Search Icon
Nav Arrow
King Of Jackfruits

मिलिए ‘किंग ऑफ जैक फ्रूट’ से, इनके खेत में मिलेंगी कटहल की 75 प्रजातियां

महाराष्ट्र के रत्नागिरी के रहने वाले हरिश्चंद्र देसाई अपनी 13 एकड़ जमीन पर कटहल की खेती करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर कटहल उगाने वाले वह राज्य के एकमात्र किसान हैं। लोग प्यार से उन्हें किंग ऑफ जैक फ्रूट के नाम से पुकारते हैं। पढ़िए उनकी प्रेरक कहानी!

Advertisement

महाराष्ट्र का कोंकण क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध आम, अल्फांसों की खेती के लिए जाना जाता है। लेकिन, यहाँ के एक किसान ने आम के बजाय, कटहल की खेती शुरू कर, एक अलग पहचान हासिल की।

यह कहानी है रत्नागिरि के लांजा तालुका के जापाड़े गाँव के रहने वाले हरिश्चंद्र देसाई की, जिन्होंने अपनी 13 एकड़ जमीन कटहल की खेती को समर्पित कर दी। वह राज्य के एकमात्र किसान हैं, जो इतने बड़े पैमाने पर इसकी खेती करते हैं।

60 वर्षीय हरिश्चंद्र का मानना है कि कटहल (मराठी में फनस) की खेती यहाँ के किसानों की तकदीर को हमेशा के लिए बदल कर रख सकती है। वह कहते हैं, “हर वर्ष, जून में वट पूर्णिमा से कुछ दिन पहले, व्यापारी यहाँ कटहल लेने आते हैं। इससे हमें प्रति फल 5 रुपए से लेकर 10 रुपए तक मिलते हैं, लेकिन मैं इसे बदलना चाहता हूँ।”

वह कहते हैं कि किसान इससे प्रति फल 100 से 200 रुपए तक कमा सकते हैं, जैसा कि कर्नाटक के टोबुगेरे गाँव में कटहल उत्पादकों के संघ के गठन के बाद हुआ था। यह अपनी तरह का, देश का पहला और एकमात्र संघ है, जिसका बाजार से सीधा जुड़ाव है।

हरिश्चंद्र का गाँव, लांजा से 4 किमी दूर है और यहाँ की आबादी करीब 600 है। रत्नागिरी के अधिकांश गाँवों की तरह, यहाँ आम, नारियल, काजू, जायफल, सुपारी, चावल जैसी फसलों की खेती होती है। यहाँ कटहल की खेती का ज्यादा चलन नहीं है, कुछ लोग इसके पेड़ को सिर्फ अपने इस्तेमाल के लिए लगाते हैं।

कटहल – भविष्य का फल

यहाँ दो तरह के कटहल की खेती होती है – सॉफ्टर रसाल और फिरमर कापो।

कच्चे कटहल का इस्तेमाल फनसाची भाजी (कटहल की सब्जी) बनाने के लिए किया जाता है। जबकि, पके फल को बेचा जाता है। इसे उगाने में ज्यादा रखरखाव की जरूरत नहीं पड़ती है।

शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि यह फल गेहूँ, मकई और अन्य मुख्य फसलों के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। इसे लेकर केरल कृषि विश्वविद्यालय के डॉ. पी. राजेंद्रन कहते हैं कि कटहल के पेड़ सोलर इफिशन्ट होते हैं। ये हर पाँच साल में मिट्टी में 12 फीसदी तक जैविक कार्बन की वृद्धि करते हैं, जो 40 टन कार्बन के बराबर है।

आज कटहल पश्चिमी देशों में शाकाहार को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है, लेकिन गंध के कारण देश में इसे कभी लोकप्रियता नहीं मिली।

King Of Jackfruits
हरिश्चंद्र देसाई के बेटे मिथिलेश

माना जाता है कि कटहल की उत्पत्ति पश्चिमी घाटों के सदाबहार वर्षावनों से हुई। आज कटहल की खेती तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों में भी की जाती है।

यह दुनिया के सबसे बड़े फलों में से एक है। देश के विभिन्न हिस्सों में इसके अलग-अलग नाम हैं। उदाहरण के तौर पर, मलयालम में इसे चक्का, मराठी में फनस, हिन्दी में कटहल, बंगाली में इचोर, जबकि कन्नड़ में हलासु, कुजी या हलासिना हनु कहा जाता है।

इस बहुमुखी फल को देश के हर हिस्से में अलग-अलग तरीके से तैयार किया जाता है। कहीं इसे सिर्फ भून कर खाया जाता है, तो कहीं इसे ग्रेवी के साथ सर्व किया जाता है। इससे मधुमेह रोगियों के लिए मन्ना भी तैयार किया जाता है।

कैसे करते हैं खेती 

हरिश्चंद्र का खेत बेनी नदी के किनारे है। वह अपने खेती कार्यों में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं। कटहल के साथ वह नींबू, अदरक और हल्दी की भी खेती करते हैं।

वह कहते हैं, “मैं यह साबित करना चाहता हूँ कि ड्रिप इरिगेशन सिस्टम के जरिये भी कटहल की खेती की जा सकती है। मैंने इस प्रणाली को खेती में मजदूरों की अनुपलब्धता के कारण अपनाया है।”

