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Fully Automated Farm

खेत आते हैं, फिल्म देखते हैं, एक बटन दबाकर करते हैं खेती और कमाई लाखों में

बिहार के समस्तीपुर निवासी किसान, सुधांशु कुमार 200 एकड़ में खेती करते है, जहाँ 35 एकड़ खेत, पूरी तरह से ऑटोमेटेड हैं। उन्होंने अपनी 60 एकड़ जमीन पर, 28 हजार फलों के पेड़ उगाएं हैं। सुधांशु की सालाना कमाई 80 लाख रुपये है।

बिहार के समस्तीपुर जिले में रहने वाले किसान सुधांशु कुमार की दिनचर्या, कुछ ऐसी है कि वह हर दिन अपने Fully Automated Farm में आते हैं, शेड में अपनी बाइक पार्क करते हैं और वहां बने एक कंट्रोल रूम में बैठते हैं। कुछ देर बाद, वह दिन में कोई फिल्म देखने के लिए, किसी एक फिल्म को चुनते हैं। इसके बाद, वह अपनी कुर्सी पर लगे एक पैनल के बगल वाला बटन दबाते है। बटन दबाते ही उनके फलों के बागों पर सिंचाई और फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस बीच वह आराम से बैठ कर पूरी फिल्म का मज़ा लेते हैं। फिल्म पूरी होने तक, उनके 35 एकड़ के बाग पर सिंचाई भी पूरी हो जाती है। सुधांशु अपने सामानों को इकट्ठा करते है, सिस्टम बंद करते हैं और घर वापस चले जाते हैं।

अब सुधांशु को खेतों की कम निगरानी और कम श्रमिकों की ज़रूरत होती है। वह खेती के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग कर रहे हैं। खेती के माध्यम से वह लाखों की कमाई कर, गुणवत्ता से भरपूर उत्पादन भी कर रहे हैं। अपने 60 एकड़ के खेत में, उन्होंने आम, केला, अमरूद, जामुन, लीची, ब्राजील के मौसम्बी और ड्रैगन फ्रूट/ कमलम के 28 हजार पेड़ उगाए हैं। जिससे उन्हें सालाना 80 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त होता है।

सुधांशु ने 1990 से खेती करना शुरु किया था। उन्होंने उपज और आर्थिक लाभ बढ़ाने के लिए, हमेशा ही वैज्ञानिक तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया है।

उन्होंने कहा कि यह सब सालों पहले शुरू हुआ था। जब उन्होंने केरल के मुन्नार में ‘टाटा टी गार्डन’ में एक असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी के ऑफर को ठुकरा दिया और खेती करने के लिए घर लौट आए। 58 वर्षीय सुधांशु कहते हैं, “मेरे दादा और पिता किसान थे और मैं परंपरा को जारी रखना चाहता था। लेकिन मेरे पिता चाहते थे कि मैं सिविल सर्विसेज में जाऊं। मेरे बहुत आग्रह करने के बाद, पिता ने बेमन से मुझे उनकी पांच एकड़ की बेकार पड़ी जमीन पर खेती करने की अनुमति दी। “

टेक्नोलॉजी और खेती

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दरअसल, सुधांशु के पिता के लिए यह बेकार पड़ी जमीन सुधांशु को देना, उनका टेस्ट लेने का एक तरीका था। वह देखना चाहते थे कि क्या वह वास्तव में ऐसे जगह की देखभाल कर सकते है, जिसमें जंगली पौधे अधिक थे। सुधांशु बताते हैं, “मैंने पूसा में ‘डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय’ में वैज्ञानिकों से सलाह ली कि टेक्नोलॉजी के ज़रिए, खेत को फिर से जीवंत कैसे किया जा सकता है। एक साल की कड़ी मेहनत और 25 हजार रुपये खर्च करने के बाद, मैंने 1.35 लाख रुपये कमाए। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। क्योंकि, उस जमीन से हमने कभी भी 15 हजार रुपये से अधिक नहीं कमाए थे।”

इस आय के साथ, सुधांशु ने सबसे पहले एक ट्रैक्टर माउंटेड स्प्रेयर खरीदा। जिसकी कीमत 40 हजार रुपये थी। यहाँ से, उनका ऑटोमेशन और टेक्नोलॉजी की मदद से खेती करने का सफ़र शुरू हुआ। आज उसी पांच एकड़ जमीन से, वह प्रति वर्ष 13 लाख रुपये कमाते हैं।

