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बाढ़ में सीखनी पड़ी थी तैराकी, आज रिकॉर्ड बनाकर किया देश का नाम रौशन

बाढ़ में सीखनी पड़ी थी तैराकी, आज रिकॉर्ड बनाकर किया देश का नाम रौशन

शम्स आलम एक भारतीय पैरा एथलीट हैं, जिन्होंने पैरा तैराकी में कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं और कई मैडल भी जीते हैं।

हमारे आसपास अगर किसी के साथ कोई दुर्घटना हो जाये या किसी बीमारी की वजह से, कोई व्हीलचेयर पर आ जाए तो लोग मान लेते हैं कि उस इंसान की जिंदगी किसी काम की नहीं है। क्योंकि, हमारे समाज में लोगों की कमियां स्वीकारने की बजाय, उन्हें नकार दिया जाता है। जहाँ, कुछ लोग अपनी कमियों को अपनी मज़बूरी मान लेते हैं तो वहीं, कुछ लोग अपनी हर कमी से ऊपर उठकर नया इतिहास रचते हैं। जैसा कि भारतीय पैरा तैराक शम्स आलम कर रहे हैं। रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर होने की वजह से, उनकी कमर के नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। लेकिन, उन्होंने कभी हार नहीं मानी बल्कि वह मैडल जीतकर देश का नाम रोशन कर रहे हैं। 

मूल रूप से बिहार में मधुबनी के रहने वाले 34 वर्षीय शम्स आलम कहते हैं, “बहुत से लोगों को जो शारीरिक कमी दिखती है, वह मेरे लिए शारीरिक कमी नहीं है। मैंने इस कमी की वजह से खुद को खोया नहीं बल्कि खुद को पाया है।” यकीनन शम्स आलम एक हीरो हैं, जिनकी कहानी हम सबके लिए एक प्रेरणा है। 

बिहार से शुरू हुआ सफर

शम्स का जन्म बिहार में मधुबनी के रथौस गाँव में हुआ। यह गाँव भारत नेपाल के बॉर्डर पर हैं और यहाँ अक्सर बाढ़ आती रहती है। वह बताते हैं, “गाँव में लोगों को तैराकी खुद ही आ जाती है। अलग से सीखनी नहीं पड़ती। यह हमारे इलाके की जरूरत है। अगर जीना है तो तैराकी आनी ही चाहिए। हालांकि, बचपन में मैंने कभी भी तैराकी को करियर के तौर पर नहीं देखा था।” 

उनका परिवार खेलों से जुड़ा हुआ है। इसलिए, वह अपने दादा जी, चाचा और बड़े भाई की तरह कुश्ती करना चाहते थे। शम्स अपने परिवार में सबसे छोटे हैं, इसलिए, उनके परिवार ने उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा और ट्रेनिंग दिलाने का फैसला किया। जब वह छह साल के थे, तब वह मुंबई आ गए।
वह कहते हैं, “मैं बहुत छोटा था, जब अपने बड़े भाई के साथ मुंबई आया था। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा बदलाव था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मैं इस शहरी जिंदगी में फिट हो गया। मैंने अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी की, मैकेनिकल इंजीनियरिंग की और मुझे एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गयी। इस सबके बीच तैराकी कहीं पीछे छूट गयी थी।” 

लेकिन, एथलीट बनने की उनकी चाह ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। वह ऐसी जगह तलाशने लगे, जहाँ वह कुश्ती सीख सकें। क्योंकि, वह अपने दादाजी से बहुत प्रभावित थे। वह बताते हैं कि उनका बचपन अपने दादाजी की कुश्ती की कहानियां सुनते हुए बीता। इसलिए, वह हमेशा से इस क्षेत्र में कुछ करना चाहते थे। लेकिन, कुश्ती में उन्हें ज्यादा कुछ नहीं मिला और वह किक-बॉक्सिंग और मार्शल आर्ट करने लगें। इनमें से उन्होंने मार्शल आर्ट में अपना करियर बनाने का विकल्प चुना। अपनी नौकरी के साथ 10 वर्षों के कठोर अभ्यास के बाद, उन्होंने मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट हासिल कर ली। 

