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Haryana Nursery Farmer

राख, रेत और खाद के मिश्रण में लगाते हैं सब्जियों की नर्सरी, इटली तक जाते हैं पौधे

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में दादलू गाँव के रहने वाले हरबीर सिंह एक प्रगतिशील किसान हैं और अपने खेतों में एक हाई-टेक नर्सरी चला रहे हैं। अपनी नर्सरी में वह सब्जियों की पौध तैयार करते हैं, जो आज इटली तक भी पहुँच रहे हैं।

हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले में दादलू गाँव के रहने वाले 45 वर्षीय हरबीर सिंह, एक प्रगतिशील किसान हैं और अपने खेतों में एक हाई-टेक नर्सरी चला रहे हैं। अपनी नर्सरी में वह सब्जियों की पौध तैयार करते हैं, जो आज न सिर्फ आसपास के राज्यों बल्कि इटली तक भी पहुँच रहे हैं। 16 एकड़ में फैली अपनी नर्सरी से हरबीर सिंह, आज अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। लीक से हटकर कृषि क्षेत्र में अपने प्रयासों के लिए, उन्हें ‘एनजी रंगा राष्ट्रीय किसान पुरस्कार’ और ‘हरियाणा नर्सरी रतन अवॉर्ड’ जैसे सम्मानों से भी नवाजा गया है। 

द बेटर इंडिया से बात करते हुए हरबीर सिंह ने अपने सफर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स करने के बावजूद, उन्होंने खेती की राह चुनी। क्योंकि, वह एक किसान परिवार से आते हैं। उनका उद्देश्य, कृषि में ही कुछ अलग और बेहतर करने का था। उनके यहां पहले सामान्य खेती होती थी और उसी के साथ उन्होंने मधुमक्खी पालन करने पर विचार किया। उन्होंने पहले इसकी ट्रेनिंग ली और फिर मात्र छह ‘बी बॉक्स’ से अपना काम शुरू किया। उन्होंने बताया, “हमारे यहां हिमाचल प्रदेश से किसान अपनी मधुमक्खियों को लेकर आते थे। उनसे मैंने मधुमक्खी पालन सीखा। उन्होंने ही मुझे बी बॉक्स भी दिए। शुरूआत में, अपने परिवार की जरूरत के लिए मैं शहद बना लेता था। लेकिन फिर शहद की मांग बढ़ने से, मैं 70 बी बॉक्स में मधुमक्खी पालन करने लगा।” 

वह कहते हैं कि मधुमक्खी पालन के साथ-साथ, वह परंपरागत खेती भी कर रहे थे और वहां उन्हें किसी भी तरह का कोई फायदा नहीं हो रहा था। इसलिए, वह हमेशा अपने खेतों में प्रयोग करते रहते थे। उन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन में उन्हें मुनाफा हो रहा था। लेकिन, इस काम में आपको हर मौसम में मधुमक्खियों के साथ घूमना पड़ता है। लेकिन, हरबीर सिंह के लिए एक समय के बाद, यात्रा करना मुश्किल हो गया। क्योंकि, उनके माता-पिता की तबियत काफी खराब रहने लगी थी। इसलिए, उन्होंने सोचा कि मधुमक्खी पालन के अलावा वह और क्या कर सकते हैं? 

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हरबीर सिंह

शुरू की नर्सरी: 

साल 2005 से उन्होंने अपने यहां नर्सरी की शुरुआत की। हालांकि, शुरुआत में उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अलग-अलग जगहों पर नर्सरी का दौरा किया और देखा कि कैसे लोग नर्सरी का सेट-अप करते हैं। उन्होंने अपने यहां पॉलीहाउस, ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंक्लर जैसे साधन भी अपनाए। वह कहते हैं, “धीरे-धीरे फायदा तो हो रहा था लेकिन मैं संतुष्ट नहीं था। इसलिए, मैं नर्सरी के लिए इस्तेमाल होने वाली अलग-अलग तकनीकों को पढ़ता और सीखता रहता था। जब भी कुछ नया मिलता तो अपने यहां प्रयोग करता था। मुझे अपनी नर्सरी में एक अच्छा सिस्टम तैयार करने में कई साल लग गए।” 

