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इन युवाओं की थिएटर को करियर विकल्प के तौर पर आम जन से जोड़ने की पहल अब रंग ला रही है!

“अपने अंदर की कला से प्रेम कीजिये न कि कला में रहते हुए खुद से” – कोन्सटेनटिन स्टेनीस्लावस्की (रुसी थिएटर कलाकार) की कही हुई यह बात आज बहुत से रंगमंच कलाकारों पर सटीक बैठती है।

कुछ ऐसे उभरते कलाकार जो बस अपनी कला को अपने अंदाज में दर्शकों के दिलों तक पहुंचाना चाहते हैं, जो बस अपने तरीके का थिएटर करना चाहते हैं… ऐसे ही एक थिएटर आर्टिस्ट हैं राजीव रंजन। 23 वर्षीय राजीव ने साल 2014 में अपने एक दोस्त मदन मोहन आर्य के साथ मिलकर पटना में ‘इंडीपेन्डेन्ट थिएटर’ यानि कि ‘स्वतंत्र रंगमंच’ की शुरुआत की।

“मैंने कई सालों तक अलग-अलग थिएटर ग्रुप के साथ काम किया। लेकिन एक वक़्त के बाद हम थिएटर नहीं कर रहे थे। बल्कि ऐसा लगता था कि कोई राजनैतिक एजेंडा पूरा हो रहा हो। मैं केवल अपने तरीके से नाटक करना चाहता था। जिसमे किसी तरह का कोई बंधन हो,” राजीव ने बताया।

इंडीपेन्डेन्ट थिएटर कोई संस्था या समूह नहीं है। इसमें कोई स्थायी टीम नहीं है। बल्कि इंडीपेन्डेन्ट थिएटर एक जरिया है किसी भी कलाकार के लिए जो अपना काम या कला लोगों को प्रदर्शित करना चाहता है। इंडीपेन्डेन्ट थिएटर का मतलब अकेले काम करना नहीं बल्कि स्वतंत्र रहते हुए काम करना है।

राजीव कहते हैं,

“स्वतंत्र रंगमंच एक खास तरह का रंगमंच है, जिसमें हम बिना किसी संस्था के स्वतंत्र रूप से नाटकों का मंचन करते हैं। एक ऐसा मंच जहां हर कलाकार अकेले रंगकर्म (नाटक) करने में सक्षम हो, जैसे ‘वन मैन आर्मी।’ जब भारत में करोड़ों लोग एक साथ रहते हुए भी स्वतंत्र हो सकते हैं, तो कलाकार समूह में रहते हुए भी क्यों स्वतंत्र नहीं हो सकते? जब भी कोई स्वतंत्र रंगमंच की बात सुनता है, तो उसे लगता है कि हम केवल एक या दो लोगों की बात कर रहें हैं। लेकिन ऐसा नहीं है! हम भी यहां पर 10 से 20 कलाकारों के साथ काम करते हैं पर उन सबकी अपनी एक पहचान के साथ।”

इंडीपेन्डेन्ट थिएटर उस प्यार की बात करता है, जो कलाकारों को एक-दूसरे से बांधता नहीं है बल्कि जोड़ता है। यह एक ऐसा मंच है जहां कोई भी कलाकार अपने व्यक्तिगत मूल्यों को अपने साथ रखते हुए काम करता है।

राजीव बिहार के मुज्जफरपुर जिले के गायघाट ब्लॉक के रामनगर गांव से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता सरकारी शिक्षक रहे हैं। राजीव ने ग्रेजुएशन तक अपनी पढ़ाई पटना से पूरी की। थिएटर के साथ अपने जुड़ाव के बारे में राजीव बताते हैं,

“मेरे बचपन में हमारे गांव में त्यौहार के समय नाटक हुआ करते थे, जिसमें मेरा परिवार भी भाग लिया करता था। बस वहीं से नाटकों में मेरी दिलचस्पी बढ़ी। बाद में, पटना आने के बाद मैं कई थिएटर ग्रुप से जुड़ गया। मैंने पटना में काफी बड़े थिएटर ग्रुप के साथ काम किया है।”

साल 2016 में राजीव ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के थिएटर आर्ट्स डिपार्टमेंट में मास्टर्स में दाखिला लिया। अभी वे अपने कोर्स के आखिरी साल में हैं और निर्देशन (डायरेक्शन) में स्पेशलाइजेशन कर रहे हैं।  2016 में ही मदन भी अपनी पढ़ाई के लिए वर्धा चले गए।

