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मुंबई: 5 साल की लम्बी लड़ाई के बाद प्रिंसिपल ने दिलवाई यौन उत्पीड़न के दोषी शिक्षक को सजा!

प्रतीकात्मक तस्वीर/विकिमीडिया कॉमन्स

पोस्को (POSCO) अधिनियम के अनुसार, द बेटर इंडिया स्कूल, पीड़ितों या प्रिंसिपल के नाम प्रकट नहीं कर सकता है। यह लेख प्रिंसिपल द्वारा द बेटर इंडिया को दिए गए साक्षात्कार पर आधारित है।

प्रैल 2013 में, 10वीं कक्षा पास करने वाली तीन लड़कियां अपनी फेयरवेल पार्टी के बाद उनके केबिन में गयी। उन लड़कियों ने अपनी 48 वर्षीय प्रिंसिपल का आभार व्यक्त किया और कहा कि वे उनका बहुत सम्मान करती हैं क्योंकि उनके नेतृत्व में स्कूल बहुत बदल गया है।

हालांकि, प्रिंसिपल को नहीं पता था कि उनकी यह छोटी-सी बातचीत उनके आने वाले समय को निर्धारित करने वाली थी। उन लड़कियों ने कहा, “इस स्कूल में सब कुछ अच्छा है, लेकिन एक बात है जो आपके कानों तक शायद कभी नहीं पहुँच पायेगी। हम तो जा रहे हैं, लेकिन सिर्फ आप ही बाकी स्टूडेंट्स को बचा सकती हैं।”

लड़कियों के संकेत से अनजान प्रिंसिपल ने उन्हें बिना डरे सब कुछ साफ़-साफ़ बताने के लिए कहा। लड़कियों ने बताया कि कैसे उनका अलजेब्रा पढ़ाने वाला टीचर उनका यौन उत्पीड़न करता है। यह इधर-उधर छूने से शुरू होकर अश्लील वीडियो क्लिप भेजने की सीमा तक चला गया।

“उन्होंने मुझे बताया, कैसे कक्षा में, वह उनकी बगल में बैठकर, अपने हाथों को उनकी जांघों पर रखता है। अपनी बाहों को उनके कंधे पर रखकर उनके स्तनों को छूना। एक पल के लिए मैं यह सब सुनकर डर गयी थी।”

उन्होंने लड़कियों को यह सब आरोप लिखने और अपने माता-पिता को भेजने के लिए कहा। लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित लड़कियों ने इंकार कर दिया। साथ ही उन्होंने प्रिंसिपल को भी यह बात किसी को न कहने के लिए कहा। जब प्रिंसिपल ने उनसे पूछा कि इस बारे में उन्हें अपनी क्लास टीचर को बताना चाहिए था। तो लड़कियों ने कहा कि इस बारे में उनकी क्लास टीचर के साथ-साथ वाईस-प्रिंसिपल (दोनों महिलाएं हैं) को भी पता है। लेकिन उन्होंने उल्टा लड़कियों को ही डांटा और कहा कि वे इस तरह के “घृणास्पद” व्यवहार का आरोप एक पुरुष शिक्षक पर कैसे लगा सकती हैं।

प्रिंसिपल के लिए विश्वास करना मुश्किल था, क्योंकि 2008 में उनके स्कूल ज्वाइन करने के बाद उस क्लास टीचर ने उनकी बहुत मदद की थी। उनके लिए इस स्थिति को बहुत ही संवेदनशीलता से संभालना जरूरी हो गया था। क्योंकि उन्हें शिक्षक व छात्र दोनों के ही हितों को देखना था। पर उन्होंने उस क्लास टीचर से बात करने का फैसला किया।

पर प्रिंसिपल के मुताबिक यह उनकी सबसे बड़ी गलती थी।

“जब उसने मुझे उन छात्राओं के नाम बताने के लिए कहा, जिन्होंने मुझे इस बारे में बताया है, तो मैंने मना कर दिया। लेकिन फिर भी मेरे केबिन के बाहर खड़े होने वाले चपरासी से उसे उन छात्राओं के नाम पता चल गए। उसी रात 9:10 बजे, मुझे लड़कियों में से एक से फोन आया, जिन्होंने मुझे इस बारे में बताया था।”

