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कप्तान हनीफ उद्दीन: वह कारगिल हीरो जिसने अपने सैनिकों को बचाने के लिए दी अपनी कुर्बानी!

“एक पल में है सच सारी ज़िन्दगी का, इस पल में जी लो यारों, यहां कल है किसने देखा”

ये पंक्तियाँ कारगिल में शहीद हुए कप्तान हनीफ उद्दीन के छोटे भाई समीर ने लिखी थीं और अक्सर हनीफ इन्हें गुनगुनाते थे। लेकिन ये चंद शब्द हनीफ के जीवन की सच्चाई बन गए।

दिल्ली से ताल्लुक रखने वाले, गायक और जाबांज भारतीय सैनिक हनीफ उद्दीन का जन्म 23 अगस्त, 1974 को हुआ। उन्होंने आठ साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था और उनके नफीस व समीर, दो भाई थे। उनकी माँ हेमा अज़ीज़ एक शास्त्रीय संगीत गायिका हैं जिन्होंने दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी और कथक केंद्र के लिए काम किया।

फोटो: फेसबुक

दिल्ली के शिवाजी कॉलेज से ग्रेजुएशन करने वाले हनीफ एक अच्छे गायक भी थे। आखिर यह गुण उन्हें उनकी अम्मी से विरासत में मिला। कॉलेज के दिनों में हनीफ काफी प्रसिद्द थे। वे हमेशा से इंडियन आर्मी में भर्ती होना चाहते थे।

ग्रेजुएशन के बाद बाकी सभी नौकरियों को छोड़कर वे सेना में भर्ती की तैयारी जुट गए। बिना किसी के मार्गदर्शन के उन्होंने टेस्ट पास किया और ट्रेनिंग में भी अच्छे अफसरों में अपनी जगह बनाई।

7 जून, 1997 को उन्हें राजपुताना राइफल्स की 11वीं बटालियन में सियाचिन में कमीशन किया गया। बाद में, कारगिल युद्ध के दौरान उनकी बटालियन को लद्दाख के टर्टुक में तैनात किया गया था।

हनीफ बहुत खुश मिजाज वाले इंसान थे। अक्सर वे अपने सैनिक साथियों का गाकर हौंसला बढ़ाते थे। वे हमेशा अपना म्यूजिक सिस्टम अपने साथ रखते थे। उनके साथी सैनिकों के बीच भी वे काफी मशहूर थे।

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ऑपरेशन थंडरबोल्ट (6 जून, 1999)

वे कारगिल के शुरूआती दिन थे और उस वक़्त दुश्मन के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी। 6 जून, 1999 को टर्टुक क्षेत्र में 18,000 फीट की ऊंचाई पर ऑपरेशन थंडरबॉल्ट में 11वीं राजपुताना राइफल्स की टुकड़ी तैनात की गई थी। उनका मिशन इस क्षेत्र में एक मजबूत पकड़ बनाना था जिससे सेना को दुश्मन सैनिकों की गतिविधियों की निगरानी करने में मदद मिले। इस क्षेत्र में कब्जे से सैनिकों को युद्ध के शुरुआती चरणों में रणनीतिक मदद मिल सकती थी।

इस ऑपरेशन को हनीफ ने लीड किया। उन्होंने एक जूनियर कमीशन अधिकारी और तीन अन्य रैंक अफसरों के साथ ऑपरेशन शुरू किया। उन्होंने 4 और 5 जून की रात को महत्वपूर्ण कदम उठाए और पास की जगहों पर कब्जा कर लिया। वे निरंतर आगे बढ़ रहे थे।18,500 फीट की ऊंचाई और माइनस में तापमान भी उनके इरादे नहीं डिगा पाया।

लेकिन दुश्मन ने उनकी गतिविधि भांप ली और गोलीबारी शुरू कर दी। इसके जबाव में भारतीय सेना ने भी गोलियाँ चलानी शुरू की। कप्तान हनीफ, जो खुद से ज्यादा अपने सैनिकों की सुरक्षा की फ़िक्र में थे, उन्होंने आगे बढ़कर गोलीबारी की। उन्होंने खुद सामने जाकर दुश्मन का ध्यान भटकाया ताकी उनकी सेना पास की सुरक्षित जगह पर पहुंच जाये।

दुश्मन उन पर हर तरफ से गोलियाँ बरसा रहा था। अपनी जान देकर भी कप्तान हनीफ ने अपने साथियों की जान बचाई और जिस पोस्ट को हासिल करने के लिए वे गए थे, उससे 200 मीटर की दूरी पर ही उन्होंने शहादत को गले लगा लिया!

केवल 25 वर्ष की उम्र में दो साल भारतीय सेना में सेवा करने के बाद वे शहीद हो गए। इस क्षेत्र में चल रही अत्यधिक गतिविधियों के चलते युद्ध के अंत तक भी सेना उनके मृत शरीर को नहीं ढूंढ पायी थी।

इस बहादुरी और साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से नवाज़ा गया। बेशक, कप्तान हनीफ जैसे जवान हर रोज पैदा नहीं होते। आज भी हनीफ के घर में उनके मेडल और सम्मान से सजा एक कोना उनकी बहादुरी की गाथा गाता है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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