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पक्षियों को भूखा देख, कॉलेज में बनाया सूरजमुखी का बागान, रोज़ आते हैं करीब 500 तोते

पक्षियों को भूखा देख, कॉलेज में बनाया सूरजमुखी का बागान, रोज़ आते हैं करीब 500 तोते

ओडिशा के बाड़गढ़ जिले में स्थित इम्पीरियल कॉलेज के निदेशक, दीपक गोयल ने कॉलेज परिसर की लगभग आधा एकड़ जमीन पर सूरजमुखी के पौधे लगाए, जिससे यह एक parrot farm बन गया और अब रोजाना लगभग 500 तोते यहाँ अपना आहार ले पाते हैं।

ओडिशा के बाड़गढ़ जिले में स्थित इम्पीरियल कॉलेज, नौ एकड़ के क्षेत्र में फैला है। कॉलेज परिसर चारों तरफ खेतों और प्राकृतिक खूबसूरती से घिरा हुआ है। कॉलेज तथा इसके आसपास की हरियाली ही, इस जगह को पक्षियों तथा बायोडायवर्सिटी के लिए अनुकूल बनाती है। साल 2019 में जब कॉलेज के डायरेक्टर 45 वर्षीय दीपक गोयल, कॉलेज परिसर के पिछले हिस्से में टहल रहे थे, तब उन्होंने जो देखा, उसने उनकी परेशानी बढ़ा दी। दरअसल उन्होंने देखा कि कॉलेज परिसर की सीमाओं से सटे खेतों में किसान, वहाँ मौजूद कुछ तोतों को अपने खेतों से भगाने की कोशिश कर रहे थे। दीपक ने देखा कि तोते मकई की फसलों को ऐसे खा रहे हैं, मानों वे बहुत भूखे हों। उन्हें इस बात से बहुत बेचैनी हुई कि तोतों को उनका आहार नहीं मिल पा रहा है। तब उन्होंने इस समस्या का समाधान ढूंढने का फैसला किया। प्रकृति के प्रति योगदान देने की उनकी इच्छा से उन्हें कुछ करने की प्रेरणा मिली। उन्होंने कॉलेज परिसर की लगभग आधा एकड़ जमीन पर सूरजमुखी के पौधे लगाए, जिससे यह एक parrot farm बन गया और अब रोजाना लगभग 500 तोते यहाँ अपना आहार ले पाते हैं।

पक्षियों के लिए बनाया बागान

parrot farm
Plantation at the backyard of campus

पक्षियों के आहार के लिए बागान बनाने के बारे में दीपक कहते हैं, “मैंने पक्षियों को खिलाने के लिए, कॉलेज परिसर में मौजूद खाली जगह का उपयोग करने का फैसला किया। इसलिए, हमने परिसर के सामने एक जगह की पहचान की, जहाँ हमने मकई उगाने की कोशिश की।”

हालांकि, उस जगह में छात्रों की चहल-पहल और वाहनों की आवाजाही से तोते और अन्य पक्षी नहीं आते थे। यह सब देखकर दीपक ने कॉलेज परिसर के पिछले हिस्से में बागान (parrot farm) बनाने का फैसला किया। क्योंकि, वहाँ शोर-शराबा तथा लोगों का आना-जाना कम था।

वह कहते हैं, “हालांकि यह एक सुरक्षित जगह थी, लेकिन यहाँ की मिट्टी मकई उगाने के लिए उपयुक्त नहीं थी। इससे मेरे सामने एक और चुनौती खड़ी हो गई। इसलिए, मैंने तोतों के आहार के लिए कुछ वैकल्पिक फसलों पर शोध करना शुरू किया।”

कुछ शोध करने के बाद, दीपक को पता चला कि सूरजमुखी के बीज, तोतों के आहार के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं। साथ ही, इसके पौधे वहाँ की मिट्टी में आसानी से उगाये जा सकते हैं। इसके बाद, उन्होंने कुछ कर्मचारियों की मदद से आधा एकड़ जमीन में सूरजमुखी के पौधे उगाने का फैसला किया। साल 2019 के बाद से कॉलेज परिसर के इस बागान (parrot farm) में आने वाले तोतों की संख्या 200 से लगभग 500 तक हो गई है।

दीपक बताते हैं, “इनकी गिनती रखना संभव नहीं है, लेकिन इन्हें झुंड में एक साथ उड़ते हुए देखकर लगता है कि इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। शाम को इन पक्षियों को एक साथ आकाश में अलग-अलग खूबसूरत पैटर्न में उड़ते हुए देखकर, इनकी बढ़ती संख्या का आसानी से पता चलता है।”

प्रकृति के साथ तालमेल

पक्षियों के ये खूबसूरत झुंड देखकर, कॉलेज के छात्र तथा कर्मचारी भी काफी खुश होते हैं और इस कदम को सराहाते हैं। कॉलेज के एक अधिकारी (सीनियर एग्जिक्यूटिव ऑपरेशंस) साहिल अग्रवाल कहते हैं, “सूरजमुखी के इस बागान (parrot farm) में सैकड़ों की तादाद में तोते आते हैं। यहाँ सभी पौधे जैविक तरीकों से लगाए गए हैं और फूलों पर किसी भी प्रकार के रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव नहीं किया जाता है। यहाँ छात्र अक्सर सुबह-शाम प्रकृति की छांव में, आराम से अपना समय बिताते और पक्षियों को उड़ते हुए देखते हैं।”

parrot farm
Parrot at the field

हालांकि, दीपक कहते हैं कि पक्षियों के लिए यह बागान (parrot farm) बनाना आसान नहीं था। उन्होंने बताया, “इसके लिए, हमारे कॉलेज में जरूरी संसाधन और जमीन तो थी, लेकिन श्रमिकों की मानसिकता को बदलना भी जरूरी था। शुरुआत में, वे तोतों का शिकार कर या पकड़ कर उन्हें बेचना चाहते थे। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि पक्षियों को सिर्फ खिलाने के लिए ही हम इतनी मेहनत क्यों करें, जिससे हमें कोई फायदा ही नहीं मिलेगा?’’

दीपक का कहना है कि श्रमिकों को मनाने तथा उन्हें प्रकृति के प्रति जागरूक करने के लिए काफी प्रयास करने पड़े।

दीपक ने बताया कि कॉलेज प्रशासन 2021 के अंत तक, सूरजमुखी के इस बागान (parrot farm) को आधा एकड़ से डेढ़ एकड़ तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। वह आगे कहते हैं, “हम गिलहरी तथा अन्य स्थानीय प्रजातियों के लिए भी, बायोडायवर्सिटी बढ़ाने की योजना पर विचार कर रहे हैं।”

उन्होंने अंत में कहा, “मनुष्य और प्रकृति को साथ-साथ रहना होगा। अपने निजी स्वार्थ के लिए, प्रकृति से समझौता नहीं किया जा सकता है। साथ ही, पक्षियों को उनका आहार देना, प्रकृति से जुड़े रहकर अपनी जड़ों को न भूलने का एक तरीका है।”

मूल लेख: हिमांशु नित्नावरे

संपादन- जी एन झा

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