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कुत्ता दिनों की छायाएँ, बिल्ली दिनों के अंदाज़!

यह एक अंश है श्रीकांत वर्मा की कविता 'मायादर्पण' का!

मेरे पास है कुछ कुत्ता-दिनों की
छायाएँ
और बिल्ली-रातों के
अंदाज हैं।

मैं इन दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मैं अपने दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मेरे लिए तुमसे भी बड़ा
यह सवाल है।
यह एक चाल है;
मैं हरेक के साथ
शतरंज खेल रहा हूँ
मैं अपने ऊलजलूल
एकांत में
सारी पृथ्वी को बेल रहा हूँ।

मैं हरेक नदी के साथ
सो रहा हूँ
मैं हरेक पहाड़
ढो रहा हूँ।
मैं सुखी
हो रहा हूँ
मैं दुखी
हो रहा हूँ
मैं सुखी-दुखी होकर
दुखी-सुखी
हो रहा हूँ..

[यह एक अंश है श्रीकांत वर्मा की कविता ‘मायादर्पण’ का]

चाहता तो हूँ कि यह स्तम्भ मेरी आपसे बात न हो कर आपकी अपने आपसे बात का एक बहाना बने. यह मनोरंजन के लिए नहीं है. हाँ मनोरंजक हो सकता है कभी. असल ‘मनोरंजन के बिना कोई क्यों पढ़े, अपना वक़्त ज़ाया करे?’ की सतही सोच के बारे में क्या ही कहा जा सकता है. अथवा ‘आप कहिए, हम सुन तो रहे हैं न’ भी उतना ही ऊलजुलूल और अनुपयोगी है. वार्तालाप वही काम का है जो आपका अपनेआप से होना है. और कविता का काम ही यही है कि आपको आप से मिलवाये. तो आज की इंटरनेट-संचालित तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में आपसे अनुरोध किया जाए कि आप हमारे साथ धीरे-धीरे चलें थोड़ी देर?

ठीक है?
ठीक है फिर – बतलाइए वो ‘कुत्ता दिन’ याद हैं आपको? वैसे किन दिनों को ‘कुत्ता’ दिन कहेंगे आप और किनको ‘बिल्ली’ दिन? और बिल्ली दिनों के अंदाज़ क्या थे हुज़ूर? ‘कुत्ता दिन’ मेहनतकशी के दिन थे? प्रताड़ित होने के दिन थे? किस बात की प्रतारणा? कौन सी लड़ाई लड़ी जा रही थी? ये दिन अच्छे थे या बुरे थे? जो भी थे उनमे से शायद आप एक हीरो बन कर निकले थे? अब वो दिन फिर से आएँगे? वो दिन कभी गए ही नहीं?

और बिल्ली दिनों के अंदाज़? जब आप जीजाजी को छेड़ती थीं और दीदी का सर गोद में रख कर दिलासा भी देती थीं? या अपने बच्चे, माँ-बाप, नौकरी-पानी सब हँसते-खिलते संभाल लेती थीं? या पापा से झूठ बोल कर वैलेंटाइन्स डे मनाया था, या आप पापा हैं तो इस दिन के पहले अपनी बेटियों को बिठा कर एक अपनी पूरी चतुरता से एक इमोशनल डोज़ दिया था.

जो भी आपके बिल्ली दिन हों, जो भी उनके अंदाज़ हों – साहेबान, एक कविता का काम आपको अपनी ज़िन्दगी (हो गयी / चल रही / होने वाली) की सैर करवाना है – जो इस कविता ‘मायादर्पण’ के बहाने भी बख़ूबी पूरा हो सकता है बशर्ते आप इजाज़त दें. कुछ और मिल जाए तो भली बात है, वैसे अपने आपको ढूँढ़ें इस कविता में 🙂

लीजिये पेश है:

लेखक –  मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.


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