ऑफर सिर्फ पाठकों के लिए: पाएं रू. 200 की अतिरिक्त छूट ' द बेटर होम ' पावरफुल नेचुरल क्लीनर्स पे।अभी खरीदें
X
टेरेस गार्डन के साथ ‘कंपोस्टिंग फैक्ट्री’ भी, खुद बनाती हैं लगभग 60 किलो जैविक खाद

टेरेस गार्डन के साथ ‘कंपोस्टिंग फैक्ट्री’ भी, खुद बनाती हैं लगभग 60 किलो जैविक खाद

बेंगलुरु के जयनगर में रहने वाली, मीना कृष्णामूर्ति, छत पर बागवानी करने के साथ, जैविक खाद भी बनाती हैं। इनसे आप कम्पोस्टिंग की ट्रेर्निंग भी ले सकते हैं।

बेंगलुरु के जयनगर में रहने वाली 58 वर्षीया मीना कृष्णामूर्ति, पिछले आठ सालों से अपनी छत पर बागवानी कर रही हैं। लगभग 1400 वर्ग फ़ीट के अपने बगीचे में वह सब तरह की मौसमी सब्जियां, फल और फूल लगाने की कोशिश करती हैं। मीना कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि उन्हें बाजार से कुछ खरीदना नहीं पड़ता। वह आलू और प्याज जैसी सब्जियां बाजार से ही खरीदती हैं। लेकिन जो भी सब्जियां वह अपने बगीचे में लगाती हैं, उनकी उपज उन्हें भरपूर मिलती है। इतनी ज्यादा कि अक्सर वह दूसरों को भी ये सब्जियां बांटती हैं। 

मीना की बागवानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह सिर्फ बागवानी ही नहीं बल्कि ‘कंपोस्टिंग’ पर भी फोकस करती हैं। वह अपने बगीचे के लिए हर तरह की खाद और पोषक तत्व खुद तैयार करती हैं। जैसे- केंचुआ खाद, सूखे पत्तों की खाद, जीवामृत, घनजीवामृत और पंचगव्य आदि। खुद खाद बनाने और बागवानी करने के साथ-साथ, वह दूसरों को बागवानी सिखाती भी हैं। 

आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए की डिग्री हासिल करने वाली, मीना और उनके पति हमेशा से अपना काम करना चाहते थे। इसलिए, कुछ समय तक कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करने के बाद, उन्होंने अपनी ‘कॉर्पोरेट ट्रेनिंग और कंसल्टेंसी फर्म’ शुरू की। मीना बताती हैं, “साल 1993 में हमने अपना काम शुरू किया था। मैं तब ट्रेनिंग संभालती थी। लेकिन 2005 में, जब हमने एक बेटी गोद ली तो हमारी जिंदगी में काफी बदलाव आया। वह हमारी जिंदगी में बहुत सारी खुशियां लेकर आई। इसलिए, हम भी उसे हर चीज बेहतर से बेहतर देना चाहते थे। इसलिए, मैंने काम से थोड़ा ब्रेक लिया और अपनी बेटी पर ध्यान देने लगी।” 

उसी दौरान, मीना ने बागवानी की भी शुरुआत की। वह कहती हैं कि उन्होंने दो बार बागवानी करने की कोशिश की लेकिन, किसी न किसी वजह से असफल रहीं। इसके बाद, घर-परिवार और काम की जिम्मेदारियां बढ़ी तो वह नियमित रूप से बागवानी पर ध्यान नहीं दे सकीं। लेकिन लगभग आठ साल पहले, उन्होंने एक बार फिर अपनी छत पर पेड़-पौधे लगाना शुरू किया। इस बार, वह बागवानी को लेकर काफी ज्यादा उत्साहित और नियमित थीं। इसलिए, उनकी मेहनत भी रंग लाई। 

Bengaluru Woman Making Compost

बागवानी के साथ कंपोस्टिंग भी: 

उनकी छत पर आज 200 से भी ज्यादा किस्म के पेड़-पौधे लगे हैं, जिनमें कुछ फल, मौसमी सब्जियां और फूलों के पौधे शामिल हैं। वह कहती हैं, “फलों की बात करें तो मेरे यहां पैशन फ्रूट, अनार और अमरुद जैसे पेड़ हैं। वहीं सब्जियों में लौकी, करेला, कद्दू, पेठा, टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च, बैंगन, पुदीना, हल्दी, अदरक, फलियां, मोरिंगा, मटर, धनिया, मूली, पालक, खीरा, कुंदरू, तोरई आदि शामिल हैं। पहले मैं काफी विदेशी किस्में भी लगाती थी लेकिन, मेरे परिवार को वे किस्में पसंद नहीं आती थीं। इसलिए, अब मैं देसी फल-फूल और सब्जियां ही लगाती हूँ।” 

