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Gerbera Farming

झारखंड: नौकरी छोड़, शुरू की फूलों की खेती, आमदनी हुई दोगुनी

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के गोहला गाँव के रहने वाले मधु हांसदा ने नौकरी छोड़, जरबेरा फूल की खेती शुरू की, जिससे उनकी कमाई दोगुनी हो गई है।

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मधु हांसदा झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के गोहला (Gohla) गाँव के रहने वाले हैं। वह एक ग्राम रोजगार सेवक के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन उन्होंने अपनी नौकरी छोड़, फूलों की खेती करने का मन बनाया। जिससे आज वह अपनी नौकरी के मुकाबले कहीं अधिक कमा रहे हैं।

48 वर्षीय मधु बताते हैं, “मैं पिछले 12 से अधिक वर्षों से रोजगार सेवक के रूप में काम कर रहा था। लेकिन, कम वेतन मिलने के साथ-साथ मुझे पैसे भी समय पर नहीं मिलते थे। ऐसे में, अपने चार बच्चों, माँ और पत्नी की देखभाल करना, मेरे लिए काफी मुश्किल हो जाता था।”

इसी जद्दोजहद में, उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ कुछ अलग करने पर विचार किया। इसी कड़ी में साल 2020 के मध्य में, उन्हें एक अखबार के जरिये, सरकार द्वारा फूलों की खेती को बढ़ावा देने की योजना के बारे में पता चला।

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मधु हांसदा

इसके बाद, उन्होंने जिला उद्यान विभाग में, इसके लिए आवेदन कर दिया। आवेदन स्वीकृत होने के बाद, उनके 0.25 एकड़ जमीन पर, एक शेडनेट (छाया जाल) विकसित किया गया। जहाँ वह जरबेरा फूल की खेती करते हैं।

वह कहते हैं, “इस पूरे सेटअप को विकसित करने में करीब 5.6 लाख रुपये खर्च हुए। लेकिन संबंधित विभाग से पूरा अनुदान मिला और मेरा एक रुपया खर्च नहीं हुआ।”

दरअसल, मधु को झारखंड बागवानी मिशन के तहत शुरू किये गए प्रोटेक्टेड कल्टीवेशन फ्लावर स्कीम से इसके लिए सब्सिडी मिल गयी थी।

यहाँ शेडनेट बनाने का काम अगस्त 2020 में शुरू हुआ और अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में पूरा हुआ। फिलहाल, मधु के पास पीला, सफेद, गुलाबी, नारंगी जैसे रंगों में जरबेरा के 3,200 से अधिक पौधे हैं और इससे उन्हें हर महीने करीब 20 हजार की कमाई होती है।

वह कहते हैं कि उन्हें अपने इस प्रयास में, मिथिलेश कालिंदी जैसे अधिकारियों की भी पूरी मदद मिली। 

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जरबेरा का फूल

पूर्वी सिंहभूम में फूलों की खेती को लेकर, जिला उद्यान अधिकारी मिथिलेश कहते हैं, “पूर्वी सिंहभूम, खासकर जमशेदपुर में फूलों का काफी अच्छा बाजार है। यहाँ अधिकांश फूल बेंगलुरु से मंगाए जाते हैं। इसी को देखते हुए, हमने सोचा कि यदि किसानों को प्रेरित किया जाए तो काफी अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं।”

वह कहते हैं, “आज की परिस्थितियों को देखते हुए, किसानों को अपनी खेती में विविधता लानी जरूरी है। इससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। अभी तक हमें काफी अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं। साल 2020 में, कुल 12 किसानों के यहाँ 1000 वर्ग मीटर के शेडनेट लगाए गए। ये सभी किसान पहले धान या सब्जी की खेती करते थे। हमें उम्मीद है, आने वाले कुछ महीनों में इसकी गति और बढ़ेगी।”

क्या है जरबेरा फूल की खासियत

मधु बताते हैं कि यह एक सजावटी फूल है। यदि इसके तने को पानी में भिगोकर रखा जाए तो फूल 15 दिनों तक ताजा रह सकते हैं। इसी वजह से, इसका इस्तेमाल गिफ्ट और सजावट के लिए किया जाता है।

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वह बताते हैं, “शादियों के सीजन में, मैं अपने एक फूल को लगभग 10 रुपये में बेचता था। लेकिन, माँग हमेशा एक जैसी नहीं रहती है। फिलहाल, मैं अपने एक फूल को चार से पांच रुपये में बेचता हूँ। लेकिन, कोरोना काल के बाद स्थिति जैसे-जैसे सामान्य होगी, बाजार में फूलों की माँग बढ़ने के बाद, मूल्यों की दर बढ़ती जाएगी।”

क्या होती है समस्या

मधु बताते हैं कि वह अपने फूलों को जमशेदपुर में बेचते हैं, जो उनके घर से करीब 60 किमी दूर है। माली उनके फूल को लेने के लिए, कई बार घर तक आ जाते हैं और कई बार नहीं भी आते हैं।

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वह कहते हैं, “हम फूल तो उगा लेते हैं। लेकिन, कई बार इसे खरीदने के लिए कोई नहीं आता है। ऐसे में, अपने फूलों को बेचने के लिए हमें बाजार जाना पड़ता है, जो यहाँ से 60 किमी दूर है। इस दौरान हमें फूलों को बस में लेकर जाने में काफी दिक्कत होती है।”

पूरा परिवार देता है साथ

शेडनेट में काम करती मधु की पत्नी और बच्चे

मधु बताते हैं कि जरबेरा का पौधा काफी संवेदनशील होता है और थोड़ी सी भी लापरवाही से इसमें कई खराबियां आ जाती हैं। यही कारण है कि इसके रखरखाव के लिए, उनकी माँ और पत्नी भी उनका पूरा साथ देती हैं। ताकि मजदूरी के पैसे बच सकें और लाभ अधिक हो। 

कई बार काम अधिक होने पर, वह चार-पांच स्थानीय कामगारों की भी मदद लेते हैं।

कैसे करते हैं फूलों की खेती

मधु ने अपने फूलों की खेती के लिए ‘ड्रिप इरिगेशन सिस्टम’ को अपनाया है। इसके अलावा, वह नीम और आक को पानी में एक हफ्ते तक भिगोकर रखने के बाद, कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

बागवानी करते मधु

साथ ही, वह सुनिश्चित करते हैं कि पौधों के आस-पास घास न हो और पौधों को बेहतर पोषण मिले।

क्या है भविष्य की योजना

मधु बताते हैं कि उनके पास पाँच एकड़ जमीन है, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता को देखते हुए, उस पर खेती करना कठिन है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए, वह जल्द ही मछली पालन और पशु पालन में अपना हाथ आजमाने के साथ ही, बड़े पैमाने पर बागवानी करने की योजना बना रहे हैं।

संपादन – प्रीति महावर

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