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“मैंने Remdesivir के लिए रु. 12000 दिए, मुझे ठगा गया”, जाने आप कैसे रह सकते हैं सावधान

“मैंने Remdesivir के लिए रु. 12000 दिए, मुझे ठगा गया”, जाने आप कैसे रह सकते हैं सावधान

द बेटर इंडिया की एक स्टाफ मेम्बर संचारी पाल, अपने पिता के इलाज के लिए Remdesivir की खोज में थीं। इस दौरान, इंटरनेट पर किसी शख्स ने उन्हें नकली दवा देकर, उनसे 12 हजार रूपये ठग लिए। वर्तमान में, पश्चिम बंगाल में रह रहीं, संचारी उस घटना के बारे में विस्तार से बता रही हैं।

शिमला की रहने वाली संचारी पाल 22 अप्रैल की रात को एक ऐसे संकट में फंस गईं, जिससे आज लाखों भारतीय जूझ रहे हैं। दरअसल कोरोना महामारी के इस दौर में आज तकरीबन हर दूसरा व्यक्ति, चिकित्सीय सहायता लेने के लिए संघर्ष कर रहा है। साथ ही, इसके कारण बहुत से लोग ठगी का शिकार भी हो रहे हैं। संचारी को भी दवा की जरूरत थी। उनके 69 वर्षीय पिता, राजेंद्र प्रसाद पाल को डायबिटीज और हाइपरटेंशन है। इस वजह से उनकी परेशानी बढ़ने का खतरा ज्यादा था। निमोनिया होने से उनकी हालत बिगड़ने के कारण, कस्तूरबा गांधी अस्पताल, चितरंजन (पश्चिम बंगाल) के डॉक्टरों ने उन्हें कोविड-19 के इलाज के लिए Remdesivir दवा लेने के लिए कहा।

हालांकि, देशभर में अभी भी इस दवा की बेहद कमी है।

ऐसी स्थिति में, संचारी ने अपने पिता की तबियत के बारे में बताते हुए, अपने दोस्तों, परिवारजनों और सोशल मीडिया पर अनुरोध कर अजनबियों के माध्यम से भी इस दवा के लिए संपर्क साधने की कोशिश की। वह कहती हैं, “मेरे पिता की स्थिति को देखते हुए, डॉक्टरों ने मुझे दवा और ऑक्सीजन टैंक की व्यवस्था करने के लिए कहा। मैंने Remdesivir के लिए, उपलब्ध सभी हेल्पलाइन नंबरों और सभी संभव संसाधनों से मदद लेने की कोशिश की। लोगों से संपर्क करने के लिए, मैंने सोशल मीडिया पर अपना फ़ोन नंबर साझा करते हुए एक पोस्ट भी डाला। लेकिन, इसका कोई फायदा नहीं हुआ।”

संचारी ने बताया कि काफी प्रयासों के बाद, उन्हें उम्मीद की एक किरण नज़र आई। आजकल इंटरनेट पर ऐसे हजारों लोग मौजूद हैं, जो कोरोना मरीजों की मदद के लिए वाकई काम कर रहे हैं। फिर चाहे उन्हें प्लाज्मा दान करना हो, प्लाज्मा डोनर की व्यवस्था करनी हो या बेड्स, ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाइयों आदि की व्यवस्था करनी हो। बस इसी तरह, संचारी को भी उनकी मदद करने के लिए बहुत से अजनबियों के कॉल्स आने शुरू हो गए। उन कॉल्स में, वे लोग यह दावा कर रहे थे कि उनके पास Remdesivir का स्टॉक है।

लेकिन, उन्हें कहाँ पता था कि उनके साथ कोई ठगी भी हो सकती है।

उन्होंने मेरी मज़बूरी का फायदा उठाया

वह कहती हैं, “जब मुझे ऐसे कॉल्स आने लगे, तो मेरी उम्मीदें बढ़ीं। लेकिन, मुझे थोड़ा शक भी हो रहा था, क्योंकि कई सप्लायर्स दवा देने से पहले, मुझसे पूरा पेमेंट मांग रहे थे। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। हालांकि, एक संभावित सप्लायर (lead) ने मुझे 24 हजार रुपये के बाजार मूल्य पर Remdesivir देने की पेशकश की। वह आगे कहती हैं, “कोलकाता के किसी राहुल नाम के एक शख्स ने मुझसे रेफ्रीजरेटेड Remdesivir की कुछ तस्वीरें साझा की। साथ ही, मुझे इसकी चार शीशियाँ देने का आश्वासन भी दिया।”

