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पद्म श्री से सम्मानित हुए, सातवीं पास मणिकफन, किये कई आविष्कार, 14 भाषाओं का है ज्ञान

पद्म श्री से सम्मानित हुए, सातवीं पास मणिकफन, किये कई आविष्कार, 14 भाषाओं का है ज्ञान

लक्षद्वीप के रहनेवाले अली मणिकफन सिर्फ सातवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की थी। लेकिन, इस साल उन्हें ‘ग्रासरूट्स इनोवेशन’ की श्रेणी में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। जानिए 14 भाषाएँ जानने वाले इस बिना डिग्री के विद्वान की अद्भुत कहानी!

वह साल 1981 था, जब मशहूर अभिनेत्री नरगिस दत्त ने अपनी आखिरी सांस ली थी। इसी साल, संयुक्त राज्य अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति के रूप में, रोनाल्ड रीगन ने शपथ ली थी और पुणे में Infosys कंपनी की स्थापना हुई थी। 

इस बीच, लक्षद्वीप के सबसे दक्षिणी द्वीप मिनिकॉय में ‘अली मणिकफन’ बड़ी शांति से, एक आयरिश नाविक टिम सेवरिन का इंतजार कर रहे थे। उनके हाथों में एक छोटी सी अटैची थी, जिसमें दो जोड़ी सफेद अरबी पोशाकें थी। वह ओमान की यात्रा के लिए पूरी तरह से तैयार थे।  

मणिकफन के लिए, उस साल का सबसे बड़ा काम होना अभी बाकी था। टिम ने उन्हें ‘सोहर जहाज’ बनाने का काम दिया था, जिसे उन्हें सिंदबाद के जहाज जैसा बनाना था। टिम ने एक बार उसमें यात्रा भी की थी। टिम का मिनिकॉय द्वीप पर स्वागत किया गया। मिनिकॉय को अपने नाविकों के लिए जाना जाता था। साथ ही, मध्ययुग में अरब जहाजों के निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली रस्सियों की आपूर्ति भी यहीं से की जाती थी।   

अगले कुछ दिन, दोनों ने साथ में नारियल की जटाएं इकट्ठा करने में बिताए। जिसे अच्छी गुणवत्ता वाले नारियल के भूसे से हाथ से रोल किया गया। मणिकफन ने आइनी की व्यवस्था की, जो एक प्रकार की लकड़ी है। इसका उपयोग बड़े पैमाने पर केरल की मशहूर ‘स्नेक बोट’ बनाने में होता है।  

टिम को अपने काम के लिए, एक सुपरवाइजर की जरूरत थी। तब सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) के एक समुद्री जीवविज्ञानी, डॉ संथप्पन जोन्स ने टिम को मणिकफन का नाम सुझाया था। टिम यह जान के चौंक गए कि उनके सुपरवाइजर ने स्कूली शिक्षा तक प्राप्त नहीं की है।   

padma shri

टिम अपनी किताब ‘द सिंदबाद वोएज’ (The Sindbad Voyage) में मणिकफन के बारे में बताते हैं, “मणिकफन लाखो में एक हैं। वह 14 भाषाएं बोल सकते हैं, तथा जिस विषय में उनकी रुचि होती है, वह उसमें और जानकारी हासिल करते हैं। जबसे मैंने उनके बारे में सोचना शुरु किया है, वह मेरे लिए ‘लाखों में एक व्यक्ति’ ही रहे हैं। वह अपनी सिफारिश पर खरे उतरे।”  वह अपनी इस किताब में मणिकफन की ‘गरिमा और क्षमताओं के प्रति सम्मान की भावना’ के बारे में बताते हैं।  

लकड़ी और नारियल की जटाओं जैसे पारंपरिक चीज़ों से 80 फुट लंबा और 22 फुट चौड़ा जहाज बनाने के लिए, मणिकफन और टिम 30 कारपेंटर के साथ मस्कट पहुंचे। मणिकफन, द बेटर इंडिया को बताते हैं, “हमने सालभर चौबीसों घंटे काम किया। हमने दस्ती आरी से लड़की के पट्टे को काटा और धातु की जगह, हमने लकड़ी का उपयोग किया। इस जहाज का नाम सोहर रखा गया, जो ओमान के एक शहर का नाम भी है। टिम ने उसपर ओमान से चीन तक 9,600 किलोमीटर की यात्रा की।” जहाज को अब ओमान के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है।  

