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दिल्ली: बेकार पड़े डिब्बों में उगाएं 40+ फल-सब्जियां, पूरे परिवार के लिए है काफी

दिल्ली: बेकार पड़े डिब्बों में उगाएं 40+ फल-सब्जियां, पूरे परिवार के लिए है काफी

दिल्ली की आइरिन गुप्ता, घर में बेकार पड़े डिब्बों में 40 से भी ज़्यादा फल और सब्जियां उगाती हैं।

2014 में, जब आइरिन गुप्ता ने अपने घर को एक अपार्टमेंट के रूप में बदला, तो उन्होंने छत के एक हिस्से में एक छोटा सा बगीचा बनाने का फैसला किया। पर यह छोटा सा बगीचा एक दिन एक जैविक खेत (Terrace Organic farming) में बदल जायेगा, इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।

वह बताती हैं, “पहले हमारे पुराने घर के चारों ओर काफी जगह थी, जहां हमने तरह-तरह के पौधे लगाए हुए थे। मेरी माँ को गार्डनिंग का काफी शौक है। इसलिए मैं नहीं चाहती थी कि जगह की कमी के कारण, वह पेड़ पौधों से दूर हो जाएं।”

उन्होंने टेराकोटा के गमलों में कुछ मौसमी फूल जैसे- संध्या मालती और डहेलिया लगाकर शुरुआत की। कुछ ही हफ्तों में उनके बगीचे में फूल खिलना भी शुरू हो गए। पहले, जहाँ उनके छत पर टेराकोटा के कुछ ही गमले थे। वहीं, आज उनकी छत पर प्लास्टिक क्रेट, थर्माकॉल के डिब्बे, पेंट की बाल्टियां, पानी की टंकी जैसे कई कंटेनर भरे पड़े हैं, जिनमें 40 से अधिक प्रकार की सब्जियां और फल लगे हैं। 

द बेटर इंडिया से बात करते हुए, उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने कम जगह में, एक सुंदर सा बगीचा बनाया है। 

terrace Organic Farming

ब्लॉग और टीवी शो से सीखी गार्डनिंग

अपने नए घर में, वह अपनी माँ और एक सहायक के साथ रहती हैं। इस घर की छत दो हज़ार वर्ग फीट की है। शुरुआत में, उन्होंने अपनी छत पर 10 तरह के ही पौधे लगाए थे, जिनमें एलोवेरा, पोनीटेल पाम, मनी प्लांट और कुछ मौसमी फूल, जैसे कि संध्या मालती, गुलदाउदी आदि शामिल थे।  

वह कहती हैं,  “इन पौधों को मेरी माँ ने हमारे पुराने घर में लगाया था। हमने उन्हें जैविक पॉटिंग मिक्स के साथ टेराकोटा के गमलों में डाल दिया और छत पर रख दिया। कुछ महीनों के भीतर, उनमे फूलों का उगना भी शुरू हो गया। मैं अपने बगीचे में और अधिक पौधे लगाना चाहती थी। लेकिन, मैं इस बात से भी परेशान थी कि इन पौधों के भार से छत कमजोर न हो जाये।” 

पौधों की गुणवत्ता बरकरार रखते हुए, उन्होंने इन्टरनेट की मदद से कम वजन वाले गमलों के बारे में जानकारी लेना शुरू किया। 

शुरुआत में, उन्हें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कई गार्डनिंग ब्लॉग पढ़ने को मिले। उन्होंने पाया कि विदेशी ब्लॉग में ज्यादातर जानकारियां और टिप्स, उनकी जलवायु और परिस्थितियों पर आधारित थी। हालाँकि, आइरिन ने कुछ भारतीय ब्लॉग भी पढ़ें। गार्डनिंग से जुड़ी बातों की ज्यादा जानकारी के लिए, वह नियमित रूप से मलयाली टेलीविजन शो ‘किसान केरल’ भी देखती थीं। हालांकि, उन्हें यह भाषा समझ नहीं आती थी, लेकिन वह कोशिश करती रही कि उन्हें इस बारे में सटीक जानकारी मिलती रहे। इस शो से उन्होंने कोकोपीट और नारियल की भूसी आदि में पौधे उगाना और कम्पोस्टिंग के बारे में सीखा। 

आख़िरकार, उन्होंने अपनी छत पर गमलों के भार को कम करने के लिए एक समाधान खोज निकाला। कई अमेरिकी ब्लॉग में उन्होंने देखा कि वे लकड़ी के क्रेट या टोकरे में सब्जियां और फल उगाते हैं। आइरिन ने इस तरीके को आज़माने के बारे में सोचा। वह बताती हैं, “मुझे घर में लकड़ी के क्रेट तो नहीं मिले, लेकिन मैंने यह प्रयोग फल-सब्जियां रखने वाली प्लास्टिक की क्रेट पर किया। इन क्रेट के छेद को बंद करने तथा मिट्टी बाहर न निकले, इसके लिए मैंने पुराने पर्दों का इस्तेमाल किया। मैंने उनमें फूलगोभी के पौधे लगाए, जिसका परिणाम काफी अच्छा निकला। 

terrace Organic Farming

पौधों को उगाने के लिए बेकार डिब्बों का इस्तेमाल 

इसके बाद, आइरिन ने और अधिक कंटेनर खरीदे। इनमें उन्होंने कुछ सब्जियां जैसे- टमाटर, बैंगन, गोभी, लौकी तथा अमरूद, अनानास, नींबू और स्ट्रॉबेरी जैसे फल उगाने शुरू किये। वह कहती हैं कि वह मौसम के आधार पर सब्जियां उगाती हैं।