‘मैंने आप का सम्मान और विश्वास किया, मैडम। पर आपने मेरे लिए सब कुछ बर्बाद कर दिया। मैं आपसे नफ़रत करती हूँ।’ उसकी सिसकियों भरी आवाज मुझे आज भी याद है। मुझे उस लड़की ने बताया कि क्लास टीचर ने उनके यहां लैंडलाइन पर फ़ोन किया था, जिसे उसकी माँ ने उठाया। उस टीचर ने लड़की के चरित्र के बारे में उल्टा-सीधा कहा। जब तक उच्च न्यायलय का फैसला नहीं आया, उस लड़की ने मुझसे बात नहीं की। उस समय मुझे एहसास हुआ कि जब तक मेरे पास ठोस सबूत नहीं होगा तब तक कोई मेरा साथ नहीं देगा। लेकिन यह तो बस शुरुआत भर थी… पांच साल लम्बे संघर्ष की।”

जैसे ही  स्कूल का नया सत्र शुरू हुआ, एक और कक्षा के शिक्षक ने प्रिंसिपल को इस तरह की घटना के बारे में बताया। उसने कहा कि कुछ छात्राओं ने शिकायत की थी, और मामला वीपी तक ले जाया गया था, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।

प्रिंसिपल ने वीपी से बात की और कहा कि उस शिक्षक को चेतावनी दी जानी चाहिए। लेकिन उसका व्यवहार नहीं बदला।

दिसंबर 2013 तक, 39 से अधिक छात्राओं ने शिक्षक के खिलाफ इसी तरह की शिकायतें की। इस बार, प्रिंसिपल ने सुनिश्चित किया कि इन शिकायतों को दर्ज किया जाये। अब चुप नहीं बैठा जा सकता था।

प्रतीकात्मक तस्वीर

वह सभी दस्तावेजों के साथ डीएन नगर पुलिस स्टेशन गयीं, जहां पुलिस ने पांच घंटे से अधिक समय तक दस्तावेजों की जांच की।

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“एक चाइल्ड या वुमन फ्रेंडली पुलिस स्टेशन मिथक है,” प्रिंसिपल ने द बेटर इंडिया को बताया। मैं उस जगह पर अकेली थी। मैं अपने पूरे जीवन में ऐसी किसी चीज के लिए कभी पुलिस स्टेशन नहीं गयी थी। मैं डरी हुई और थकी हुई थी। छात्राओं की शिकायतों को पढ़ने के बावजूद, उन्होंने पूछा, ‘कैसे हाथ लगाया, कहाँ हाथ लगाया, किस तरह से किया।’ मैंने उनसे सभी दस्तावेज पढ़ने को कहा और आगे की कार्यवाई के लिए सलाह मांगी। ऐसा लगता था कि पीड़ितों के मुकाबले इन पुलिस स्टेशनों में अपराधी ज्यादा सुरक्षित हैं।”

“एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू करने में उन्हें पांच घंटे लग गए। उन्होंने मुझसे सभी मूल प्रतियां ले लीं। लेकिन मैंने सुनिश्चित किया कि मैंने सभी की फोटोकॉपी ली है और एक रसीद ली जहां उन्होंने कवर लेटर पर हस्ताक्षर किए थे। उनमें से एक ने मुझे बताया, ‘अभी आपको भी नौकरी से हाथ धोना पडेगा, मैडम’।”

जब इस मामले के तहत स्कूल में जांच-पड़ताल शुरू हुई तो प्रबंधन ने यह कहने की कोशिश की, कि प्रिंसिपल ने उन्हें सतर्क नहीं किया था। लेकिन उनके सभी दावों को प्रिंसिपल ने ख़ारिज किया और कहा, “जिस दिन एफआईआर दर्ज कराई गयी उसी दिन मैंने एक प्रतिलिपि और फोटोकॉपी दस्तावेज लिया और स्कूल में सीईओ को सौंप दिया।”

जिस दिन उन्होंने प्राथमिकी दर्ज की, उसी दिन से उनकी यातना शुरू हो गयी थी। प्रिंसिपल ने पोस्को अधिनियम के तहत एक पुलिस शिकायत दायर की थी। लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि इसका असर उनकी नौकरी पर पड़ेगा और उन्हें स्कूल से निकाल दिया जायेगा।

स्कूल प्रबंधन जिसने स्कूल के बंद होने के लिए प्रिंसिपल को जिम्मेवार ठहराया, उनके खिलाफ हो गया और साथ ही, दोषी शिक्षक का समर्थन करना शुरू कर दिया।