संचारी ने इसकी सच्चाई जानने के लिए दोबारा जांच करने की कोशिश की। जिसके लिए, उन्होंने उस शख्स से और अधिक तस्वीरें साझा करने तथा दवा खरीदने के तरीके के बारे में जानकारी मांगी। वह कहती हैं, “मैंने सावधानी बरतते हुए, राहुल से कहा कि मैं उन्हें एक बार में पूरे पैसे नहीं दूँगी। वह मेरे अनुरोध पर सहमत हो गया, लेकिन उसने मुझे पहले दवाई के आधे पैसे देने के लिए कहा। उसकी बातों से मुझे ऐसा लग रहा था कि वह वाकई एक अच्छा इंसान है और मेरे पिता की सलामती के लिए, मदद करना चाहता है। राहुल ने मुझसे कहा कि वह लोगों की मदद करना चाहता है और मुश्किल दौर से गुजर रहे लोगों के दर्द को समझता है।”

संचारी बताती हैं कि राहुल ने उन्हें Remdesivir से जुड़ी कई बातें बताई। जैसे- Remdesivir को 4 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान की जरूरत क्यों होती है, इसके रखरखाव का क्या तरीका है और इसके ट्रांसपोर्ट के लिए एक फ्लास्क की भी जरूरत होती है, आदि। वह बताती हैं, “राहुल ने मुझे व्हाट्सऐप पर एक तस्वीर भेजी कि कोलकाता से चितरंजन तक के तीन घंटे के सफ़र के लिए, फ्लास्क को कैसे ठंडा किया जायेगा। उसने कहा कि दवा जनशताब्दी एक्सप्रेस से दोपहर दो बजे रवाना होगी। साथ ही, उसने जनशताब्दी एक्सप्रेस के ट्रेन गार्ड की जानकारियां साझा करने का भी वादा किया, जिसे Remdesivir सौंपी जानी थी। इस तरह, संचारी ने 12 हजार रुपये का भुगतान तो कर दिया, लेकिन उन्हें संदेह होने लगा था।

वह कहती हैं, “राहुल ने मुझे दीपक कुमार नाम के एक अकाउंट होल्डर के अकाउंट में पैसे जमा करने को कहा। अपने पिता की तबियत को देखते हुए, मैंने ज्यादा कुछ सोचे बिना पैसे जमा कर दिए।

इधर, ट्रेन के रवाना होने के कुछ मिनट पहले से ही राहुल ने संचारी के कॉल्स का जवाब देना बंद कर दिया था और आखिरकार उन्होंने अपना फ़ोन ही स्विच ऑफ कर दिया, ताकि संचारी उनसे संपर्क ही न कर सके।

संचारी कहती हैं, “ये सब देखकर मुझे समझ आ गया था कि मेरे साथ ठगी हुई है। अपने पिता की देखभाल करने के साथ ही, मुझे संबंधित पुलिस थाने के साइबर क्राइम विभाग में शिकायत करनी थी।

संचारी अपने इस अनुभव से लोगों को सीखने के लिए आग्रह करती हैं। उन्हें आशंका है कि ऐसी ठगी के शिकार और भी सैंकड़ों लोग हो रहे होंगे। उन्होंने बताया, “मुझे आखिरी मिनट तक भी सब कुछ सही लग रहा था, उस शख्स ने मेरा विश्वास हासिल करने की भरपूर कोशिश की थी। पर,अब मुझे यह अहसास हो रहा है कि वह सिर्फ पैसों के लिए, मुझसे ये सारी बातें कर रहा था।

ऐसे अनैतिक लोग, जो Remdesivir और कई जरूरी संसाधनों के लिए बेहिसाब पैसे मांग कर ठगी कर रहे हैं, उनपर कड़ी निगाह रखें। जो व्यक्ति आपको Remdesivir उपलब्ध करवा रहा है, आप उनसे इनकी शीशियों की तस्वीरें जरूर मांगे। इसके साथ ही, इनके लेबल और पैकेजिंग को भी ध्यान से देखें।

उदाहरण के तौर पर, अगर आप नीचे दी गयीं तस्वीरों को गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि नकली Remdesivir के डिब्बे पर ’Rx’ का सिंबल नहीं है। इनमें कुछ व्याकरण संबंधी गलतियां होने के साथ-साथ, शब्दों को भी ठीक तरीके से नहीं छापा गया है। इसके अलावा, अगर आप ध्यान से देखें, तो आपको पता चलेगा कि दवा को बनाने (मैन्युफैक्चर) की जगह के नाम में भी कई गलतियां हैं। साथ ही, कुछ अक्षरों को कहीं बड़ा, तो कहीं छोटा छापा गया है। इन गलतियों से भी आप असली-नकली दवाओं की पहचान करके, खुद को ठगने से बचा सकते हैं।

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मूल लेख: हिमांशु नित्नावरे

संपादन- जी एन झा

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