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असम: खराब रेडियो ठीक करते-करते बन गए इनोवेटर, मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

असम: खराब रेडियो ठीक करते-करते बन गए इनोवेटर, मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

असम के धेमाजी में रहने वाले नबजीत भराली ने जरूरतमंदों व दिव्यांगजनों के लिए कई ज़रूरी आविष्कार किए हैं, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

असम के धेमाजी में रहने वाले 27 वर्षीय नबजीत भराली ने ‘फिलॉसोफी’ विषय में मास्टर्स की डिग्री ली है। पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह ट्रांसपोर्टेशन व्यवसाय से जुड़ गए। लेकिन इन सबसे अलग, उनकी एक पहचान आविष्कारक के तौर पर भी है। नबजीत ने रेशम का काम करने वाले लोगों के लिए ‘सिल्क रीलिंग एंड स्पिनिंग मशीन’ और दिव्यांगों के लिए एक ‘ऑटोमेटेड व्हीलचेयर’ बनाई है। नबजीत को उनके इनोवेशन के लिए ‘नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ द्वारा पुरस्कार भी मिला है। द बेटर इंडिया से बात करते हुए, उन्होंने अपने इस सफर के बारे में बताया। 

उन्होंने कहा कि मशीनों के प्रति लगाव, उन्हें अपने बड़े भाई को देखकर हुआ। बचपन में वह देखते थे कि लोग उनके भाई के पास अपने खराब, रेडियो, टीवी आदि सही कराने के लिए लेकर आते हैं। घर में उनके भाई ने एक छोटी सी कार्यशाला बनाई हुई थी, जहां वह ये सब काम करते थे। वह बताते हैं, “उस वर्कशॉप में मुझे जाने की या कोई चीज छूने की इजाजत नहीं थी। मैं उन्हें बस दूर से देखता था। फिर भैया ने भारतीय सेना ज्वाइन कर ली और उन्हें ड्यूटी के लिए जाना पड़ा। बस उनके जाते ही मैंने वर्कशॉप में हर चीज को छूकर क्या, खोलकर भी देखना शुरू कर दिया।” 

धीरे-धीरे मशीनों की भाषा उन्हें समझ में आने लगी और वह भी अपने भाई की तरह लोगों के खराब रेडियो और टीवी ठीक करने लगे। लेकिन नबजीत सिर्फ मैकेनिक की पहचान तक सिमित नहीं रहे बल्कि वह इससे कहीं ज्यादा करना चाहते थे। और वहीं से, उनका एक आविष्कारक बनने का सफर शुरू हुआ।

 सिल्क रीलिंग एंड स्पिनिंग मशीन: 

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NIF के सहयोग से तैयार सिल्क रीलिंग एंड स्पिनिंग मशीन का मॉडल

वह आगे बताते हैं कि वह असम के उस इलाके से आते हैं, जहां रेशम की बुनाई लगभग हर घर में होती है। वह हमेशा अपनी माँ को घंटों तक रेशम के धागे से बोबिन भरते हुए देखते थे। यह काम हाथ से होता था और इसमें उनकी माँ को बहुत ज्यादा समय लगता था। माँ की तकलीफ को समझते हुए, उन्होंने ऐसा कुछ बनाने की ठानी, जिससे कि इस काम में कम मेहनत लगे। नबजीत छठी कक्षा में थे, जब उन्होंने रेशम के लिए ‘रीलिंग मशीन’ पर काम करना शुरू किया। 

उन्होंने बताया, “हाथ से एक बोबिन को रेशम के धागे से भरने के लिए, लगभग एक घंटे का समय लगता था। लेकिन मैंने जो मशीन बनाई, उससे एक बोबिन मात्र पांच मिनट में तैयार हो जाती है। पहले मैंने मूंगा और एरी रेशम के लिए, अलग-अलग मशीन के प्रोटोटाइप बनाए थे। जिससे यह काम आसान हो गया और समय की भी बचत हुई।” बारहवीं कक्षा तक आते-आते, उन्होंने दो तरह की ‘रीलिंग मशीन’ और एक ‘स्पिनिंग मशीन’ बना ली थी। ये मशीनें ऑटोमैटिक हैं और इनसे रेशम का काम काफी आसान हो गया। 

