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दिल्ली: नौकरी छोड़ बन गए किसान, बने 5000 परिवारों के फैमिली फार्मर

दिल्ली के रहने वाले मृणाल और लक्ष्य डबास ‘ऑर्गनिक एकड़’ के जरिए 5000 परिवारों तक ताज़ी जैविक सब्ज़ियां पहुंचा रहे हैं।

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खूब पढ़ाई लिखाई करने के बाद, अगर कोई खेती से जुड़ना चाहे, तो बहुत-से लोगों को यह बात अटपटी लगती है। क्योंकि, नौकरी को छोड़कर खेती में आने को लोग आज भी घाटे का सौदा कहते हैं। लेकिन, दिल्ली के जट खोर गाँव में रहने वाले 30 वर्षीय मृणाल डबास और उनके भाई, 27 वर्षीय लक्ष्य डबास ने यह साबित किया है कि अगर सही तरीकों से खेती की जाए तो यह मुनाफे का सौदा ही है।  

एक किसान परिवार से आने वाले मृणाल और लक्ष्य ने बचपन से किसानी देखी है। लेकिन, कभी सोचा नहीं था कि वे दोनों खेती को अपना व्यवसाय बनाएंगे। मृणाल ने इंजीनियरिंग की है और DRDO में बतौर रिसर्च इंटर्न काम भी किया। वहीं, लक्ष्य ने एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट में मास्टर्स डिग्री की है। लेकिन, आज वे दोनों ही जैविक खेती करते हुए ‘एग्रो-टूरिज्म’ के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। 

द बेटर इंडिया से बात करते हुए, उन्होंने बताया कि उनके पास कुल 28 एकड़ जमीन है। इस जमीन पर वह जैविक फल, साग-सब्जियों से लेकर चावल, गेहूं, बाजरा, दलहन जैसी फसलें भी उगाते हैं। लेकिन उन्होंने अपनी खेती का मॉडल कुछ ऐसा बनाया है कि उन्हें साल भर अपने खेतों से उपज मिलती रहती है। साथ ही, उन्होंने अपने खेतों पर एग्रो-टूरिज्म भी शुरू किया है। 

आप उनके खेतों पर अपने परिवार या दोस्तों के साथ ट्रिप बुक कर सकते हैं। इस ट्रिप के दौरान आपको प्रकृति को न सिर्फ करीब से देखने का मौका मिलेगा, बल्कि आप वहीं पर जैविक तरीकों से उगे हुए खाने का भी लुत्फ़ उठा सकते हैं। इसके अलावा, वे लोगों के लिए जैविक खेती और इसके संबंधित विषयों पर वर्कशॉप भी करते हैं। 

Organic Farming Success Story
मृणाल और लक्ष्य डबास

साधारण खेतों को बना दिया ‘ऑर्गेनिक एकड़

लक्ष्य कहते हैं, “वैसे तो मेरे परिवार में अधिकांश लोग नौकरी-पेशे वाले हैं। लेकिन, इन सबके बावजूद खेती से सभी जुड़े हुए हैं। पहले हम सब केवल अपने परिवार के लिए ही फसल उगाते थे। लेकिन जब से हम दोनों भाईयों ने खेती की कमान संभाली है, अब हम बाजार के लिए भी उपज तैयार करने लगे हैं।”

लक्ष्य और मृणाल ने खुद को जैविक खेती की तरफ मोड़ लिया है। उनके खेत को आज ‘ऑर्गेनिक एकड़’ के नाम से जाना जाता है। उनकी उपज दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में 5000 से ज्यादा परिवारों तक पहुँच रही है। लोग उनके खेत पर आकर सब्जियां और अन्य चीजें खरीदकर लेकर जाते हैं। साथ ही, उनका एक ऑनलाइन पोर्टल भी है। 

लक्ष्य ज्यादातर खेती से संबंधित चीजें संभालते हैं और मृणाल मार्केटिंग देखते हैं। मृणाल कहते हैं, “जब तक किसान अपनी उपज की मार्केटिंग की जिम्मेदारी खुद नहीं लेंगे, वे आगे नहीं बढ़ पाएंगे। इसलिए, एक तरफ हमने अपने खेती के तरीकों पर ध्यान दिया, तो दूसरी तरफ मार्किट में अपनी पहचान बनाने पर भी काम किया। इसमें परिवार का पूरा सहयोग मिला है।” 

