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मुंबई: मुफ्त ‘डिजिटल हियरिंग एड’ प्रदान कर, संवारा 1300 से ज्यादा दिव्यांग बच्चों का जीवन

मुंबई: मुफ्त ‘डिजिटल हियरिंग एड’ प्रदान कर, संवारा 1300 से ज्यादा दिव्यांग बच्चों का जीवन

मुंबई की रहने वाली ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट, देवांगी दलाल ने साल 2004 में, ईएनटी सर्जन, डॉ. जयंत गाँधी के साथ मिलकर ‘जोश फाउंडेशन’ की शुरुआत की। जिसके जरिए, वे 1300 से ज्यादा जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त में ‘डिजिटल हियरिंग एड’ उपलब्ध करा चुके हैं।

मुंबई की रहने वाली 50 वर्षीया देवांगी दलाल पेशे से एक ‘ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट’ हैं। साल 1991 में, उन्होंने शहर के नायर अस्पताल से अपनी डिग्री पूरी की और तब से ही, वह इस क्षेत्र में (Health Care Services) काम कर रही हैं। वह ऐसे लोगों की मदद करती हैं, जो सुन नहीं सकते हैं। उनका कहना है कि कुछ दिव्यांगों में सुनने की थोड़ी बहुत क्षमता होती है। अगर ऐसे लोगों की सही समय पर सही तकनीक से मदद की जाए तो वे न सिर्फ सुन सकेंगे बल्कि बोल भी पाएंगे। इसलिए, वह इस बारे में सिर्फ लोगों को जागरूक ही नहीं करती हैं बल्कि बहुत से बच्चों तक तकनीक भी पहुंचा रही हैं। 

अपने काम को जमीनी स्तर पर बढ़ाने के लिए, उन्होंने 2004 में एक ईएनटी सर्जन, डॉ. जयंत गाँधी के साथ मिलकर ‘जोश फाउंडेशन‘ की शुरुआत की। जिसका पूरा नाम ‘जुवेनाइल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ स्पीच एंड हियरिंग’ है। अपने इस संगठन के जरिए, उन्होंने बहुत से बच्चों को सुनने और बोलने की क्षमता प्रदान की है। वह अभी भी लगातार अपने प्रयासों में जुटी हुई हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए, उन्होंने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बताया। 

शुरू किया जोश फाउंडेशन:

जोश फाउंडेशन की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं कि साल 2004 में, वह एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए डेनमार्क गई थीं। जहाँ नवजात शिशुओं की जाँच के बारे में विचार-विमर्श चल रहा था। वहाँ उनसे पूछा गया कि भारत में ऐसे कितने नवजात शिशुओं की जाँच की जाती है, जिनमें जन्म से ही जो बीमारी या कमियां हैं, उनका पता चल सके? वह कहती हैं, “मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। मैंने वापस लौटकर, इस बारे में डॉक्टरों से बात की लेकिन, पता चला कि ऐसा कर पाना मुश्किल है। क्योंकि, लोगों के बीच बहुत से मिथक हैं। जैसे- ऐसा माना जाता है कि अगर बच्चे में जन्म से सुनने की क्षमता नहीं है या बहुत कम है तो यह डिलीवरी के दौरान हुई, किसी गलती के कारण हुआ होगा।” 

Health Care Services
डॉ. जयंत गाँधी और देवांगी दलाल

देवांगी ने इस विषय पर ईएनटी सर्जन डॉक्टर गाँधी से बात की, जिनके साथ वह इस क्षेत्र में, पिछले 30 सालों से काम कर रही हैं। उन्होंने डॉ. गाँधी से कहा कि इस क्षेत्र में जागरूकता लाने और ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक पहुँचने के लिए, उन्हें कुछ करना चाहिए। काफी विचार-विमर्श के बाद, इन दोनों ने मिलकर 2004 में ही ‘जोश फाउंडेशन’ की शुरुआत की। इस फाउंडेशन के जरिए, वे सिर्फ इसी समस्या के निदान पर काम नहीं कर रहे हैं बल्कि जरूरतमंद लोगों को सही तकनीक प्रदान करने के साथ-साथ, वह उनके पूर्ण विकास में भी मदद करते हैं। 

