोसिस पुरस्कार से इनाम राशि भी दान की है।

एक संत जो विज्ञान के धर्म में विश्वास करता है और इसका प्रचार निश्चित रूप से ज्ञान अर्जित करने के लिए एक प्रेरणा है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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