मीना कहती हैं कि जब सब्जियों की हार्वेस्टिंग का मौसम होता है तो इतनी ज्यादा सब्जियां आती हैं कि उन्हें कुछ सब्जियां दूसरों को बांटनी पड़ती हैं। लेकिन, उनका कहना है कि दूसरों को अपने घर की उगी सब्जियां खिलाना भी उन्हें बहुत संतोष देता है। वह अपने घर में काम करने वाली घरेलू सहायिका (मेड) और उनके यहां सड़कों की साफ-सफाई के लिए आने वाली सफाई कर्मचारी को भी सब्जियां देती रहती हैं। उन्होंने बताया, “कभी-कभी एक ही बार में पांच-छह लौकी की उपज मिलती है तो कभी तीन-चार किलो बीन्स का उत्पादन मिलता है। जो हमारे घर के लिए बहुत ज्यादा है इसलिए, मैं हमेशा अपने आस-पड़ोस में सब्जियां दे देती हूँ।”

Bengaluru Woman Making Compost

पेड़-पौधे उगाने के लिए, उन्होंने अपनी छत पर सीमेंट से कुछ क्यारियां बनवाई हैं। इसके साथ ही, उन्होंने 20 लीटर की क्षमता के 200 कंटेनर्स में भी पेड़-पौधे लगाए हुए हैं। मीना कहती हैं कि उनका पूरा परिवार, किसी न किसी तरह से बागवानी में उनकी मदद करता रहता है। 

वह बागवानी के साथ-साथ, ‘कंपोस्टिंग’ पर भी ख़ासा ध्यान देती हैं। वह खुद अपने गार्डन के लिए खाद तैयार करती हैं। वह अपने घर की लगभग 200 वर्ग फ़ीट जगह को सिर्फ कंपोस्टिंग के लिए इस्तेमाल करती हैं। उनका कहना है कि वह हर 15 दिन में 50 से 60 किलो जैविक खाद तैयार करती हैं, जो उनके गार्डन के लिए पर्याप्त रहती है। इसलिए, शायद उनके घर को ‘कंपोस्ट फैक्ट्री’ भी कहा जाता है। 

गीले कचरे और सूखे पत्तों से बनाती हैं खाद:

मीना कहती हैं कि उनके घर से इतना गीला कचरा नहीं निकलता कि उनके पूरे बगीचे के लिए पर्याप्त हो जाए। इसलिए, वह सब्जी बाजार से भी गीला कचरा जैसे- खराब फल-सब्जियां, छिलके आदि इकट्ठा करती हैं। उन्होंने बताया, “इस काम में मेरे पति मेरी मदद करते हैं। वह सब्जी बाजार से गीला कचरा इकट्ठा करके लाते हैं, जिसका इस्तेमाल हम खाद बनाने के लिए करते हैं। इसके अलावा, हमारे घर में काम करने वाली घरेलू सहायिका भी, अलग-अलग जगहों से गीला कचरा इकट्ठा करके हमें देती है।” 

सूखे पत्तों की खाद के बारे में बात करते हुए मीना कहती हैं, “सूखे पत्तों की खाद पौधों के लिए काफी अच्छी होती है। अगर आपके पास सूखे पत्तों की खाद है तो आपको कोकोपीट इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है। मैंने अपने अपार्टमेंट में सबसे कहा हुआ है कि वे अपने घरों में गिरने वाले सभी सूखे पत्ते मुझे दे सकते हैं। हमारी सोसाइटी में आने वाले सफाई कर्मचारी भी, सूखे पत्तों को जलाने की बजाय अब मुझे दे जाते हैं। इसके बदले मैं उन्हें कुछ पैसे और सब्जियां देती हूँ। जिससे उन्हें भी ख़ुशी मिलती है।” 

Bengaluru Woman making compost

मीना को अलग-अलग स्त्रोतों से सूखे पत्तों के लगभग 70 बैग मिलते हैं, जिनसे वह खाद बनाती हैं और अपने पौधों के लिए इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा, वह नींबू, संतरे और मौसमी जैसे फलों के छिलकों से बायोएंजाइम बनाती हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कभी कॉर्पोरेट ट्रेनिंग देने वाली मीना, अब लोगों को ‘होम-कम्पोस्टिंग’ की ट्रेनिंग दे रही हैं। वह बेंगलुरु के कई गार्डनिंग ग्रुप्स से जुड़ी हुई हैं और इन ग्रुप्स के सदस्यों के लिए, वह समय-समय पर कंपोस्टिंग वर्कशॉप करती हैं। 

शुरू किया ‘ग्रो टरमेरिक जॉयफुली’ अभियान: 