वह घर में बेकार पड़े पेंट के डिब्बों और प्लास्टिक के क्रेट का इस्तेमाल, हरे पत्तेदार पौधे जैसे पुदीना, धनिया, तुलसी, करी पत्ता, गिलोय आदि उगाने के लिए करती हैं। उन्होंने पौधे उगाने के लिए कुछ थर्मोकॉल के डिब्बों, प्रिंटर इंक ड्रम तथा कुछ पुरानी बोरियों को भी रिसायकल किया।   

सब्जियों के लिए बड़े बेड बनाने के लिए, उन्होंने सोसाइटी में पड़े एक वॉटर टैंक को रिसायकल किया। 500 लीटर के इस टैंक को उन्होंने दो भागों में काटा। फिर, इन दोनों के तलों को सील कर, उनमें पॉटिंग मिक्स भर कर तैयार किया। इसमें उन्होंने अंगूर और मिट्टी के नीचे उगने वाली सब्जियां उगाईं।

वह बताती हैं “इसके अलावा, मैंने पत्तागोभी जैसी सब्जियों को बड़ी जगह में अच्छे से उगाने के लिए, छत पर एक ऊँची क्यारी भी बनवाई है।” 

पौधों में पोषण के लिए, वह रसोई से निकलने वाले गीले कचरे जैसे- इस्तेमाल के बाद बची चायपत्ती, प्याज के छिलके, अंडे का बाहरी भाग आदि से खाद बना कर मिट्टी में डालती हैं। साथ ही, वह नियमित रूप से वर्मीकम्पोस्ट और गाय के गोबर का भी उपयोग करती हैं। 

उन्होंने अपनी छत के 1100 वर्ग फीट जितने भाग को बगीचे में बदल दिया है। वह बताती हैं कि उनके परिवार की सब्जियों की आपूर्ति इसी बगीचे से हो जाती है। पिछली गर्मियों में उनके बगीचे में 40 किलो तोरई उगी थी। इसके अलावा, वह लौकी, करेला, चिचिंडा, खीरा, बरबटी और ग्वारफली आदि भी उगाती हैं। 

सर्दियों में, वह कई तरह के साग के अलावा ब्रोकली और गोभी से लेकर शलजम और गाजर तक उगाती हैं। उनके बागान में कई ऑर्नामेंटल पौधे भी लगे हुए हैं। आइरीन विभिन्न प्रकार की लिली उगाने में भी माहिर हैं। आपको उनके बगीचे में देसी लिली से लेकर, विदेशी किस्में जैसे- एशियाई लिली, बोगनविलिया, चमेली, सावनी, गुड़हल, पैशनफ्लावर और मॉर्निंग ग्लोरी के फूल देखने को मिल जाएंगे।

आइरिन कहती हैं कि जब वह अपनी छत पर खड़ी होकर, दूसरे घरों की खाली छतों को देखती हैं, तो उन्हें काफी दुःख होता हैं। उनका मानना है कि इन खाली पड़ी छतों का उपयोग, गार्डनिंग के लिए किया जाना चाहिये।  

अंत में वह कहती हैं, “मुझे पता है कि कई लोग छत में बगीचा बनाना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें छत के कमजोर होने के साथ सीपेज का भी डर होता है। वहीं, कुछ लोग गार्डन के रखरखाव को काफी महंगा समझते हैं।” वह मानती हैं कि लोगो के पास गार्डनिंग की सही जानकारी नहीं है। द बेटर इंडिया के माध्यम से अगर वह लोगों को गार्डनिंग के प्रति प्रोत्साहित कर सकीं, तो उन्हें बहुत ख़ुशी होगी। 

आइरिन से सुझाव लेने के लिए आप उन्हें irene.gupta@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

मूल लेख : रौशनी मुथुकुमार

संपादन – प्रीति महावर

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प्रीति टौंक

मूल रूप से झारखंड के धनबाद से आनेवाली, प्रीति ने 'माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी' से पत्रकारिता में मास्टर्स किया है। ऑल इंडिया रेडियो और डीडी न्यूज़ से अपने करियर की शुरुआत करने वाली प्रीति को, लेखन के साथ-साथ नयी-नयी जगहों पर घूमने और अपनी चार साल की बेटी के लिए बेकिंग करने का भी शौक है।
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