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उनके खेत

लक्ष्य कहते हैं कि वे जैविक खेती के अलग-अलग तरीकों को फॉलो करते हैं। सबसे पहले तो उनके यहाँ जितनी भी मौसमी सब्जियां उगती हैं, उन्हें एक व्यवस्थित ढंग से लगाया जाता है।

“जैसे भिंडी के सीजन में हम अलग-अलग क्यारियों में लगभग 15-15 दिन के अंतराल पर भिंडी के कई बैच लगाते हैं। ताकि जब हार्वेस्ट मिलनी शुरू हो तो लम्बे समय तक हमारे पास भिंडी रहे। हम एक ही बार में उपज लेकर मंडी में बेचने वालों में से नहीं है। हमारी सब्जियां और अन्य उपज सीधा ग्राहकों को जाती है। इसके अलावा कुछ स्टोर्स को और कुछ होटलों को भी हम सप्लाई करते हैं,” उन्होंने आगे कहा। इसी तरह, जमीन की उर्वरकता बनाए रखने के लिए भी वे विभिन्न तरीके अपनाते हैं। 

उन्होंने कहा कि किसी भी तरह का रसायन इस्तेमाल करने की बजाय, वह जैविक खाद और पोषण का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही, वे हमेशा ‘क्रॉप रोटेशन’ पर ध्यान देते हैं। जैसे अगर किसी खेत में उन्होंने ऐसी फसल लगाई है, जो ज्यादा नाइट्रोजन लेती है तो उसके साथ वे एक ऐसी फसल लगाते हैं, जो जमीन को नाइट्रोजन देती है। उदाहरण के लिए मक्का के साथ लोबिया और ग्वार की फली लगा सकते हैं। उनके खेतों में हर मौसम में 10 से 15 तरह की सब्जियां मौजूद होती हैं। सिर्फ सब्जियों की खेती से वह महीने में लगभग चार लाख रुपए कमा लेते हैं। 

सब्जियों के अलावा वह गेहूं, चावल, दाल, सरसों जैसी फसलें भी लगाते हैं। इन सभी फसलों को कटाई के बाद वह खुद अपने खेतों पर ही प्रोसेस करते हैं। मृणाल ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों पर ही दाल मिल लगाई हुई है। वे गेहूं से अलग-अलग तरह का आटा, दाल को प्रोसेस और पैक करते हैं और सरसों से तेल और खली बनाते हैं। इन सभी उत्पादों को वह सीधा ग्राहकों तक पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने कुछ पशु भी रखे हैं, जिनका गोबर खेतो में खाद के लिए इस्तेमाल होता है और इनके दूध से वे शुद्ध देसी घी तैयार करते हैं। 

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उनके खेतों से खरीदकर ले जाते हैं सब्जियां

शुरू किया एग्रो-टूरिज्म: 

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जैविक खेती के बाद, लक्ष्य और मृणाल ने अपनी खेती को एक कदम और बढ़ाते हुए एग्रो-टूरिज्म की शुरुआत की। कोई भी उनके खेतों के दौरे या फिर ‘फार्म स्टे’ के लिए बुकिंग कर सकता है। फार्म स्टे के दौरान लोगों को न सिर्फ प्रकृति के करीब रहने का मौका मिलता है, बल्कि वे लोगों के लिए कई तरह की गतिविधियां भी करते हैं। जैसे, खेतों से सब्जियां तोड़ना, योग करना और विचार-विमर्श करना आदि। जो भी यहां आता है, कुछ न कुछ सीखकर ही जाता है। 

‘ऑर्गनिक एकड़’ पर घूमने आने वाली नीपा वर्मा कहती हैं कि उनकी बेटी अभी काफी छोटी है और कोरोना महामारी के कारण उसकी दुनिया टीवी-फ़ोन तक ही सिमट गयी है। इसलिए वह उसे प्रकृति के करीब किसी जगह पर ले जाना चाहती थीं। 