जब राजीव और मदन ने इंडीपेन्डेन्ट थिएटर शुरू किया, तब सिर्फ वही दोनों थे। उनके लिए बिना किसी संस्था या समूह से जुड़े बिना अकेले पटना के गाँधी मैदान में नाटक करना और लोगों को नाटक देखने के लिए आकर्षित कर पाना आसान नहीं रहा। उन्होंने इंडीपेन्डेन्ट थिएटर के तले सबसे पहला नाटक, ‘तो कालिदास भी मारे जाते’ किया।

‘तो कालिदास भी मारे जाते’ नाटक की प्रस्तुति करते हुए राजीव व मदन

“थिएटर की मजबूती यही है कि आप हमेशा समूह में होते हैं। अगर आप लड़खड़ाते हैं, तो दूसरा आपको संभाल लेता है। लेकिन ऐसे में अक्सर आप अपनी व्यक्तिगत पहचान खो देते हैं। इसलिए जब इंडीपेन्डेन्ट थिएटर शुरू किया तो केवल हम दोनों ही नाटक कर रहे थे, हम दोनों ही दर्शकों को बुला रहे थे और हम दोनों को ही प्रबंधन देखना था। उस समय वह अनुभव हमारे लिए रोंगटे खड़े कर देने वाला था। पर हमें खुशी है कि हम ये कर पाए और आज भी इंडीपेन्डेन्ट थिएटर का सिलसिला जारी है,” राजीव ने बताया।

भारत में थिएटर को वैसे भी कोई करियर विकल्प न मानकर एक्स्ट्रा-करीकुलर की तरह देखा जाता है। आज भी हमारे यहां कला में लोगों को कोई भविष्य नहीं नजर आता। न केवल माता-पिता बल्कि स्कूलों में भी बच्चों की कलात्मक रूचि को प्रोफेशनल स्तर पर बढ़ावा नहीं दिया जाता है।

‘समरथ को नहीं दोष गोंसाई’ नाटक के दौरान विभिन्न भूमिकाओं में राजीव रंजन

ऐसे माहौल में सबसे बड़ी समस्या है – थिएटर में रहते हुए पैसे कमाना। क्योंकि लोगों की यही विचारधारा है कि नाटक है तो फ्री में होगा। बहुत कम लोग टिकट खरीदकर नाटक देखने जाते हैं। इसलिए थिएटर ग्रुप और आर्टिस्ट सभी स्पॉन्सरशिप या डोनेशन पर निर्भर रहते हैं।

“हमारे पास कोई बड़ा नाम नहीं था, तो पैसे जुटाना बहुत मुश्किल रहा। लेकिन हमने शुरू में ही ठान लिया था, कि हम लोगों को नाटक दिखाने के लिए अपना पैसा नहीं लगायेंगें। क्योंकि ऐसा हम लम्बे समय तक नहीं कर सकते हैं और एक दिन थककर हम शायद नाटक छोड़ देते। इसलिए हमने स्पॉन्सरशिप का रास्ता अपनाया।”

राजीव और मदन ने जो पहल एक्सपेरिमेंट के तौर पर शुरू की थी, वह रंग लायी। धीरे-धीरे और भी रंगमंच-कर्मी उनसे जुड़ने लगे। पिछले दो सालोँ से राजीव और मदन पटना से दूर हैं और केवल गर्मी की छुट्टियों में ही जा पाते हैं। ऐसे में उनके अन्य साथी कलाकार राहुल सिंह ने इंडीपेन्डेन्ट थिएटर को पटना में जीवित रखा है।

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हर साल मजदूर दिवस पर स्वतंत्र रंगमंच ‘हम मेहनतकश’ नाटक प्रस्तुत करता है
‘साधो, देखो जग बैराना’ की प्रस्तुति

पुरे साल वे इंडीपेन्डेन्ट थिएटर करते हुए बच्चों के साथ थिएटर वर्कशॉप, नुक्कड़ नाटक आदि भी करते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने पटना शहर में हर रविवार, “जरा-सा आओ ना, बैठो वतन की बात करें” थीम के साथ नुक्कड़ नाटक करना शुरू किया। इसके अलावा उनकी एक दूसरी नाटकीय पहल, “साधो, देखो जग बैराना” है। उन्होंने अब तक बहुत से नाटकों का मंचन किया है, जिनमें शामिल हैं- कुत्ते की मौत, धुंआ, समरथ को नहीं दोष गोंसाई आदि।

