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नौकरी छोड़ बने किसान, इकट्ठा किया बारिश का पानी, नहीं जलाई पराली, सालाना कमाई हुई 16 लाख

नौकरी छोड़ बने किसान, इकट्ठा किया बारिश का पानी, नहीं जलाई पराली, सालाना कमाई हुई 16 लाख

करीमनगर, तेलंगाना के रहने वाले मल्लिकार्जुन रेड्डी, सॉफ्टवेयर की नौकरी छोड़कर जैविक खेती कर रहे हैं। उन्हें ‘अभिनव किसान पुरस्कार’ से भी नवाजा गया है।

अक्सर लोग अपने रिटायरमेंट के बाद, अपने गाँव लौटने की सोचते हैं, ताकि उनकी बाकी की ज़िंदगी, स्वच्छ वातावरण में शांति से बीते। लेकिन, आजकल बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो बड़े शहरों में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर, गांवों की तरफ लौट रहे हैं। क्योंकि, वे अपने परिवार को एक अच्छा और स्वस्थ जीवन देना चाहते हैं। आज हम आपको तेलंगाना के ऐसे ही एक किसान की कहानी सुना रहे हैं, जिन्होंने आईटी क्षेत्र को छोड़कर, कृषि क्षेत्र से नाता जोड़ लिया। उनका उद्देश्य बहुत ही स्पष्ट था, अपने परिवार को स्वस्थ भोजन और एक सुकून भरा जीवन देना। 

हम बात कर रहे हैं 40 वर्षीय मल्लिकार्जुन रेड्डी की, जो तेलंगाना में करीमनगर जिले के एक गाँव पेद्दा कुरमापल्ली (Peddakurmapally) के रहने वाले हैं। रेड्डी, साल 2014 से, जैविक तरीकों से खेती कर रहे हैं और न सिर्फ परिवार को बल्कि अन्य लोगों को भी स्वस्थ खाना खिला रहे हैं। कुछ समय पहले ही उन्हें ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद’ (ICAR) द्वारा उनके जैविक खेती के तरीकों और अलग प्रयासों के लिए ‘अभिनव किसान पुरस्कार’ से नवाजा गया है। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने अपने इस सफर के बारे में बताया। 

रेड्डी कहते हैं, “मैं हैदराबाद में नौकरी करता था और मेरे दोस्त और रिश्तेदार, अक्सर अपने परिवार के किसी न किसी सदस्य के इलाज के लिए वहां आते रहते थे। मैं भी उनके साथ कई बार अस्पताल जाता था और वहां जब भी डॉक्टरों से बात होती, तो रसायनयुक्त खाने-पीने पर चर्चा जरूर होती। इस बारे में ज्यादा जानने पर पता चला कि रसायनिक खेती और लोगों में बढ़ती बीमारियां, एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। मैं हमेशा इस बारे में सोचता रहता था। उस दौरान, पता चला कि मेरे एक दोस्त की बेटी को कैंसर हो गया। इसके बाद मैंने ठान लिया कि चाहे कमाई कम हो लेकिन, मैं अपने परिवार को एक स्वस्थ जिंदगी दूंगा।”  

Telangana Farmer
मल्लिकार्जुन रेड्डी

गाँव लौटकर शुरू की खेती:

कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले, मल्लिकार्जुन रेड्डी ने सात साल हैदराबाद की ‘सिमैंटिकस्पेस टेक्नोलॉजी’ कंपनी में, सॉफ्टवेर इंजीनियर के तौर पर काम भी किया है। लेकिन नौकरी छोड़, उन्होंने जैविक खेती करने की ठानी। उनके लिए जैविक खेती करने की प्रेरणा, सुभाष पालेकर और राजीव दीक्षित जैसे कृषिविद रहे हैं। जो लोगों को जैविक तरीकों से खेती करना सिखा रहे हैं। उन्होंने अपनी पारिवारिक जमीन पर खेती करना शुरू किया। हालांकि, यह इतना आसान नहीं था। उन्होंने बताया, “गाँव में लोग मजाक बनाते थे कि अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर क्यों खेती कर रहे हो? बहुत से रिश्तेदारों ने भी कहा कि यह एक गलत फैसला है। खेती से कुछ कमाई नहीं होने वाली है, अब तक जो कमाया है, उसे भी गंवा दोगे। लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी। मेरे परिवार ने मेरा सहयोग किया और मैंने खेती शुरू कर दी।” 

शुरूआत में, उन्हें ज्यादा अच्छे नतीजे नहीं मिले लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। बल्कि उन्होंने अपने खेती के तरीकों में बदलाव किया। जैसे- धान के लिए उन्होंने अलग से पौधे तैयार करने की बजाय, इसे सीधा खेतों में ही लगाया। वह अपने खेतों में गोबर की खाद का इस्तेमाल करके बने, जीवामृत, गौकृपामृत आदि अलग-अलग जैविक खाद और पोषण डालते हैं। धान की कटाई के बाद, बचने वाली पराली को भी वह जलाते नहीं है बल्कि इन्हें खेत में, डीकंपोजर की मदद से गलाकर खाद बनाई जाती है। जिससे जमीन की उर्वरकता बढ़ती है। 

