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दिव्या काकराण का संघर्ष : माँ घर पर लंगोट सीलती और पिता जगह-जगह होने वाले दंगलों में बेचते!

ब से एशियाई खेल 2018 शुरू हुए हैं, भारत हर दिन कुश्ती में मेडल जीत रहा है। मंगलवार को दिव्या काकराण ने इंडोनेसिया में 68 किलोग्राम केटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीता है।

मैच में उनकी प्रतिद्विंदी चीनी ताइपे की चेन वेनलिंग थीं, जिन्हें उन्होंने बहुत ही शानदार तरीके से काबू कर मात्र डेढ़ मिनट में मैच खत्म कर दिया।

पर दिव्या को यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उनका संघर्ष बहुत कम उम्र से शुरू हो गया था।

कुश्ती या दंगल, जिस खेल पर हमेशा पुरुषों का स्वामित्व रहा, उसी खेल में लड़कों को चित्त करके आगे बढ़ीं हैं, दिल्ली के गोकुलपुर की रहने वाली 20 वर्षीय दिव्या काकराण। उनके पिता सूरज भी कभी पहलवान थे, लेकिन वे बहुत आगे नहीं बढ़ पाए।

इसलिए घर चलाने के लिए दिव्या की माँ, संयोगिता घर पर कुश्ती में पहलवानों द्वारा पहने जाने वाले लंगोट सिलती थीं और दिव्या के पिता जगह-जगह होने वाले दंगलों में यह लंगोट बेचते।

एक दंगल मुकाबले के दौरान दिव्या/द इंडियन एक्सप्रेस

दिव्या बचपन में अपने बड़े भाई देव के साथ राजकुमार गोस्वामी के अखाड़े में जाती थी और वहां कोने में बैठी रहती। इसी तरह धीरे-धीरे उनका भी रुझान कुश्ती की तरफ बढ़ने लगा। वह एक बार में 2,000 उठक-बैठक कर लेती थी। यह देखकर राजकुमार के बेटे अशोक ने उसे साल 2010 से ट्रेनिंग देना शुरू किया।

पर दिव्या को कुश्ती में उतरने के लिए बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। ऐसा नहीं है कि कुश्ती में और कोई लड़की नहीं है। दिव्या के बहुत पहले, दीपिका और सोनिका कुश्ती में उतरने वाली पहली लड़कियां थीं। इनके अलावा फोगाट बहनों को कोई नहीं भूल सकता है। लेकिन दिव्या के लिए यह सफर और भी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि दिव्या सैन (नाई) जाति से है और समाज में उन्हें छोटा माना जाता है।

लेकिन दिव्या और उसके परिवार ने पीछे हटने से मना कर दिया। नेशनल में चयन होने से पहले दिव्या ने दिल्ली के आस-पास हरियाणा, पंजाब और यूपी में होने वाले स्थानीय दंगलों में न केवल महिला प्रतिद्विंदी बल्कि लड़कों से भी कुश्ती लड़ी।

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “मेरे इतने सारे मुकाबलों में जहां मुझे जीतना चाहिए था, वहां आयोजक मैच को ड्रॉ बता देते थे। क्योंकि यह शर्म की बात बन जाती अगर उनके गांव का लड़का एक लड़की से हार जाता।”

दिव्या के जीते हुए मैडल और ट्रॉफी/द इंडियन एक्सप्रेस

परिवार में आर्थिक तंगी के कारण सूरज काकराण अपने किसी एक बच्चे को ही कुश्ती में रख सकते थे। ऐसे में दिव्या के भाई देव ने कुश्ती छोड़ दी। उसने कहा, “हमारे पास हम दोनों के लिए पैसे नहीं थे और हम जानते थे कि दिव्या मुझसे बेहतर है इसलिए उसे आगे बढ़ाना चाहिए।”

दिव्या ने अब तक राज्य, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 60 मेडल जीते हैं और वह आठ बार भारत केसरी बनी हैं। एशियाई खेलों में पदक जीतने पर उन्होंने कहा, “यह मेरा पहला एशियाई खेल है और इसमें पहला पदक है। मुझे ख़ुशी है कि मैं इसे कर पायी। मेरे कोच (कुलदीप मालिक) को मुझ पर मुझसे भी ज्यादा भरोसा था।”

भारत के राष्ट्रीय महिला फ्रीस्टाइल कोच कुलदीप मलिक ने कहा, “वह अभी युवा है और इस स्तर का यह उसका पहला टूर्नामेंट था। वह और भी बेहतर हो जाएगी।”

एशियाई खेलों में कुश्ती में यह भारत का तीसरा मेडल है, इससे पहले बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।

दिव्या की कहानी यहां देखें,

संपादन – मानबी कटोच


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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