हरबीर सिंह की नर्सरी आज पूरे देश में मशहूर है। पिछले आठ सालों से उनसे टमाटर के पौधे खरीदने वाले 40 वर्षीय किसान हरजिंदर सैनी कहते हैं, “किसानों के लिए हरबीर जी की नर्सरी से अच्छा कुछ नहीं हो सकता है। पहले हम खुद सब्जियों के पौधे तैयार करते थे। लेकिन, हमारे ज्यादातर पौधे खराब हो जाते थे और जो बच जाते थे, उन्हें जब हम खेत में लगाते तो वे भी अच्छे नतीजे नहीं देते थे। फिर हमें नर्सरी जाकर ही और पौधे खरीदने पड़ते थे। खर्चा भी ज्यादा हो रहा था और फसल लगाने में हमें देरी भी हो जाती थी। लेकिन जब से हम हरबीर जी से पौधे ले रहे हैं, ये सभी परेशानियां खत्म हो गयी हैं।” 

हरजिंदर उनकी नर्सरी से 40 हजार से ज्यादा टमाटर के पौधे खरीदते हैं। वह कहते हैं कि उनके गाँव में ‘हरबीर नर्सरी फार्म’ से दो लाख से ज्यादा पौधे आते हैं। उन्होंने आगे कहा, “हरबीर जी के यहां हम लगातार जाते रहते हैं। उनकी नर्सरी एकदम हाई-टेक है और वह किसानों को हमेशा अच्छे से अच्छा ही देने की कोशिश करते हैं। यहां तक कि कई बार सब्जियों की किस्मों को लेकर भी वह हमारा मार्गदर्शन करते हैं। उनके कहने पर हमने ट्रायल के लिए कई बार अलग-अलग किस्म के टमाटर लगाए हैं और हमें अच्छे नतीजे मिले हैं।”  

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उनकी नर्सरी में आये किसान

पौधों के लिए तैयार किया खास ‘मीडियम’:

अन्य तकनीकों के साथ-साथ, हरबीर सिंह ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि वह पौधों को किस तरह की मिट्टी और कंटेनर में तैयार करेंगे। वह पौधे तैयार करने के लिए पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल नहीं करते हैं बल्कि एक खास तरह के कपड़े का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह, उन्होंने कई प्रयोग करके एक खास और सफल ‘ग्रोइंग मीडियम’ मतलब ‘पॉटिंग मिक्स’ बनाया है। 

वह बताते हैं कि इस मीडियम ने ही उन्हें मशहूर किया है। इसमें तीन चीजें हैं- धान की भूसी की राख, नदी की रेत (जिसे वह मारकंडा नदी से लाते हैं) और गोबर से बनी खाद। वह कहते हैं कि गोबर की खाद भी वह अलग तरह से तैयार करते हैं। सबसे पहले गोबर को बायोगैस प्लांट में डाला जाता है। इसमें से जो ‘घोल’ निकलता है, उसे सुखाया जाता है और फिर ‘रोटावेटर’ में पीसा जाता है। पीसने के बाद, इस खाद को छननी से छाना जाता है। जिससे खाद तैयार होती है। इन तीनों चीजों को वह हर एक फसल के हिसाब से, अलग-अलग अनुपात में मिलाकर इस्तेमाल करते हैं। 

इस मीडियम से वह बीज लगाने के लिए बेड तैयार करते हैं। बीज लगाने के बाद, इन्हें स्प्रिंक्लर से पानी दिया जाता है। अच्छे से पानी देने के बाद, इन बेड को प्लास्टिक या पॉलिथीन शीट से ढक दिया जाता है। ऐसा करने से नमी बनी रहती है और आपको फिर से सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है। जब बीज अंकुरित होने लगते हैं तो शीट को हटाकर पौधों के ऊपर टनल लगाई जाती हैं। वह कहते हैं, “टनल के साथ प्लास्टिक शीट नहीं लगानी चाहिए क्योंकि, इससे बहुत ज्यादा नमी रहती है और जब पौधे बढ़ने लगते हैं तो इस नमी से उनके तने कमजोर हो जाते हैं। इसलिए, हम प्लास्टिक शीट को हटा देते हैं ताकि पौधों के तने मजबूत रहें।” 