सिंचाई के लिए उन्होंने अपने खेत में ‘ड्रिप इरिगेशन सिस्टम’ लगवाया हुआ है। इसके अलावा, वह अपने खेतों में तालाब और कुएं के माध्यम से बारिश के पानी को इकट्ठा करते हैं। इस पानी का इस्तेमाल बाद में सिंचाई के लिए किया जाता है। वह कहते है कि इससे उन्हें सिंचाई में ज्यादा समस्या नहीं आती है और साथ ही, यह भूजल स्तर बढ़ाने में भी मददगार है। 

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धान की सात किस्में उगाने के अलावा, वह सूरजमुखी, अदरक, मूंगफली, और तिल की भी खेती करते हैं। इसके अलावा, अपने घर के लिए वह मौसमी सब्जियां जैसे प्याज, लहसुन, धनिया, हरी मिर्च आदि भी उगा रहे हैं। उन्होंने आगे बताया, “साथ ही, इस बार मैंने एक औषधीय फसल, बच (अकोरुस केलामस) भी लगाई है। इसकी बाजार में काफी मांग है और यह नौ हजार रुपए प्रति क्विंटल की दर से बिकती है। मुझे उम्मीद है कि इस फसल से मुझे अच्छा मुनाफा मिलेगा।” 

रेड्डी कहते हैं कि उन्होंने अपने अभिनव तरीकों से अपने खेतों की लागत को कम किया है। एक सीजन में, किसी सामान्य किसान की प्रति एकड़ धान की फसल लगाने की लागत, यदि 25 हजार रुपए आती है तो वहीं, मल्लिकार्जुन एक एकड़ में धान लगाने के लिए, सिर्फ 12,500 रुपए ही खर्च करते हैं। उनका कहना है कि जैविक तरीकों से खेती करने के कारण, खर्च कम हुआ है और कमाई बढ़ी है। उन्होंने एक सीजन में अपनी एक एकड़ धान की फसल से लगभग 57 हजार रुपए की कमाई की है। उनका कहना है कि खेती में आप तभी मुनाफा कमा सकते हैं, जब आप जैविक तरीकों से खेती करते हुए अपनी लागत को कम रखें। 

बने हैं सेहतमंद: 

वह आगे बताते हैं कि जब से उन्होंने खेती करना शुरू किया है, उनका छह किलो वजन कम हुआ है। वह इसकी वजह, खेत में सच्ची लगन से काम करने को मानते हैं। वह अपने खेतों में ज्यादातर काम खुद ही संभालते हैं। उनका कहना है कि वह हर दिन लगभग 12 घंटे काम करते हैं। उन्होंने अपने यहां कुछ पशुधन जैसे गाय, बकरी, और भेड़ भी रखी हुई हैं। सुबह उठाकर, सबसे पहले वह इनकी देखभाल करते हैं और फिर खेतों के लिए निकलते हैं। उनका कहना है कि वह हर दिन खेत में लगभग 26 हजार कदम चल लेते हैं। जिससे वह हमेशा फिट रहते हैं । 

कसरत करने के साथ-साथ, वह अच्छा और स्वस्थ खाना खा रहे हैं। लोगों तक अपनी उपज पहुंचाने के लिए, उन्होंने अपनी एक दुकान भी खोली है। जहां से लोग आसानी से उनके खेतों की उपज खरीद सकते हैं। रेड्डी नियमित तौर से अपने इलाके के ‘कृषि विज्ञान केंद्र’, ‘आत्मा’ और ‘प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना स्टेट एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी’ से जुड़े हुए हैं। वहां के विशेषज्ञों से वह लगातार सलाह लेते रहते हैं। इनके माध्यम से कई किसान समूह भी, उनके खेतों पर आकर उनके खेती के तरीकों के बारे में जानते हैं। 

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वह बताते हैं, “मैं कृषि विद्यालयों के छात्रों को ट्रेनिंग देता हूँ। उन्होंने जो किताबों में पढ़ा है, उस ज्ञान को वह जब व्यवहारिक तौर पर पूरा करते हैं तो बहुत खुश हो जाते हैं। जिससे उनकी समझ भी बढ़ती है।” रेड्डी से ट्रेनिंग लेने वाली एक कृषि छात्रा, ममता बताती हैं कि वह यूनिवर्सिटी में जो कुछ पढ़ती हैं, उसका सही मतलब उन्हें खेतों पर, सभी कार्यों को करते तथा देखते हुए, समझने को मिलता है। और अगर समझाने वाला किसान, मल्लिकार्जुन रेड्डी हो तो छात्रों को और भी नयी-नयी बातें सीखने को मिलती हैं। क्योंकि, रेड्डी उन्हें अपने अनुभव के आधार बहुत सी बातें समझाते हैं। 

मल्लिकार्जुन रेड्डी बताते हैं कि जब वह नौकरी में थे तो उनकी कमाई, चार लाख रुपए सालाना थी। लेकिन, अब खेती से उनकी सालाना कमाई लगभग 16 लाख रुपए तक हो जाती है। साथ ही, वह अपने परिवार को रसायनमुक्त और स्वस्थ खाना खिलाने में सक्षम हुए हैं। उनका कहना है, “खुद को और पर्यावरण को बचाने के लिए, यह जरुरी है कि हम किसान खेती के लिए रसायनमुक्त और प्रकृति के अनुकूल तरीकें अपनाएं। शुरूआत में, आपको काफी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन, अगर आप मेहनती हैं तो एक न एक दिन आपको सफलता जरूर मिलेगी।” 

अगर आप मल्लिकार्जुन रेड्डी से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें mavuram@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।

संपादन- जी एन झा

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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