वर्तमान में, सुधांशु के पास 200 एकड़ खेत है, जिसमें से 60 एकड़ पर माइक्रो-इरिगेशन से काम करते हैं। वहीं, 35 एकड़ जमीन पूरी तरह से ऑटोमेटेड है। शेष भूमि पर मक्का, गेहूं और मसूर की फसलें उगाई जाती हैं। वह कहते हैं, “टेक्नोलॉजी और खेती के उपकरणों ने मुझे बेहतर गुणवत्ता और फसलों की मात्रा बढ़ाने में मदद की। यह सिलसिला वर्षों से जारी है, जो किसी भी किसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।” सुधांशु ने आगे बताया कि उन्होंने फल उगाने पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करने का सोचा। जिससे उन्होंने पारंपरिक फसलों की तुलना में, तीन गुना ज़्यादा आय अर्जित की।

अपने दादा और पिता के बाद, सुधांशु ने खेती करना शुरु किया। लेकिन, उन्होंने खेती के लिए टेक्नोलॉजी को चुना। विस्तार से बात करते हुए वह कहते हैं कि कंट्रोल रूम, सिंचाई और कृषि गतिविधियों की निगरानी के लिए एक जंक्शन के रूप में कार्य करता है। वह कहते हैं, “बगीचे में ड्रिप इरीगेशन मशीन और माइक्रो-स्प्रिन्क्लर्स लगे हुए हैं। कंट्रोल रूम में लगे टैंक, ड्रिप के माध्यम से खेत में खाद और कीटनाशक सप्लाई करते हैं। कंट्रोल रूम से दिया गया इनपुट, यह तय करता है कि पौधों को कब सींचना है। साथ ही, कंट्रोलर मिश्रण तैयार करने के लिए खाद और अन्य एडिटिव की मात्रा भी चुन सकता है। उदाहरण के लिए, मैं इन तकनीकों की मदद से हर चौथे दिन खेतों में सात ग्राम खाद डालता हूं। इस तरह, यह सिस्टम प्रोग्राम कार्य करता है।”

सुधांशु बताते हैं कि माइक्रो स्प्रिन्क्लर, बगीचों में माइक्रो क्लाइमेट बनाने में मदद करते हैं। माइक्रो क्लाइमेट का अर्थ है, पृथ्वी की सतह पर किसी लघु क्षेत्र में पाई जाने वाली जलवायु, जैसे- किसी वन क्षेत्र या इलाके की जलवायु। वह कहते हैं, “लीची को अपने आसपास एक निश्चित मात्रा में, ह्यूमिडिटी यानी आर्द्रता और तापमान बनाये रखने की जरूरत होती है। माइक्रो स्प्रिन्क्लर उसे बनाये रखने में मदद करते हैं।”

यह फार्म एक वायरलेस ब्रॉडबैंड इंटरनेट नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, स्मार्टफोन या लैपटॉप के माध्यम से, सिंचाई प्रणाली की निगरानी की जा सकती है। खेतों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं, जिनके जरिए पेड़ों की गतिविधियों और स्वास्थ्य की निगरानी में मदद मिलती है।

मार्केटिंग नेटवर्क बनाना

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सुधांशु कहते हैं कि फल उगाना एक कठिन व्यवसाय है। क्योंकि, उनके खराब होने या सड़ने की संभावना ज़्यादा होती है। साथ ही, उनकी उपज भी बड़ी मात्रा में होती है। इसलिए, उनकी हार्वेस्टिंग और बाजार में ताजा बेचने के लिए, खरीददारों के मजबूत नेटवर्क की ज़रूरत होती है।

वह कहते हैं कि उत्पादकता बढ़ने के साथ, उन्होंने पूरे भारत में संभावित खरीदारों के साथ संपर्क बनाना शुरू कर दिया। साथ ही, यह सुनिश्चित किया कि फसल कटने के 24 घंटे के भीतर, फल डिलीवर कर दिए जाएं। वह कहते हैं, “2012 में, मैंने इलाहाबाद स्थित एक कैनिंग कंपनी के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट किया, जो लीची खरीदती है। आम का एक स्थिर स्थानीय बाजार है और मैंने प्रीमियम केले बेचने के लिए ‘केवेंटर्स’ के साथ करार किया है। मैं अपनी उपज मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, दिल्ली और दुबई में भी बेचता हूं। उन्होंने ऑनलाइन ऑर्डर लेने के लिए, उन्होंने ‘Orchards of Nayanagar’ नामक कंपनी भी शुरु की है।”