उन्होंने इसकी शुरुआत, बहुत ही कम फंड के साथ की और दिव्यांग बच्चों के विशेष स्कूलों के साथ संपर्क किया। इन स्कूलों में वे जिन बच्चों की मदद कर सकते थे, उन्हें उनकी जरूरत के हिसाब से मुफ्त में ‘डिजिटल हियरिंग एड’ प्रदान करना शुरू किया। आज वह मुंबई के लगभग 12 स्पेशल स्कूल और सामान्य स्कूलों के साथ काम कर रहे हैं। वे 1-20 साल की उम्र के दिव्यांगों की मदद करते हैं। 

वह बताती हैं कि हियरिंग एड के बारे में भी कई मिथक हैं जैसे- इनमें सिर्फ ‘एम्पलीफायर’ होते हैं और इन्हें बड़ी संख्या में खरीदकर, बांटा जा सकता है। इसलिए, कई लायन और रोटरी क्लब के सदस्य, उनसे पूछते भी थे कि वे महँगी डिजिटल हियरिंग एड क्यों इस्तेमाल करते हैं। देवांगी कहती हैं, “लेकिन हमने साबित किया है कि अगर बच्चों को उनकी जरूरत के हिसाब से, सही डिजिटल तकनीक दी जाए तो यह ज्यादा कारगार होता है। हमने जिन बच्चों की मदद की है, वे आज अपने जीवन में अच्छा कर रहे हैं। इसलिए, अब फंडिंग के लिए भी कॉर्पोरेट कंपनियों, लायन और रोटरी क्लब व अन्य लोगों को समझाना आसान हो गया है।” 

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मुफ्त में प्रदान करते हैं डिजिटल हियरिंग एड

जोश फाउंडेशन न सिर्फ मुफ्त में ‘डिजिटल हियरिंग एड’ प्रदान करती है बल्कि इन बच्चों को अपने हुनर को निखारने और दुनिया को दिखाने का मौका भी देती है। फाउंडेशन द्वारा 12वीं कक्षा के बाद बच्चों को आगे पढ़ने और अपना बेहतर करियर बनाने के लिए मदद की जाती है। फाउंडेशन द्वारा मदद के लिए ‘रोबॉटिक्स क्लास’ और ‘पर्सनेलिटी डेवलपमेंट क्लास’ भी चलाई जाती है। फाउंडेशन द्वारा समय-समय पर और भी कई तरह के आयोजन किये जाते हैं, जहां ये बच्चे अपना टैलेंट दिखाते हैं। 

डॉ. गाँधी कहते हैं, “हर एक इंसान समान है और किसी भी तरह की विकृति के बावजूद, हमें सबके साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। साथ ही, मेरा दृढ़ विश्वास है कि उन्हें सहानुभूति या दया की जरूरत नहीं होती है। जोश फाउंडेशन का विश्वास है कि अगर पुनर्वास कार्यक्रम और हाईटेक चिकित्सा तकनीक साथ मिलकर, काम करें तो स्थिति को बहुत हद तक सुधारा जा सकता है।” जोश फाउंडेशन ने अब तक, 1300 से ज्यादा बच्चों की मदद की है। 

मुंबई में रहने वाले 50 वर्षीय रानाकांत शुक्ला बताते हैं, “मेरी बेटी जब चार साल की हो गयी तब हमें पता चला कि वह सुन नहीं सकती है। मूल रूप से हम उत्तर प्रदेश में बनारस के पास के एक क्षेत्र से हैं। लेकिन, वहाँ पर बेटी के इलाज लिए कोई सुविधा नहीं थी इसलिए, हम मुंबई आ गए। यहां हमने उसका दाखिला स्पेशल स्कूल में कराया। कई सालों तक हमने उसके लिए अलग-अलग तरह की मशीन इस्तेमाल की, लेकिन, कोई खास फायदा नहीं हुआ। हम मध्यम-वर्गीय लोग हैं और इसलिए, बहुत ज्यादा कीमती हाई-फाई मशीन खरीद नहीं सकते थे।” 