इसके अलावा हर साल उनका दो या तीन दिन का वार्षिकोत्सव होता है, जिसमे वे पटना के कालिदास रंगालय ऑडिटोरियम में नाटक प्रदर्शित करते हैं। पिछले साल राजीव द्वारा निर्देशित ‘स्पार्टाकस’ का मंचन किया गया।

“मैं और मदन हमेशा यह कोशिश करते हैं कि हमारे नाटक की लागत कम से कम हो। हम अपने नाटक को जितना हो सके किफ़ायती लेकिन फिर भी शानदार और भव्य रखने की कोशिश करते हैं। क्योंकि परिस्थिति जो भी हो लेकिन थिएटर गरीब नहीं लगना चाहिए,” – राजीव

पिछले साल किये गए ‘स्पार्टाकस’ नाटक की तैयारी के दौरान

रंगमंच के कलाकारों के अलावा थिएटर में सबसे ज्यादा जरूरी हैं दर्शक। दर्शकों को ऑडिटोरियम तक लाना और उन्हें नाटक देखने के लिए बिठाये रखना आसान नहीं। वह भी आज के डिजिटल जमाने में जहां हर पल लोगों के पास मनोरंजन के साधन बढ़ रहे हैं।

राजीव कहते हैं कि दर्शकों को इकट्ठा करना, खासकर की पटना शहर में बहुत मुश्किल हो जाता है। वे 500 से भी ज्यादा फ्री-पास बांटते हैं, इसके अलावा 40-50 वीआईपी कार्ड जाते हैं। और लोगों को हर तरीके से नाटक के बारे में खबर पहुंचाई जाती है। लगभग 3000 लोगों तक पहुंचकर वे उन्हें नाटक के लिए आमंत्रित करते हैं। तब जाकर कहीं 500 दर्शक नाटक देखने आते हैं। वह भी बिना किसी टिकट और पैसे के।

थिएटरौन 2018 में राजीव द्वारा निर्देशित ‘कैलिगुला’ नाटक का एक दृश्य

हालांकि, इस साल से उन्होंने अपने तीन-दिवसीय रंग-महोत्सव ‘थिएटरौन’ से एक नयी शुरुआत की है। थिएटरौन में राजीव द्वारा निर्देशित दो नाटक ‘कैलिगुला,’ ‘गहरे धब्बे’ व मदन द्वारा निर्देशित नाटक ‘तमस्विनि’ का मंचन हुआ। उन्होंने इस साल फ्री-पास की जगह टिकट के साथ नाटक में एंट्री रखी। ‘बुक माय शो’ के जरिये लोगों को टिकट बुक करके नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया।

थिएटरौन 2018 में मदन मोहन द्वारा निर्देशित ‘तमस्विनी’ नाटक का एक दृश्य

राजीव ने बताया कि इस साल टिकट के चलते दर्शकों की संख्या में कमी रही लेकिन फिर भी वे 500 सीट वाले ऑडिटोरियम में हर दिन लगभग 350 लोगों को जुटाने में कामयाब रहे। आने वाले समय में थिएटर में अपने काम को लेकर राजीव कहते हैं,

“अभी भी हमने बहुत लम्बा रास्ता तय करना है। मेरे लिए तब तक थिएटर पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं होगा, जब तक कि हम स्पॉन्सरशिप या फिर डोनेशन से मुक्त न हो जाये। देश में बाकी मनोरंजन के साधन के जैसे ही थिएटर को भी कमर्शियल होने की जरूरत है। ताकि थिएटर करने के लिए पैसे थिएटर को देखने वाले दर्शकों से आये। जब हमारे लोग फिल्मों की ही तरह नाटक देखने में भी रूचि दिखाएंगे और इसके लिए भी टिकट खरीदना शुरू कर देंगे, शायद तब हम सही मायनों में स्वतंत्र होंगें।”

ख़ुशी की बात यह है कि राजीव और मदन की इस पहल को कला के क्षेत्र में लोगों ने पहचानना शुरू कर दिया है। बहुत से नए कलाकार उनसे जुड़ रहे हैं। आप राजीव और मदन के काम को उनके यूट्यूब चैनल ‘इंडीपेन्डेन्ट थिएटर’ पर देख सकते हैं। इसके अलावा आप उनसे उनके फेसबुक अकाउंटफेसबुक पेज के जरिये भी जुड़ सकते हैं।

पिछले साल दिखाए गए नाटक ‘स्पार्टाकस’ की एक झलक देखें –


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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