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जानिये असम में उगाये जाने वाले इस चावल के बारे में, जिसे आप बिना पकाए खा सकते हैं!

स्त्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस

स्वदेशी बोका चाउल/चावल (ओरीजा सातिवा) या असमिया मुलायम चावल, असम की नयी प्राकृतिक उपज है जिसे जीआई (भौगोलिक संकेत) टैग के साथ पंजीकृत किया गया है।

जीआई टैग उन उत्पादों को दिया जाता है जिनकी किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पत्ति हो। और उस उत्पत्ति के कारण विशेष गुण व प्रतिष्ठा हो।

इस चावल की खेती ज्यादातर असम के नलबारी, बारपेटा, गोलपाड़ा, बक्सा, कामरूप, धुबरी, कोकराझर और दररंग जिलों में की जाती है। यह सर्दियों का चावल या फिर सली है, जिसे जून के तीसरे या चौथे हफ्ते से बोया जाता है। इस चावल का इतिहास 17वीं सदी से जुड़ा है। 17 वीं शताब्दी में, यह मुगल सेना से लड़ने वाले अहोम सैनिकों का मुख्य राशन हुआ करता था।

इस चावल की प्रजाति बहुत अनोखी है क्योंकि इस चावल को पकाने के लिए आपको किसी ईंधन की जरूरत नहीं है। जी हाँ, आप इसे बस सामान्य तापमान पर एक घंटे तक पानी में भिगो दीजिये और यह बनकर तैयार हो जायेगा। इसकी ठंडी प्रवृत्ति के कारण इस चावल को गर्मियों में खाया जाता है।

मुगा रेशम, जोहा चावल और तेजपुर लीची के बाद जीआई के रूप में पंजीकृत होने के बाद यह एकमात्र उत्पाद है।

नलबारी स्थित लोटस प्रोग्रेसिव सेंटर (एलपीसी) एनजीओ ने साल 2016 में इस के जीआई टैग के लिए आवेदन किया था। इसके अलावा पर्यावरण शिक्षा केंद्र (सीईई) भी इसका आवेदक था।

एलपीसी के कृषि विशेषज्ञ और कॉर्डिनेटर हेमंत बैश्य ने बताया, “हमें सोमवार को ही इस बारे में पता चला। हम सब बहुत खुश हैं क्योंकि यह चार सालों की मेहनत का परिणाम है।”

इस चावल को ज्यादातर दही, गुड़, दूध, चीनी या अन्य वस्तुओं के साथ पारंपरिक व्यंजन बनाने के लिए उपयोग किया जाता है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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