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93 की उम्र में भी जैविक खेती कर खुद उगाते हैं अपना खाना, बाजार से खरीदते हैं सिर्फ नमक

93 की उम्र में भी जैविक खेती कर खुद उगाते हैं अपना खाना, बाजार से खरीदते हैं सिर्फ नमक

केरल के रहने वाले 93 वर्षीय चिदंबरम नायर एक सेवानिवृत्त शिक्षक और जैविक किसान हैं, जो काफी समय से जैविक खेती कर रहे हैं, और अपने घर के लिए लगभग सभी खाने की चीज़े खुद उगाते हैं!

केरल के कोड़िकोड में रहने वाले 93 वर्षीय चिदंबरम नायर, इस उम्र में भी अपने खेतों को खुद संभाल रहे हैं। वह अपनी फिटनेस (fitness tips) का पूरा श्रेय भी, खेती को ही देते हैं। नायर का कहना है, “दुनिया में सभी चीज़ों की नींव कृषि है। जिस दिन हम इस तथ्य को भूल जायेंगे, हमारा पतन शुरू हो जाएगा।” मिट्टी की खुशबू को, वह अपने लिए प्रेरणा मानते हैं। 

कृषि के लिए उनका प्रेम, बचपन से ही काफी ज़्यादा रहा है। पहले उनके घर में एक छोटा-सा गार्डन हुआ करता था। वहीं से धीरे-धीरे, उनका गार्डनिंग का शौक कृषि में बदल गया। वह अपने माता-पिता की एक वीरान ज़मीन पर खेती करने लगे। इसके बाद, उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

वह याद करते हुए बताते हैं, “मैंने एक प्राथमिक स्कूल में 27 वर्ष तक बतौर शिक्षक काम किया। उस समय, मैं स्कूल जाने से पहले, सुबह 9 बजे तक खेतों में काम करता था। फिर जब स्कूल की छुट्टी होती तो बच्चे अपने घर भागते थे, और मैं अपने खेतों पर।”

नायर ने अपनी 7 एकड़ ज़मीन पर 350 से ज़्यादा नारियल के पेड़ लगाए हुए हैं। वह सब्ज़ियाँ और फल भी उगाते हैं। इनमें केला, टमाटर, अरबी, मिर्च, और धान आदि शामिल हैं। इस उपज में से वह कुछ अपने घर के लिए रखते हैं, और बाकी पास के बाजार में बेच देते हैं। 

नायर जैविक खेती करते हैं तथा उनका कहना है कि, इसमें सामान्य खेती से ज़्यादा मेहनत होती है। इसमें आपको मिट्टी खुद तैयार करनी होती है, और प्राकृतिक उर्वरक व ‘पेस्टिसाइड’ भी खुद ही बनाने होते हैं। वह कहते हैं, “जैविक कचरे का उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य को अच्छा करता है। इससे प्रदूषण कम होता है, पानी के संरक्षण में मदद होती है, मिट्टी का क्षरण रुकता है, और उर्वरकता बढ़ती है। मैं खेती के लिये, किसी भी तरह के रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करता हूँ। खाद के लिए,  गोबर, जैविक खाद और मूंगफली की खली का इस्तेमाल करता हूँ।”

जीते हैं सादा जीवन:

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अपनी दिनचर्या के बारे में वह कहते हैं, “मैं रात में 8:30 बजे सो जाता हूँ और सुबह छह बजे उठता हूँ। नहाने के बाद मैं सीधा खेतों पर जाता हूँ, और सिर्फ खाने और सोने के लिए घर आता हूँ। मेरा बाकी समय भी खेती में ही जाता है।”

वह बताते हैं कि, इस उम्र में भी इतना उर्जावान होने का राज, उनका शाकाहारी होना है। वह बहुत ज़्यादा तेल में पके हुए खाने तथा जंक फ़ूड खाने से भी बचते हैं। वह रसोई में पारंपरिक व्यंजन बनाने में अपनी पत्नी की मदद करते हैं। 

नायर के बेटे, राधाकृष्णन बताते हैं, “मुझे चावल की खीर और अवियल (10 सब्ज़ियों से बना व्यंजन) बहुत ज़्यादा पसंद है। वह ध्यान रखते हैं कि, खीर में चीनी बिल्कुल भी ज़्यादा न हो। जब हम अवियल खाते हैं तो वह यह भी देखते हैं कि, हम इसमें पड़ी सभी सब्ज़ियां खाएं।”

उन्होंने आगे बताया, “मैंने बचपन से ही अपने पिता को खेतों में काम करते हुए देखा है। हमारा परिवार सिवाए नमक के, बाजार से बहुत ही कम उत्पाद खरीदता है। बहुत सालों से हम अपने खाने में, किसी भी तरह के तेल का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। बाजार में आने वाले नए उत्पादों की भी हमें उतनी जरुरत नहीं होती है। क्योंकि, जो भी उपज खेतों से आती है, वह पर्याप्त होती है। यहां तक कि कपड़े भी, हमारे पिताजी अक्सर घर में चरखे पर ही बना लेते हैं।” 

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‘पहला प्यार’ है कृषि:

उनके परिवार के ज्यादातर लोग, वैसे तो अपने नौकरी में व्यस्त रहते हैं, लेकिन जब भी उन्हें मौका मिलता है, तो वह नायर की मदद करते हैं। नायर और उनकी पत्नी, कात्यायिनी के चार बच्चे हैं – के. मोहनदास, के. राधाकृष्णन, कोमलवल्ली और उषा। मोहनदास एक सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी हैं, और राधाकृष्णनन एक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। नायर की दोनों बेटियाँ गृहिणी हैं। 

उन्होंने कहा, “मेरे बच्चे अक्सर मुझे अकेले आने-जाने के लिए मना करते हैं, उन्हें लगता है कि, मैं बीमार पड़ जाऊंगा। लेकिन मैं हमेशा कहता हूँ कि, खेती एक वैकल्पिक एक्सरसाइज है, जिससे मैं आज तक स्वस्थ्य हूँ। मुझे कभी अस्पताल जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी।” नायर को बढ़ती उम्र के कारण,सुनने में कुछ परेशानी होने लगी है। लेकिन इसके अलावा उन्हें कोई बीमारी नहीं है। अब इसे कृषि के लिए उनका प्यार ही कह सकते हैं कि, वह अपना बाकी का जीवन भी खेतों में काम करते हुए ही बिताना चाहते हैं। 

मूल लेख: संजना संतोष

संपादन – प्रीति महावर

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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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