सोहर जहाज

उनके जैसे गुणी और ज्ञानी व्यक्ति के बारे में, यह मानना मुश्किल है कि 82 वर्षीय मणिकफन, केरल के कोड़िकोड जिले के ओलवन्ना (Olavanna) में एक निजी और सरल जीवन बिता रहे हैं। यहाँ पहले उनके पूर्वज रहते थे। वह बिल्कुल आत्मनिर्भर हैं। वह अपने लिए भोजन उगाते हैं, मछली पालन करते हैं, नारियल के पेड़ उगाते हैं और सौर ऊर्जा से बिजली उत्पन्न करते हैं। 

अपने पड़ोसियों के लिए, वह उनके दादाजी के समान हैं। CMFRI से रिटायर होने के बाद, वह ओलवन्ना में अपने जीवन का आनंद ले रहे हैं। वास्तव में, उनके कई पड़ोसियों को समय उन्हें टीवी पर देखकर काफी हैरानी हुई, जब उन्हें इस साल जनवरी में, भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार, पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उन्हें ‘ग्रासरूट्स इनोवेशन’ की श्रेणी में सम्मानित किया गया था।    

मणिकफन, किसी सम्मान और अवार्ड की चाह नहीं रखते। उनका कहना है कि वह काफी संकोच महसूस करते थे, जब इतने सारे लोग उन्हें बधाई देने, उनके घर पर आते थे। कई बार वह अपनी पत्नी को उनके लिए आये, फ़ोन कॉल्स का जवाब देने के लिए कहते थे। वह सो रहे हैं या व्यस्त हैं, अपनी पत्नी को उन कॉलर्स से ऐसा बोलने के लिए कहते थे।

इस घटना के बारे में बात करते हुए वह कहते हैं, “मुझे गलत न समझें, मैं पुरस्कार प्राप्त करके सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। लेकिन, मुझे पहचान या लोकप्रियता पसंद नहीं है। मैं रेगिस्तान के एक फूल की तरह रहना पसंद करता हूँ, जो खिलता है और मुरझाता है।”  

विनम्र और मृदुभाषी स्वाभाव के मणिकफन ने अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे- जहाज निर्माण, समुद्री अनुसंधान, भूगोल, खगोल विज्ञान, मत्स्य पालन, कृषि और सस्टेनबिलिटी में कई उपलब्धियां हासिल की हैं। भले ही वह केवल सातवीं तक पढ़े हैं, लेकिन उन्हें भाषा का काफी ज्ञान हैं। वह अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, अरबी, लैटिन, फ्रेंच, रूसी, जर्मन, सिंहलीज, फारसी, संस्कृत, तमिल और उर्दू जैसी 14 भाषाएं बोल सकते हैं। 

हमने लक्षद्वीप द्वीपसमूह में भी, मणिकफन के अतीत के बारे में पता लगाया कि कैसे उन्होंने अपनी इच्छा से स्कूल छोड़ा और आगे चलकर इतने बड़े विद्वान बने।  

मैंने स्कूल जाना बंद किया, सीखना नहीं।’ 

मणिकफन के पिता कोर्ट में एक क्लर्क और दादा एक मछुआरे थे। काफी छोटी उम्र से ही, वह समुद्र और मछलियों की दुनिया से परिचित हो गये थे। वह अक्सर अपने दादा के साथ उनके काम पर जाते थे। वहीं उन्होंने मछली पकड़ने के बारे में सीखा। वह अपनी शिक्षा के लिए केरल के कन्नूर चले गए। यहाँ कुछ दिन शिक्षा लेने के बाद, वह वापस आ गए। वह कहते हैं, “अपनी स्कूलिंग के दौरान, मैंने औपचारिक शिक्षा को बहुत थियोरैटिकल (सैद्धांतिक) पाया। इसका मतलब, जहाँ पाठ पढ़ाया तो जाता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसका क्या और कैसे उपयोग किया जाये, इसका ज्ञान नहीं दिया जाता। मैं सोचता था कि ऐसी शिक्षा, मुझे जीवन कौशल सीखने में कैसे मदद करेगी? स्कूल की तुलना में, मैंने नौकायन से बहुत कुछ सीखा है।”  