उन्होंने कहा, “मैंने दिल्ली के आसपास ऐसी जगह तलाशी, तो ऑर्गनिक एकड़ के बारे में पता चला। सबसे अच्छी बात थी कि उनके यहां एक बार में सिर्फ दस ही लोग घूमने आ सकते थे। इसलिए सुरक्षा की भी समस्या नहीं थी। वहां जाकर मुझे और मेरी बेटी को बहुत सुकून मिला। खासकर कि मेरी बच्ची को दिल्ली जैसे शहर में इतनी हरियाली देखने को मिली। खेतों से लेकर उनके बनाये खाने तक, सभी कुछ बहुत अच्छा था।”

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उनके फार्म की एक झलक

यहां आने वाले लोग साग-सब्जियां और अन्य जैविक उत्पाद भी खरीदकर लेकर जाते हैं। गुरुग्राम की प्रतिमा अग्निहोत्री कहती हैं कि उनके यहां उगे फल-सब्जियों का स्वाद बाजार के अन्य फल- सब्जियों से बहुत अलग और अच्छा है। 

लक्ष्य आगे बताते हैं, “अगर कोई परिवार हमारे फार्म पर अपने बच्चों के साथ आना चाहता है तो उनके लिए भी तरह-तरह के गेम्स प्लान किए जाते हैं। लोगों के लिए ‘पॉटरी मेकिंग सेशन’ भी रखा हुआ है। जिसमें बच्चों से लेकर बड़े, सब लोग भाग ले सकते हैं। इसके लिए आपको हमारे वेबसाइट पर बुकिंग करनी होगी। अगर कोई जैविक खेती करना सीखना चाहते हैं तो उनके लिए हम ट्रेनिंग और वर्कशॉप भी करते हैं, जिनके लिए लोग एनरोल कर सकते हैं।”

आगे की योजना: 

लक्ष्य कहते हैं, “हमने शुरुआत में नुकसान भी झेला है लेकिन कुछ अलग करने की चाह थी और इसलिए हम कभी पीछे नहीं हटे। हम अपने खेतों में हर एक चीज पर दिन-रात मेहनत करते हैं। खेती से लेकर एग्रो टूरिज्म तक, हर जगह कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करता हूँ। इस काम में पैसे से ज्यादा मेहनत की जरूरत है क्योंकि खेती में कोई ‘वर्किंग टाइम’ नहीं होता है। आपको रात को भी काम करना पड़ सकता है तो कभी पूरा-पूरा दिन इसमें जा सकता है।”

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उनका स्टॉल

यह लक्ष्य और मृणाल की मेहनत का ही नतीजा है कि आज वे अपने खेतों से सालाना लगभग 70 लाख रुपए का टर्नओवर लेने में कामयाब हो पाए हैं। वे कहते हैं, “लोगों को यह एक नंबर दिखता है और उन्हें लगता है कि जैविक खेती में बहुत पैसा है। लेकिन ऐसा नहीं है। आपको खेती से पैसा कमाने के लिए खेती को बहुत बारीकी से समझना पड़ता है और बाजार की मांग के अनुसार अपने आप को ढालना पड़ता है। इसलिए सबसे पहले खेती के पीछे की मेहनत को समझिये और फिर इस क्षेत्र में आगे बढिये। क्योंकि अगर आपने ठान लिया है और आप सीखने को तैयार हैं तो इससे अच्छा और कुछ नहीं।” 

उन्होंने अब तक 100 से ज्यादा किसानों को ट्रेनिंग दी है और आगे भी वह इस प्रक्रिया को जारी रखना चाहते हैं। इसके अलावा, उनकी योजना है कि वह अपने खेतों में ‘बायोगैस प्लांट’ लगाएं और साथ ही, वे अपने मोबाइल एप्लीकेशन पर भी काम कर रहे हैं ताकि वे किसानों और ग्राहकों से सीधा जुड़ सकें। 

ऑर्गेनिक एकड़ से फल-सब्जियां या अन्य खाद्य उत्पाद ऑर्डर करने के लिए या अन्य किसी जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें। 

संपादन- जी एन झा

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