शुक्ला, मुंबई में ही एक कपड़ा फैक्ट्री के सेल्स विभाग में काम करते हैं। फिलहाल, उनकी बेटी 16 साल की है और 10वीं कक्षा में पढ़ रही है। उन्होंने बताया कि लगभग एक-डेढ़ साल पहले, उन्हें जोश फाउंडेशन के बारे में पता चला। उन्होंने उनसे संपर्क कर, अपनी बेटी के बारे में बताया। उन्होंने आगे कहा, “इस साल जनवरी में देवांगी जी ने मेरी बेटी को ‘हियरिंग एड’ लगवाई और दो-तीन महीने में ही काफी अच्छा नतीजा देखने को मिला है। अब वह अच्छे से सुन पा रही है और थोड़ा-बहुत बोलने भी लगी है। हमें उम्मीद है कि वह 10वीं की परीक्षा अच्छे से पास कर लेगी और इसके बाद, हम उसका दाखिला एक सामान्य स्कूल में कराएंगे। हमारा उद्देश्य अपनी बेटी को अच्छे से पढ़ा-लिखाकर, अपने पैरों पर खड़ा करना है और हमारे इस सपने को पूरा करने में, जोश फाउंडेशन का बड़ा योगदान है।” 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान: 

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मिले हैं पुरस्कार

अपने इस काम के लिए देवांगी दलाल को न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिले हैं। साल 2012 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑडियोलॉजी से ‘ह्यूमैनीटेरियन अवॉर्ड’ प्राप्त करने वाली, वह पहली भारतीय हैं। इसके अलावा, ‘इंडियन स्पीच-लैंग्वेज ऐंड हियरिंग एसोसिएशन‘ में नियुक्त होने वाली, वह सबसे कम उम्र की सदस्य रहीं। उन्हें हाल ही में, भारत में ऑडियोलॉजी के निजी चिकित्सकों के लिए, राष्ट्रीय समन्वयक के रूप में नियुक्त किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साथ काम कर रहे, ‘कोएलिशन फॉर ग्लोबल हियरिंग हेल्थ’ (CGHH) की वह पहली भारतीय ‘हियरिंग हेल्थ एडवोकेट’ हैं। 

इसके साथ-साथ, उन्होंने इस विषय पर अंग्रेजी, गुजराती और हिंदी में तीन किताबें- ‘स्प्रैडिंग पॉजिटिविटी’ (अंग्रेजी), ‘चालो बधिरोने सम्भलता करिए’ (गुजराती) और ‘कुछ सुना आपने’ (हिंदी) लिखी हैं। साथ ही, उन्होंने अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑडियोलॉजी में भारत की तरफ से पहला ‘लर्निंग मॉड्यूल’ भी दिया है, जिसका शीर्षक है- “A roadmap to independence of Hearing-impaired children in developing countries _ India as a role model” 

देवांगी का मानना है कि अगर ज्यादा से ज्यादा लोग, उनके अभियानों में साथ दें तो अधिक बच्चों की मदद की जा सकती है। वह कहती हैं कि सबसे पहले, ऐसे समुदायों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है, जहां कम सुनने की क्षमता रखने वाले बच्चों की परेशानियां लोगों को समझ ही नहीं आती हैं।

Hearing Impaired
बच्चों के लिए करते हैं अलग-अलग प्रोग्राम

ऑडियोलॉजिस्ट और स्पीच थेरेपिस्ट होने के साथ-साथ, वह एक शोधकर्ता भी हैं और अपने शोध के आधार पर वह बताती हैं, “देश में लगभग 6.3% लोग ऐसे हैं जो सुन नहीं सकते हैं और इनमें लगभग 40% बच्चे हैं। अगर हम कम उम्र में ही बच्चों की सुनने की क्षमता पर ध्यान दें और उनकी सही जांच कराकर, उन्हें सहयोग उपलब्ध कराएं तो बहुत से बच्चे सामान्य जीवन जी सकेंगे। लेकिन, इसके लिए हम सबको साथ मिलकर काम करने की जरूरत है।” 

अंत में, वह कहती हैं कि उन्हें अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है और इसलिए, वह हमेशा लोगों से सुझाव और मदद की अपील करती हैं। अगर आप अपने आसपास, ऐसे दिव्यांग बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए जोश फाउंडेशन से संपर्क कर सकते हैं। इसके लिए, आप देवांगी दलाल को devangi.dalal@yahoo.co.in पर ईमेल कर सकते हैं। 

संपादन- जी एन झा

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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