उन्होंने पिछले साल फरवरी में 60 से ज्यादा बागवानी प्रेमियों के साथ मिलकर, खुद हल्दी उगाने और इसका जैविक पाउडर बनाने का अभियान भी शुरू किया था। वह बताती हैं कि खुद अपना हल्दी पाउडर बनाने की प्रेरणा, उन्हें अपनी माँ से मिली। जो अब से दो साल पहले तक, उन्हें जैविक हल्दी पाउडर भेज रही थीं। उन्होंने आगे कहा, “पहले मेरी माँ मुझे हल्दी पाउडर भेजती थी, जो जैविक और किसी भी तरह के रसायन से मुक्त होता था। लेकिन उनकी बढ़ती उम्र को देखकर, मुझे लगा कि क्यों न मैं अब माँ को हल्दी पाउडर भेजा करूँ! यही सोचकर मैंने लगभग दो साल पहले अपने यहां हल्दी लगाई और मुझे लगभग 51 किलो हल्दी की उपज मिली। इससे जो पाउडर बना, वह मैंने माँ को भेजा और कुछ अपने घर में इस्तेमाल किया। तब से ही मैं खुद हल्दी उगाकर पाउडर बना रही हूँ।” 

Growing Turmeric

मीना की मेहनत को देखकर उनकी माँ ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें दूसरे लोगों को भी यह सिखाना चाहिए। इसलिए पिछले साल, उन्होंने कुछ लोगों को अपने साथ जोड़ा और फिर सबने, अपने-अपने घरों पर साथ में हल्दी लगाई। मीना कहती हैं कि बीच-बीच में वह सभी के साथ वर्कशॉप भी करती थीं और सभी लोग एक-दूसरे से सीखते थे। उनका यह अभियान सफल रहा और इस साल 180 लोग उनके साथ हल्दी उगा रहे हैं।

उनके इस अभियान से जुड़े हुए वीजे बन्नी बताते हैं, “पहले दिन से ही मीना जी बहुत अच्छे से हम सबको सिखा रही हैं। उनके मार्गदर्शन में न सिर्फ हल्दी उगाना बल्कि खुद खाद बनाना सीखा है। सबसे अच्छी बात है कि हमारे घर में जो भी चीजें उपलब्ध हैं, उन्हीं से हम खाद और पोषण बनाकर हम जैविक हल्दी उगा पा रहे हैं।

गार्डनिंग और कंपोस्टिंग के अपने अनुभव को मीना फेसबुक, व्हाट्सऐप और अब यूट्यूब के जरिए लोगों तक पहुंचा रही हैं। 

Turmeric Powder

वह कहती हैं कि उनकी बेटी, उनकी वीडियो बनाने में मदद करती है और लगभग तीन महीने पहले, उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल भी शुरू किया है। बागवानी की शुरुआत करने वाले लोगों के लिए, मीना सलाह देती हैं कि सबसे पहले उन्हें इस बात पर गौर करना चाहिए कि अपने घर में गार्डनिंग करने में, उन्हें क्या-क्या दिक्क़ते आ सकती हैं? जैसे- उनके यहां जगह कितनी है, धूप कितनी देर आती है, वे कितने गमले अपने यहां रख सकते हैं? क्योंकि, अगर आप फ्लैट में रहते हैं तो आपको उसी के हिसाब से शुरुआत करनी होगी। 

उन्होंने अंत में कहा, “लोगों के बड़े गार्डन देखकर, हम सबकुछ एक साथ करने की सोचते हैं। लेकिन, सही तरीका यही है कि आप छोटी चीजों से शुरू करें जैसे- पुदीना, तुलसी और माइक्रो ग्रीन्स आदि। यह भी देखें कि आप कहीं बहुत ज्यादा पैसे तो गार्डनिंग पर खर्च नहीं कर रहे हैं? कम लागत में, सही काम करने की कोशिश करें और फेसबुक तथा व्हाट्सऐप पर, गार्डनिंग ग्रुप्स से जुड़ें ताकि आपको प्रेरणा मिलती रहे।” 

हैपी गार्डनिंग। 

संपादन – प्रीति महावर

यह भी पढ़ें: कचरे से खाद बनाकर, हर महीने 90 किलो सब्जियां उगाती है, मुंबई की यह सोसाइटी

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें।

निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
Let’s be friends :)
सब्सक्राइब करिए और पाइए ये मुफ्त उपहार
  • देश भर से जुड़ी अच्छी ख़बरें सीधे आपके ईमेल में
  • देश में हो रहे अच्छे बदलावों की खबर सबसे पहले आप तक पहुंचेगी
  • जुड़िए उन हज़ारों भारतीयों से, जो रख रहे हैं बदलाव की नींव