साल 1999 में बेटा हुआ था कारगिल में शहीद, अब पोती को देखना चाहते हैं आर्मी में!

साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान मेजर पद्मपानी आचार्य,  सेकंड राजपूताना राइफल्स के कंपनी कमांडर थे। उन्होंने टोलोलिंग चोटी को हासिल करते हुए अपना बलिदान दिया। उन्हें महावीर चक्र से नवाज़ा गया।

चारुलता आचार्य छह महीने की गर्भवती थीं, जब उनके ससुर जगन्नाथ आचार्य, एक सेवानिवृत्त विंग कमांडर को 28 जून, 1999 को भारतीय सेना के एक प्रवक्ता का फोन आया था। उनके पति, मेजर पद्मपानी आचार्य,  सेकंड राजपूताना राइफल्स के कंपनी कमांडर थे और उस समय कारगिल में तैनात थे।

इस फोन कॉल से सिर्फ एक हफ्ते पहले, 21 जून को, पूरे परिवार ने मेजर पद्मपनी का 31वां जन्मदिन उनके साथ फोन पर मनाया था।

“आपका बेटा बहादुरी से लड़ा। उन्होंने इतिहास रचा है, लेकिन अब इस दुनिया में नहीं है,” सेना के प्रवक्ता ने कहा।

आचार्य परिवार में उदासी छा गयी थी। हमारे लिए तो यह कल्पना करना भी आसान नहीं कि उन पर क्या बीती होगी। हालाँकि, किसी भी सैनिक का परिवार बुरी खबरों के लिए तैयार रहता है, लेकिन इस तरह की खबर को अपनाना यकीनन मुश्किल है।

द हिंदू से बात करते हुए, उनकी मां ने कहा,

“एक मां के रूप में, मैं निश्चित रूप से दुखी होती हूं, लेकिन एक देशभक्त के रूप में, मुझे अपने बेटे पर गर्व है। मैं शायद जीवित न रहूं लेकिन वह हमेशा जीवित रहेगा। उसने मुझे वादा लिया था कि उसके शहीद होने पर मैं रोयुंगी नहीं।”

उनके हैदराबाद के घर में राखी हुई मेजर आचार्य की वर्दी/ट्विटर हरप्रीत

उनके पिता ने कहा, “इस सच को अपनाना और इसके साथ जीना मुश्किल है। लेकिन हमें उस पर गर्व है और हम उसे बहुत याद करते हैं।”

उस फ़ोन पर कहा गया था कि मेजर आचार्य ने इतिहास रचा है। उन्होंने युद्ध में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और भारत एक महीने बाद युद्ध जीत गया। उनके परिवार के लिए सबसे बड़ी बात यही है कि उन्होंने देश के लिए अपना जीवन दिया।

मेजर आचार्य और उनकी सेना को लोन हिल पर कब्जा करने और कारगिल में टोलोलिंग चोटी को पुनः प्राप्त करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। यह दोनों अभियान रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।

“28 जून, 1999 को कंपनी कमांडर मेजर पद्मपानी आचार्य को दुश्मन की पोस्ट को खत्म करने का एक बड़ा कार्य सौंपा गया था। जहां पर भारी मात्रा में माइंस, मशीन बंदूक और तोप थी। बटालियन और ब्रिगेड के संचालन की सफलता इस पोस्ट के कब्जे पर टिकी थी। लेकिन शुरुआत में ही दुश्मन ने भारतीय सेना पर तोप से हमला बोल दिया, जिससे पलटन को बहुत चोटें आयी,” एसएस गांधी ने अपनी पुस्तक ‘पोर्ट्रेट्स ऑफ वैलोर’ में लिखा।

हालाँकि, इस साहसी सैनिक को पता था कि स्थिति को संभालने के लिए क्या किया जाना चाहिए। साथ ही मेजर आचार्य यह भी जानते थे कि उनका या फिर पूरी पलटन का जीवन भी अगर न्योछावर हो जाये तो देश के आगे बहुत छोटी कीमत होगी।

गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने अपने पलटन को आगे बढ़कर टोलोलिंग चोटी को जीतने का हौंसला दिया।

मेजर आचार्य की पत्नी चारुलता व उनकी बेटी अपराजिता

“दुश्मन पोस्ट से गोलियों की बौछार के बावजूद बिना रुके मेजर आचार्य उनके बंकर और ग्रेनेड्स तक पहुंच गए। इस साहसी हमले के दौरान, वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। जिसकी वजह से वह आगे नहीं बढ़ पाए लेकिन अपनी परवाह किये बिना उन्होंने अपने सैनिकों को आगे बढ़ दुश्मन पर हमला करने के लिए कहा। उन के हौंसले और दृढ़ निश्चय के चलते दुश्मन पोस्ट को खत्म कर टोलोलिंग चोटी को फिर से हासिल किया गया। मिशन तो पूरा हो गया, लेकिन मेजर आचार्य गंभीर रूप से घायल होने के वजह से नहीं बच पाए,” एसएस गांधी कहते हैं।

आचार्य की अपने परिवार के साथ पिछली बातचीत, उनके विचार और मन की शांत स्थिति के बारे में बताती है। चोटी पर जाने से 10 दिन पहले उन्होंने व्यक्तिगत और सैन्य मुद्दों पर चर्चा करते हुएअपने पिता को पत्र लिखा था। दिल को छू जाने वाले इस खत में उन्होंने लिखा,

“प्रिय पापा, ….. चोटों के बारे में ज्यादा परेशान ना हो। यह तो हमारे काम का हिस्सा हैं और हमारे नियंत्रण से परे हैं। लेकिन कम से कम यह अच्छे कारण के लिए है।

आखिरी खत

मम्मा को बताएं कि युद्ध जीवन भर का सम्मान है और मैं कुछ भी छोटा नहीं सोच सकता। राष्ट्र की सेवा करने का और बेहतर तरीका क्या है? चारु को महाभारत की कहानियां सुनाएँ, ताकि आपके पोते/पोती को अच्छे गुण मिले।”

कारगिल युद्ध जीता जाने के बाद, उनके पिता ने भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनका यह आखिरी पत्र भेजा। प्रधान मंत्री ने युद्ध में मेजर के योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें जवाब लिखा।

मेजर आचार्य को महा वीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो उनके पिता द्वारा प्राप्त किया गया था। प्रधान मंत्री वाजपेयी ने कमांडर (सेवानिवृत्त) आचार्य को गर्मजोशी से बधाई दी, और वे तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर नारायणन से भी मिले।

मेजर आचार्य की बहादुरी ने अपने परिवार पर एक स्थायी प्रभाव डाला- जो देशभक्ति, गर्व और प्रोत्साहन से भरा हुआ है। उनकी बेटी, जिसका नाम अपराजिता नाम रखा गया, मतलब जिसे जीता न जा सके, अब 19 साल की है। यह युवा लड़की अपने पिता की साहसी कहानियों को सुनकर बड़ी हुई है और उन सभी को उसने कॉफी टेबल बुक में संकलित कर लिया है।

अपनी पोती के भविष्य के बारे में पूछने पर कमांडर (सेवानिवृत्त) आचार्य कहते हैं, “अब जब भारतीय सेना ने महिलाओं के लिए अपने द्वार खोले हैं, तो मुझे ख़ुशी होगी यह देखकर कि मेरी पोती इसका हिस्सा बने।”

मूल लेख: तन्वी पटेल


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे।

We at The Better India want to showcase everything that is working in this country. By using the power of constructive journalism, we want to change India – one story at a time. If you read us, like us and want this positive movement to grow, then do consider supporting us via the following buttons:

X