साथ ही, राज्य, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 50 से अधिक पदक जीतें। वह बताते हैं, “मुझे लगा कि मुझे कोई नहीं हरा सकता। 2010 के एशियाई खेलों के ट्रायल्स (परीक्षण) भारत में हुए। मैंने उनमें भाग लिया और एक रजत पदक जीता। अपने देश का प्रतिनिधित्व करने और चैंपियनशिप में जीत हासिल करके, देश का नाम ऊँचा करने का मेरा सपना सिर्फ इंचभर की दूरी पर था। उस समय मैं बहुत खुश था।”

लेकिन, जिंदगी ने उनके लिए कुछ और तय कर रखा था…..

एशियाई खेलों में कुछ महीने ही बचे थे, जब उन्हें अपने बाएं पैर की दूसरी ऊँगली में एक अजीब सी हरकत महसूस होने लगी। धीरे-धीरे उनका दर्द बढ़ने लगा और कभी-कभी वह बिल्कुल ही बैठे रह जाते थे और कुछ नहीं कर पाते। इससे न सिर्फ उनकी ट्रेनिंग रुक गयी बल्कि वह सीढ़ियां तक नहीं चढ़ पा रहे थे। इसलिए, उन्होंने एक न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह ली और अपना एमआरआई टेस्ट कराया। टेस्ट में पता चला कि उनकी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर है। 

वह आगे बताते हैं, “डॉक्टर ने मुझसे कहा कि ऑपरेशन कराना होगा। लेकिन, उन्होंने वादा किया कि ऑपरेशन के बाद कुछ समय के लिए लकवा रहेगा और फिर मैं धीरे-धीरे ठीक हो जाऊंगा और तीन-चार महीने में ही चल-फिर सकूंगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऑपरेशन नहीं कराया, तो मेरी जान को खतरा हो सकता है।” 

लेकिन, ऑपरेशन के तीन-चार महीने के बाद भी शम्स ठीक नहीं हुए। वह कहते हैं, “मेरी जिंदगी अँधेरे में चली गयी थी। दूसरे एमआरआई टेस्ट से पता चला कि 3.5 मिमी ट्यूमर अभी भी था। पिछले ऑपरेशन की लैब रिपोर्ट में गलत दिखाया गया था कि यह निकाल दिया गया है। मुझे दूसरी बार सर्जरी करानी पड़ी और ट्यूमर भी निकल गया। लेकिन, इस वक्त तक लकवा मेरे जीवन का हिस्सा बन गया था।” 

ऑपरेशन के बाद उन्हें ‘पैराप्लेजिक रिहैब सेंटर’ भेजा गया, जहाँ उन्हें धीरे-धीरे ठीक होने की शारीरिक और भावनात्मक ताकत मिली। वह बताते हैं कि उन्हें तैराकी छोड़े बहुत साल हो गए थे, लेकिन वहाँ पर लोगों ने उन्हें फिर से तैराकी करने की सलाह दी। डॉक्टरों ने भी कहा कि यह उनके नर्वस सिस्टम को ठीक होने में मदद करेगा। इसलिए, वह दादर के पास एक स्विमिंग पूल में गए। पहले तो उनकी हालत को देखते हुए, वहाँ पर उन्हें पानी में जाने से मना कर दिया गया, लेकिन जब शम्स नहीं माने तो उन्हें तैराकी करने की अनुमति मिल गयी। 