14 जुलाई, 2014 को प्रिंसिपल को उनकी नौकरी से निकाला गया। उसी वर्ष नवंबर में उस शिक्षक को एक आंतरिक जांच के बाद निर्दोष करार दिया गया।

उन्होंने प्रिंसिपल पर शिक्षक के बारे में झूठ फैलाने का आरोप लगाया। और जब लोग सोच रहे थे कि अब हारने के बाद वो लड़ाई छोड़ देंगी, तब वो और हिम्मत से आगे बढ़ीं और हार मानने से इंकार कर दिया।

जुलाई 2014 से उनकी बाकी सैलरी भी स्कूल ने नहीं दी। अब हर दिन उनके लिए संघर्ष था। लेकिन ऐसे में उनके पूर्व छात्रों ने उनकी यथा संभव मदद की। जब वह सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ रही थी, तो उन्होंने गुरुद्वारों, चर्चों और दोस्तों के घरों में रहकर दिन काटें क्योंकि वे होटल में नहीं रह सकती थी।

एनजीओ मास इंडिया ने प्रिंसिपल को अपना समर्थन दिया। एनजीओ के मुंबई अध्यक्ष शिबू जॉर्ज ने बताया कि उन्होंने इस मामले की 43 सुनवाइयों में भाग लिया था।

जब से यह मामला शुरू हुआ तब से ही स्कूल ट्रिब्यूनल के साथ-साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि प्रिंसिपल की बर्खास्तगी गलत थी। हालांकि, इस मामले में प्रभावशाली फैसला साल 2017 में सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप के बाद आया। कोर्ट ने स्कूल को प्रिंसिपल की सैलरी तुरंत देने का आदेश दिया।

“जब मैंने हाईकोर्ट में केस जीता, तो वही लड़की जिसने मुझसे बात करने से इनकार कर दिया था उसने मुझे फेसबुक पर मैसेज भेजा। मुझे बहुत खुशी हुई, ‘मैडम, आपने जो भी परेशानी सही उनके लिए मैं आपका सम्मान करती हूँ। मैं कभी नहीं भूलूंगी आपको।”

जब उन्हें उनकी नौकरी वापिस मिली तो उनका उनकी छात्राओं के लिए न्याय पाने का संघर्ष फिर से शुरू हुआ। 13 अगस्त, 2018 को एक विशेष पीओसीएसओ अदालत ने उस शिक्षक को तीन साल की सख्त कारावास की सजा सुनाई।

शिक्षक के खिलाफ दायर की गई एफआइआर में तीन लड़कियों का उल्लेख किया गया था, जिनका यौन उत्पीड़न करने का दोषी शिक्षक को पाया गया था। इसका आधार सीआरपीसी की धारा 164 के तहत उन तीन छात्राओं का बयान था। उनके सहपाठियों के बयानों द्वारा इसे समर्थित किया गया, जिन्होंने बताया कि वे अपनी बेंच पर पानी डालकर, अपने बैग अपने पैरों पर रखती थीं ताकि वह शिक्षक उनकी बगल में न बैठे।

यौन उत्पीड़न के लिए पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 12 के तहत अदालत ने उसे दोषी ठहराया था। लेकिन यौन शोषण, और किसी आपराधिक धमकी के लिए “दोषी नहीं” पाया। शिक्षक को इन तीन छात्राओं को 25-25 हज़ार रूपये देने का आदेश मिला।

दोषी होने के बावजूद वह आदमी अभी जमानत पर है। उसके पास इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में जाने का भी विकल्प है।

इन सबके बीच, प्रिंसिपल ने रौशनी की राह चुनी। उन्होंने कहा, “मेरे छात्र अब स्वतंत्र रूप से रह सकते हैं। मुझे खुशी है कि उन्हें न्याय मिला। मुझे हर रोज मानसिक रूप से यातना दी गई थी। उन्होंने पैसे की ताकत, शारीरिक ताकत, और सबकुछ इस्तेमाल किया यह साबित करने के लिए कि मैं गलत हूँ। लेकिन मेरे हौंसले और आत्मविश्वास ने मुझे सब कुछ सहन करने की शक्ति दी। और आज सब कुछ सही है।”

मूल लेख: जोविटा अरान्हा

संपादन – मानबी कटोच


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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