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अपने दादा की मदद करने के साथ, वह लाइटहाउस और मौसम विभाग में भी निःशुल्क काम करते थे। यहाँ उन्होंने मौसम का आकलन करने के लिए, हाइड्रोजन के गुब्बारों को उड़ाना सीखा। उन्होंने खगोल विद्या (Star Gazing) सीखी। इस दौरान, उन्होंने कई नौकरियां भी बदली। एक शिक्षक से क्लर्क तक और आखिरकार 1960 में, रामेश्वरम में CMFRI में वह एक लैब बॉय के रूप में नियुक्त हुए।  

CMFRI में, उन्होंने मछली पकड़ने के बारे में बहुत जानकारी हासिल की। इस केंद्र के कई अधिकारी यह देखकर बहुत प्रभावित हुए कि वह 400 प्रकार की विभिन्न मछलियों को, कितनी आसानी से पहचान पा रहे थे। वह कहते हैं, “मेरे दादाजी ने मुझे सिखाया कि रंग, पंख और कांटों के आधार पर मछलियों की पहचान कैसे करें। डॉ. जोन्स ने मेरी प्रतिभा को देखा और मुझे काम पर रख लिया। मैंने मछली की कई दुर्लभ प्रजातियों को पकड़ा है। एक विशेष पहचान के रूप में, विभाग ने मेरे नाम पर एक मछली का नाम भी रखा है – अबुडेफडफ मणिकफनी।”  

ओमान से लौटने के बाद, उन्होंने अपनी इच्छा से रिटायरमेंट ले ली और तमिलनाडु के वेडलई (Vedalai) चले गए। वहां उन्होंने एक गैरेज में काम करना शुरू किया, जहां उन्होंने एक बार एक कार इंजन को खोला। यहीं से, उनके पहले आविष्कार की शुरुआत हुई। उन्होंने 1982 में, बैटरी से चलने वाली एक रोलर साइकिल बनाई और अपने बेटे के साथ दिल्ली की यात्रा की। 

उन्होंने टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में भी काम किया, तथा 15 एकड़ की बंजर पड़ी भूमि को, एक छोटे से जंगल में बदल दिया। वेडलई में, उन्होंने पारंपरिक वस्तुओं का उपयोग करके अपना घर बनाया और बिजली पैदा करने के लिए पवन चक्कियां लगाईं। साल 2011 में, वह ओलवन्ना आ गए।  

पिछले छह दशकों में, मणिकफन ने कई यात्राएँ की और अलग-अलग जगहों में भी रहे। वह कहते हैं कि यह ही उनका स्कूल रहा है। उनके विश्वास के सबसे बड़े साक्षी उनके चार बच्चे हैं, जिन्होंने अपने पिता की ही तरह, कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ली। उन्होंने आगे बताया, “मेरा बेटा नौसेना में है और मेरी सभी बेटियां शिक्षक हैं।”   

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वह कहते हैं, “बेशक मैंने स्कूल छोड़ा, लेकिन सीखना कभी नहीं छोड़ा। प्रकृति आपको आत्मनिर्भर होना सीखा देती है और एक तरह से, लोग भी शिक्षक ही होते हैं। अगर आप लोगों को ध्यान से सुने, तो उनसे आपको बहुत कुछ सीखने को मिलता है।” 

उनके जीवन पर माज़िद अझिकोड द्वारा बनाई गयी एक डॉक्यूमेंट्री, आप यहाँ देख सकते हैं।

मूल लेख: गोपी करेलिया

संपादन – प्रीति महावर

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प्रीति टौंक

मूल रूप से झारखंड के धनबाद से आनेवाली, प्रीति ने 'माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी' से पत्रकारिता में मास्टर्स किया है। ऑल इंडिया रेडियो और डीडी न्यूज़ से अपने करियर की शुरुआत करने वाली प्रीति को, लेखन के साथ-साथ नयी-नयी जगहों पर घूमने और अपनी चार साल की बेटी के लिए बेकिंग करने का भी शौक है।
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