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पौधे उगाने के लिए तैयार किया ग्रोइंग मीडियम

वह कहते हैं कि जो मीडियम वह इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे एक बार सिंचाई के बाद डेढ़-दो महीनों तक पानी नहीं देना पड़ता है। वह पूरी तरह से जैविक तरीकों से पौधे उगाते हैं। खाद से किसी भी तरह के हानिकारक कीटों को दूर करने के लिए, वह ट्राईकोडर्मा जैसे जैविक उत्पादों का उपयोग करते हैं। हरबीर सिंह टमाटर, शिमला मिर्च, बैंगन, हरी मिर्च जैसी फसलों के पौधे तैयार करते हैं। 

विदेश तक जा रहे हैं पौधे: 

हरबीर सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक एकड़ से भी कम जमीन पर नर्सरी का काम शुरू किया था और आज उनकी नर्सरी लगभग 16 एकड़ में फैली हुई है। कुछ समय पहले ही उन्होंने नर्सरी के लिए एक और तकनीक विकसित की है। जिसका नाम है- ‘जर्मनेटर चैम्बर’। इसकी खासियत है कि इसमें बीज बहुत जल्दी अंकुरित होते हैं। इसके लिए उन्होंने एक खास तरह की प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल किया है। बाहर की तरफ जो शीट लगाई गयी है, वह काले रंग की है और अंदर की तरफ सिल्वर रंग की शीट लगाकर चैम्बर बनाया गया है।

इस चैम्बर के अंदर बीजों की जरूरत के अनुकूल तापमान बनाया जाता है, जिससे से वे जल्दी अंकुरित होते हैं। बीजों के अंकुरित होने के बाद पौधों को दूसरे ‘ग्रीन चैम्बर’ में रखा जाता है। इस तकनीक से उन्होंने अब तक लगभग 13 लाख पौधे तैयार किए हैं। उनके पौधे न सिर्फ दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्यों बल्कि इटली तक भी पहुँच रहे हैं। विदेशों से भी किसान उनकी नर्सरी को देखने आते हैं।

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विदेशों से आते हैं किसान

उनसे शिमला मिर्च और बैंगन जैसी फसलों के पौधे लेने वाले 30 वर्षीय किसान रणजोत सिंह कहते हैं कि हरबीर सिंह के यहां सिर्फ नर्सरी नहीं है बल्कि उन्होंने अपना एक लैब का सेटअप भी तैयार किया हुआ है। जहां वह हमेशा कुछ न कुछ प्रयोग करते रहते हैं। रणजोत उनकी नर्सरी से एक लाख से ज्यादा पौधे खरीदते हैं और उनका कहना है, “हरबीर जी पहले ही पौधों को इतने अच्छे से तैयार करते हैं कि किसानों को बाद में कोई रसायन डालने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। हम जैविक तरीकों से अपना खेत तैयार करते हैं और उनसे पौधे लाकर लगा देते हैं। हमारा अलग से कोई ज्यादा खर्च भी नहीं आता है।”

नर्सरी से ही आज उनकी सालाना कमाई लाखों में है। वह दूसरे किसानों को अच्छे पौधे देकर, उन्हें भी सफलता की राह पर आगे बढ़ा रहे हैं। हरबीर सिंह का कहना है, “किसानों को अब नए-नए तरीके सीखने और अपनाने की जरूरत है। अगर कोई नर्सरी में जाना चाहता है तो सबसे पहले अच्छे से ट्रेनिंग करे और फिर काम शुरू करे। इसी तरह, दूसरे किसान प्रोसेसिंग जैसी चीजे करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं। सिर्फ सामान्य खेती करते रहने से सफलता नहीं मिलेगी। कृषि समुद्र की तरह है, इसमें आप जितना तैरेंगे, उतना ही आगे बढ़ेंगे।” 

अगर आप नर्सरी का काम करना चाहते हैं और मुफ्त ट्रेनिंग लेना चाहते है तो हरबीर सिंह को 9813159427 पर कॉल कर सकते हैं।

संपादन – प्रीति महावर

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