वह कहते हैं कि बाजार में कई सारे लिंक होने के कारण, उन्हें समय के साथ अधिक ग्राहक पाने में मदद मिली है। वह आगे बताते हैं, “हालांकि, कोल्ड चेन सुविधाओं की कमी है, जिन्हें सरकार द्वारा विकसित नहीं किया गया है। इस तरह के फार्म्स का बुनियादी ढांचा स्थापित करने के लिए भारी लागत लगती है। अगर सरकार सुविधा देती है तो यह किसानों को उनकी उपज को स्टोर करने, प्रोसेस करने और अच्छे रिटर्न कमाने में मदद करेगी।।”

उनकी उपलब्धियों को विभिन्न स्तरों पर पहचाना और सराहा गया। उन्हें 2010 में एक इनोवेटिव फार्मर अवार्ड, ‘जगजीवन राम अभिनव किसान पुरस्कार’ मिला। साथ ही, 2011 में ‘सोसाइटी फॉर डेवलप्मेंट ऑफ सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर’ से ‘बेस्ट मैंगो ग्रोअर अवार्ड’, ‘द बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ ऑफ माधवी-श्याम एजुकेशनल ट्रस्ट’ ऐंड ‘इंटरनैशनल कंसोर्टियम ऑफ कंटेम्पररी बायोलॉजिस्ट’ (MSET-ICCB) की ओर से रोल मॉडल अवार्ड और 2014 में महिन्द्रा समृद्धि इंडिया एग्री अवार्ड्स से सम्मानित किया गया है। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर, विभिन्न किसान निकायों का भी हिस्सा हैं।

मात्रा और गुणवत्ता है जरूरी

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सुधांशु का मानना ​​है कि हर किसान को बागवानी का अभ्यास करना चाहिए। वह कहते हैं, “किसानों की जमीन का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा बागवानी के लिए होना चाहिए, जो उनकी आय बढ़ाने में मदद करता है। किसानों को सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा उठाना चाहिये और कृषि के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग करना चाहिए।”

वह आगे कहते हैं, “विभिन्न राज्य सरकारें पॉलीहाउस, कृषि उपकरण, खाद आदि पर विभिन्न सब्सिडी प्रदान करती हैं। जिससे किसानों को आसानी से खेती करने में काफी मदद मिलती है। इससे मुझे भी आगे बढ़ने में मदद मिली।”

सुधांशु गाँव के मुखिया हैं। वह कहते हैं कि कुछ किसानों ने उनसे प्रेरणा ली है और ड्रिप इरिगेशन तकनीक अपनाई है। वह कहते हैं कि इस क्षेत्र में गन्ना व्यापक रूप से उगाया जाता है। जिसे बहुत ज़्यादा पानी की जरूरत होती है। कुछ किसानों ने पानी की लागत कम करने के लिए, ड्रिप तकनीक का उपयोग करना शुरू कर दिया है। साथ ही, वे कुछ क्षेत्रों को बागवानी क्षेत्र में बदलने की योजना बना रहे है।”

उनका कहना है कि वह अपने फल उत्पादन को थोक में बेचने और अधिक रिटर्न पाने के लिए, कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ काम करने की योजना बना रहे हैं। वह कहते हैं, “जैसा की कॉर्पोरेट्स चाहते हैं, मैंने भी सालों तक ज्यादा से ज्यादा फलों का गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया है।”

अपनी सफलता के बारे में सुधांशु कहते हैं, “मेरे दादा के पास एक समय में 2,700 एकड़ जमीन थी और आज मेरी लगभग 200 एकड़ जमीन है। फिर भी, मैं चार गुना अधिक उत्पादन बढ़ाने में सक्षम हूं। यह केवल टेक्नोलॉजी और विज्ञान के उपयोग से संभव हुआ है।”

मूल लेख: हिमांशु नित्नावरे

संपादन – प्रीति महावर

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