उनकी माँ, अनीता भराली बताती हैं कि उन्होंने अपने बेटे की बनाई मशीन पर, लगभग 12 साल काम किया है। 58 वर्षीया अनीता ने कहा, “बाजार में मिलने वाली मशीनों से, नबजीत की बनाई मशीनें बहुत ज्यादा सस्ती और प्रभावी हैं। काम भी बहुत आसानी से और कम समय में हो जाता है। पहले जब रेशम का धागा तैयार करते थे तो बहुत समय जाता था। थकान भी काफी हो जाती थी। लेकिन, जब से स्पिनिंग मशीन मिली है तो पूरी मेहनत ही खत्म हो गई।” 

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स्पिनिंग मशीन का एक मॉडल

नबजीत आगे कहते हैं कि उनकी मशीन को शुरुआत में काफी प्रोत्साहन भी मिला। लगभग 25-30 लोगों के लिए, उन्होंने यह मशीन बनाई भी। जब उनकी मशीन को अच्छी प्रतिक्रिया मिली तो उन्होंने अपने कॉलेज के पहले साल में, इस आविष्कार की सभी जानकारी एनआईएफ को ईमेल द्वारा भेजी। एनआईएफ की टीम ने उनके इस आविष्कार को और बेहतर करने में उनकी मदद की और साथ ही, उनके इस आविष्कार के लिए पेटेंट भी फाइल किया। वह कहते हैं, “एक समय ऐसा भी था, जब आसपास के लोगों ने गलत तरह की बातें कहना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा कि मैंने कहीं से कॉपी करके मशीन बनाई हैं। मुझे बहुत निराशा होने लगी थी। ऐसे में, जब नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से जुड़ने का मौका मिला तो उन्होंने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। तब मुझे लगा कि मैं बिल्कुल सही राह पर हूँ।” 

एनआईएफ की टीम का कहना है कि उन्होंने जब नबजीत की बनाई मशीनों का ट्रायल किया तो मशीनें काफी कारगर साबित हुईं। इसलिए,वे IIT गुवाहाटी और IIIT मणिपुर के साथ मिलकर, इस मशीन को और एडवांस बनाने पर काम कर रहे हैं। 

ऑटोमेटेड व्हीलचेयर: 

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ऑटोमेटेड व्हीलचेयर

‘सिल्क रीलिंग एंड स्पिनिंग मशीन’ के बाद नबजीत ने एक ‘ऑटोमेटेड व्हीलचेयर’ भी बनाई है। वह बताते हैं कि ‘हनी बी नेटवर्क’ से जुड़ने के बाद उन्हें काफी हौसला मिला और वह एक बार फिर से कुछ नया करने में जुट गए। उनके दिमाग में एक ऐसी व्हीलचेयर बनाने का आईडिया था, जो कि सेंसर से काम करे। उन्होंने कहा, “मैंने एक बार बाजार में देखा कि एक दिव्यांग व्यक्ति एक लकड़ी के फट्टे पर बैठकर, जिसके नीचे चार पहिए लगे होते हैं, सड़क पार करने की कोशिश कर रहा था। मैंने देखा कि उनका एक पहिया गड्ढे में अटक गया तो उन्हें बहुत परेशानी हो गयी। आने-जाने वाले लोग भी उन पर चिल्लाने लगे थे। तब पहली बार मुझे लगा कि मैं उनके लिए क्या कर सकता हूँ?” 