वह कहते हैं, “मैं इस बारे में खुद आश्वस्त नहीं था, लेकिन फिर भी स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी और फिर मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गयी।” शम्स कहते हैं कि पानी में जाने के चंद मिनटों बाद ही उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगा और उनके शरीर का अपने आप एक संतुलन बन गया और वह तैरने लगे। कुछ समय बाद, शम्स पानी से निकले तो उनकी जिंदगी में कुछ बदल चुका था और यह बदलाव अच्छा था। 

शुरू की, जीवन की दूसरी पारी: 

कुछ महीनों बाद, सितंबर 2021 में, उन्होंने एक राज्य स्तर की तैराकी चैम्पियनशिप में प्रतिस्पर्धा करते हुए, एक रजत और एक कांस्य पदक जीता। दिसंबर में, उन्हें ‘पैराप्लेजिक तैराकों’ की एक राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा के लिए चुना गया, जहाँ उन्होंने 50 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक श्रेणी में कांस्य पदक जीता। इसके बाद, उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

2013 में, उन्होंने गेटवे ऑफ़ इंडिया पर अरब सागर में तैराकी की और एक समुद्री तैराकी प्रतियोगिता में भी भाग लिया, जिसे वह पूरा नहीं कर सके। एक साल बाद, दृढ निश्चय करके, उन्होंने दिव्यांग श्रेणी के तहत ‘नेवी डे ओपन सी स्विमिंग कम्पटीशन’ में भाग लिया। और इस बार, उन्होंने न केवल तैराकी पूरी की, बल्कि 1 घंटे, 40 मिनट और 28 सेकंड में 6 किमी की दूरी तय करके विश्व रिकॉर्ड बनाया। ऐसा करने वाले, वह पहले दिव्यांग व्यक्ति हैं, इसलिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी शामिल हुआ। 

इसके बाद, अपना खुद का रिकॉर्ड तोड़ते हुए, 2017 में उन्होंने गोवा में सिनकरिम-बागा-कैंडोलिम समुद्र में मात्र चार घंटे और चार मिनट में आठ किमी तक तैराकी की। उसी वर्ष, उन्होंने पहली बार विश्व पैरा तैराकी श्रृंखला (वर्ल्ड पैरा स्विमिंग सीरीज) में भारत का प्रतिनिधित्व किया और कांस्य पदक हासिल किया। अपनी हर जीत के साथ, वह एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के अपने सपने की ओर बढ़ रहे थे। वह सपना जो मार्शल आर्ट में अधूरा रह गया था। 2018 एशियाई पैरा खेलों में वह आठवें शीर्ष स्थान पर रहे।

फिलहाल, वह चीन में होने वाले ‘एशियाई पैरा खेल’ 2020 और पुर्तगाल में होने वाली ‘वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप’ 2021 के लिए तैयारी कर रहे हैं। 

उन्होंने हाल ही में 20-22 मार्च 2021 को माउंट लिट्रा ज़ी स्कूल वाइटफील्ड, बेंगलुरु में हुई 20वीं नैशनल पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है। इसके अलावा, शम्स दिव्यांगों के लिए समान अधिकारों और एक बेहतर समाज पर भो जोर देते हैं। उन्हें अलग-अलग जगह स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और अन्य आयोजनों में बतौर ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ भी बुलाया जाता है और उन्होंने ‘टेड टॉक’ में भी हिस्सा लिया है। 

वह अंत में कहते हैं, “सोचिये, मैं अरब सागर में तैराकी कर चुका हूँ लेकिन, अपने घर से निकलने से पहले मुझे दो बार सोचना पड़ता है। प्रमाणपत्रों के बावजूद, मुझे नहीं लगता कि मैं किसी भी प्रकार से विकृत हूँ। मुझमें एक कमी है लेकिन यह किसी तरह की विकृति नहीं है। हमारे समाज का दृष्टिकोण सीमित है, मैं या मेरा शरीर नहीं।” 

यकीनन शम्स आलम हम सबके लिए एक प्रेरणा हैं।  

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मूल लेख: अनन्या बरूआ 

संपादन- जी एन झा

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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