किंग ऑफ जैक फ्रूट

महाराष्ट्र में कटहल की खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, हरिश्चंद्र ने अपनी एक नर्सरी भी शुरू की है। लॉकडाउन के दौरान, उन्होंने सांगली, नासिक, पुणे, पानशेत, कराड और सतारा के किसानों को करीब 3,000 पौधे बेच डाले और बिक्री के लिए 10,000 से अधिक पौधों को तैयार कर रहे हैं।

मैं किसानों को स्थानीय जलवायु के अनुसार कटहल लगाने की सलाह देता हूँ। क्योंकि, कटहल के जिस किस्म को रत्नागिरी में उगाया जाता है, वह कराड जैसे शुष्क क्षेत्र के लिए उपयुक्त नहीं होगा।”

वह आगे कहते हैं, “पेड़ क्षैतिज (हॉरिजेंटल)  दायरे में जितना बढ़े उतना अच्छा है। ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) रूप में, इसे 12 से 15 फीट ज्यादा न बढ़ने दें। इससे फलों को पकने में आसानी होती है।”

आज उनके पास कटहल की 75 प्रजातियाँ हैं और उन्होंने इन्हें सुपर फैंसी, जलभोग राजा, चंपादक, सिंगापुरी, वियतनाम सीडलेस, जे 33, मिल्की व्हाइट, मैडागास्कर गोमलेओस, रामचंद्र, कौडिसिंगना कचहल्ली जैसे नाम दिए हैं। 

Advertisement

उन्होंने एक और खास किस्म के कटहल को विकसित किया है, जिसे उन्होंने देसाई कप्पा नाम दिया है। यह उनका सबसे पसंदीदा कटहल है। यह के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। 

इसके अलावा, वह किसानों का फलों के टीएसएस (टोटल सॉल्यूबल सॉलिड्स) को लेकर भी किसानों का मार्गदर्शन करते हैं। उनके पास कई ऐसे पेड़ हैं, जिसमें टीएसस का स्तर 15 से 30 प्रतिशत के बीच है।

रत्नागिरी के जिला अस्पताल के कर्मचारी रह चुके हरिश्चंद्र ने देशी किस्म के साथ-साथ, थाईलैंड, श्रीलंका, मलेशिया और वियतनाम जैसे देशों से भी कटहल की प्रजातियों को लगाया है। 

उनकी 13 एकड़ जमीन पर, 1,250 से अधिक पेड़ लगे हुए हैं, जो अलग-अलग मौसम में फलते हैं। वह अपनी शेष 10 एकड़ जमीन पर काजू की खेती करते हैं।

खास बात यह है कि साल 2017 में, वह केरल के वायनाड में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय जैकफ्रूट महोत्सव में भाग लेने वाले महाराष्ट्र के एकमात्र किसान थे।

कटहल की खेती के प्रति उनके जुनून को देखते हुए उन्हें “फनसाचे राजा (किंग ऑफ जैक फ्रूट – कटहल के राजा)” के नाम से जाना जाता है। उन्हें अपने कार्यों में अपने बेटे मिथिलेश (28 वर्ष) की भी मदद मिलती है।

मिथिलेश ने एग्री इंजीनियरिंग की है और वह प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे, लेकिन एक किसान बनने के लिए उन्होंने अपने सपने को पीछे छोड़ दिया।

हरिश्चंद्र के अनुसार, एक कटहल के पेड़ से हर साल करीब 200 फल होते हैं, जबकि पुराने पेड़ से करीब 500 फल होते हैं। जिससे उन्हें लाखों की कमाई होती है। इसके लिए उन्हें न तो कोई खास मेहनत करने की जरूरत पड़ती है, न ही कोई उर्वरक या कीटनाशक देने की। 

वह कहते हैं, “हमें सिर्फ फसल की कटाई के दौरान अतिरिक्त मजदूरों की जरूरत पड़ती है।”

शुरू की अपनी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी

हरिश्चंद्र ने क्षेत्र में कटहल की खेती को बढ़ावा देने के लिए अपनी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की भी शुरुआत की, जिससे फिलहाल करीब 500 किसान जुड़े हुए हैं।

श्री पाद्रे, जो कि आधिके पत्रिके के संपादक हैं और इस विषय में गहन जानकारी रखते हैं। 

वह कहते हैं, “हरिश्चंद्र ने तब कटहल की खेती शुरू की, जब कोंकण क्षेत्र में कोई भी किसान इसके बारे में गंभीरता से नहीं सोच रहा है। उन्होंने लोगों के समक्ष एक उदाहरण पेश किया है कि इससे लाभ कमाया जा सकता है।”

वह आगे कहते हैं, “कटहल की व्यवस्थित खेती और बेहतर मार्केटिंग किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि हरिश्चंद्र के इस प्रयास में उनके बेटे का भी भरपूर साथ मिल रहा है।”

मूल लेख – हिरेन कुमार बोस

संपादन – जी. एन. झा

यह भी पढ़ें – झारखंड: नौकरी छोड़, शुरू की फूलों की खेती, आमदनी हुई दोगुनी

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें।

Advertisement
close-icon
_tbi-social-media__share-icon