इसके घटना के बाद, एक बार उनका एक चैरिटी इवेंट में जाना हुआ। वहां पर कुछ दिव्यांगों को ट्राईसाइकिल दी गयी थी। लेकिन, उन्होंने महसूस किया कि हर कोई दिव्यांग एक-दूसरे से अलग है और उन्हें अलग-अलग तरह के साधनों की जरूरत है। वह कहते हैं, “वहीं से मेरे दिमाग में आईडिया आया कि मुझे ऐसा कुछ बनाना चाहिए, जिससे कि दिव्यांगों के लिए एक से दूसरी जगह आना-जाना आसान हो जाए। इसके लिए, मैंने व्हीलचेयर का अपना पहला प्रोटोटाइप तीन पहियों वाला बनाया। मैंने इसके लिए बच्चों की साइकिल के कल-पुर्जे इस्तेमाल किए और लगभग पांच हजार रुपए इसकी लागत आई।” 

Assam Innovator
मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

बाद में, एनआईएफ के सहयोग से उन्होंने चार पहियों वाला एक बेहतर संस्करण बनाया। इस व्हीलचेयर को उपयोग करने वाला इंसान, इसे अपने शरीर के वजन से ही नियंत्रित कर सकता है। अगर आप इसे कहीं मोड़ना चाहते हैं तो आपको बस अपने शरीर को उस दिशा में झुकाना होगा और आपके वजन के सेंसर से यह व्हीलचेयर मुड़ जाएगी। यह व्हीलचेयर 40 किमी/घंटा की गति से चल सकती है और इसके कुछ हिस्सों को अलग करके फिर से लगाया भी जा सकता है। 

इसके अलावा भी उन्होंने कई और आविष्कार किये हैं जैसे- ‘स्मार्ट हैंड ग्लव्स’, ‘पैडी थ्रेसर’ और ‘स्मार्ट एंटी-थेफ़्ट लॉक’। वह बताते हैं कि ‘स्मार्ट एंटी-थेफ्ट लॉक’ सिर्फ एक निश्चित चाभी से ही खोला जा सकता है। अगर कोई भी इसे किसी और चाभी या अन्य किसी चीज से खोलने की कोशिश करेगा तो इसमें लगा अलार्म बजने लगता है, जिसकी आवाज 100 मीटर के दायरे में सुनी जा सकती है। साथ ही, जिसका भी नंबर आपने अपने लॉक में डाला है, उस इंसान को भी एक फ़ोन कॉल अलर्ट जाएगा। वहीं, पैडी थ्रेसर को उन्होंने धान उगाने वाले किसानों का काम आसान करने के लिए बनाया है। 

साल 2017 में उन्हें अपने इन दोनों आविष्कारों के लिए ‘ग्रासरूट्स इनोवेशन अवॉर्ड’ मिला। इसके बाद, उन्हें ‘सोसाइटी ऑफ़ ओपन इनोवेशन टेक्नोलॉजी’ द्वारा आयोजित ‘ओपन इनोवेशन ऐंड बिज़नेस मॉडल कम्पटीशन’ में भी ‘बिज़नेस मॉडल अवॉर्ड’ से नवाजा गया। एनआईएफ में बतौर वैज्ञानिक कार्यरत, तुषार गर्ग कहते हैं कि नबजीत के सभी आईडिया लोगों की भलाई के लिए होते हैं। यही उनके इनोवेशन की खासियत है कि वह लोगों को उनकी समस्या का हल देना चाहते हैं।

नबजीत कहते हैं कि एनआईएफ की मदद से, उन्होंने अपनी ‘सिल्क रीलिंग एंड स्पिनिंग मशीन’ और ‘ऑटोमेटेड व्हीलचेयर’, दोनों इनोवेशन के लिए पेटेंट फाइल किया हुआ है। जैसे ही उन्हें पेटेंट मिल जायेगा, वह बड़े स्तर पर अपने इनोवेशन की मार्केटिंग करेंगे ताकि ये ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच सकें।

अधिक जानकारी के लिए आप उन्हें nabajitdmj@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं। 

संपादन – प्रीति महावर

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